ऐतिहासिक पृष्ठ

(02/Feb/2015)

इस माह के वैज्ञानिक

सूर्य को रोकने  और प्रकाश फैलाने वाले वैज्ञानिक

 

प्राचीन और आरंभिक अवधारणा के अनुसार पृथ्वी को विश्व के केन्द्र में माना जाता रहा था। सूर्य सहित अन्य ग्रह और तारे पृथ्वी की परिक्रमा में रत हैं यह अवधारणा जब खंडित हुई तो अवमानना और नास्तिक जैसे शब्दों को प्रचारित कर फतवा-सा जारी किया गया। जो लोग सूर्य के स्थिर होने की बात कर रहे थे उन्हें कठोर यातनाएं भोगनी पड़ीं। सूर्य को रोकने और नई वैचारिक स्थापना से प्रकाश फैलाने का यह उपक्रम सदियों तक चला। इस नए मूल्य की स्थापना करने वालों में सबसे पहले निकोलस कोपर्निकस का नाम आता है। यद्यपि कोपर्निकस के पूर्व भी सूर्य के मध्य अथवा केन्द्र में रहने की अवधारणा को प्रतिपादित करने के प्रयास हुए किंतु वे दबा दिए गए। कोपर्निकस ने जिस तथ्यात्मक ढंग और धैर्य से अपनी बात प्रस्तुत की उसे विश्व को सत्य मानना पड़ा। कालान्तर में यही मूल्य भौतिकी विज्ञान के मूल सिद्धांतों की आधारशिला हुए। कोपर्निकस एक ऐसा क्रांतिकारी वैज्ञानिक था जो भौतिकी और खगोल विज्ञान का अग्रदूत बनकर आया और जिसने आस्था के बल पर बने तथ्यों को नकारा। एक हद वह नास्तिक कहा गया जिसके चलते पुरातनपंथी और पादरियों का वह कोपभाजन बना। जाहिर है उसे कठिन संघर्ष और दंड भोगना पड़ा। उसके सहयोगी और समर्थकों को भी ऐसी ही सजा मिली। यही नहीं, आगे आने वाली पीढ़ी के वैज्ञानिक भी इस पीड़ा से अछूते न रहे किन्तु कोपर्निकस ने जो चिंगारी सुलगाई थी वह कालान्तर से होकर संप्रति तक सुलगती रही आयी। खगोल विज्ञान में ऐसे अभूतपूर्व परिवर्तन की कल्पना कोपर्निकस के समकालीन रोटरडैम के.इरास्मस, मार्टिन लूथर, हेनरी (अष्टम), माइकेलेंजोलो, लियोनार्दो द विंची, क्रिस्टोफर कोलंबस, पैरासेल्सस, मेकियावेली आदि ने भी नहीं की होगी। जर्मन के लोकप्रिय और ख्यात कवि-नाटककार गेटे के शब्दों में - ‘‘कोपर्निकस के सिद्धांत ने मानव-चिंतन को जितना प्रभावित किया, उतना अन्य किसी  विचार अथवा आविष्कार ने नहीं किया। बहुत मुश्किल से जब यह ज्ञात हुआ कि पृथ्वी है और अपने-आप में परिपूर्ण है, तब कहा गया कि इसके ब्रह्मांड-केन्द्र में होने के विशेष अधिकार को तिलान्जलि दे दो। मानव जाति के समक्ष ऐसी मांग शायद पहले कभी पेश नहीं की गई थी। यह बात पीड़ादायक थी और इसे स्वीकार करने में बहुत सी अवधारणाएं धुंध-धुएं में विलीन हो गईं। ईडन के स्वर्ग की, भक्ति व कवि-कल्पना की, हमारी निष्कंलक दुनिया की, अनुभूतियों के साक्ष्य की, काव्यमय धार्मिक आस्था आदि-आदि की अवधारणाएं समाप्त हुईं। अतः कोई अचरज नहीं कोपर्निकस के समकालीनों ने यह न मेट देने के लिए उसके सिद्धांत का हर प्रकार से जरूरी विरोध किया। कोपर्निकस के सिद्धांत को अंगीकार करने वालों ने विचार की महŸाा और दृष्टिकोण में स्वतंत्रता की अधिकारपूर्वक ऐसी मांग उठाई जैसे पहले कभी नहीं उठाई गयी थी, वस्तुतः उसकी कल्पना तक नहीं की गई थी।’’
मिस्र-यूनानी खगोलविद टॉलेमी जिसका काल संभवतः 90.168 ई. आंका जाता है ने अरस्तू और अफलातून के विचारों का प्रतिपादन करते हुए पृथ्वी को विश्व-व्यवस्था के केन्द्र में बताया। सोलहवीं-सत्रहवीं सदी तक इस अवधारणा के चलते खगोल विज्ञान का विकास अवरूद्ध रहा तथापि यह बात जड़ता की तरह मानी जाती थी क्योंकि ब्रह्मांड से बावस्ता सभी विचारक और धर्म यही भावना रखते थे। गिरजे मानते थे कि पृथ्वी सृष्टि का केन्द्र है तथा मनुष्य उसे भोगने वाला राजा है। खगोलीय शक्तियां मनुष्य मात्र के लिए निर्मित हैं। ये मान्यताएं पुराने समय में स्वाभाविक भी थीं। इस स्वाभाविक स्वीकृति को चुनौती देते हुए पहले-पहल कोपर्निकस ने बताया कि पृथ्वी स्थिर नहीं है अपितु सूर्य है।

 

कोपर्निकस का आरंभिक नाम ‘कोपर्निक’ था, जिसका अर्थ होता है विनम्र। पोलैण्ड के थोर्न नामक गांव में 19 फरवरी 1473 को उसका जन्म हुआ था। गांव को छूकर विस्तुला नदी बहती थी। व्यापारी पिता बचपन में ही चल बसे। मामा लुकस वाक्झेनरोड ने लालन-पालन किया। वे एक ईसाई पादरी थे और स्वतंत्र विचारों वाले विद्वान व्यक्ति थे। मामा की निगहबानी में कोपर्निकस की पढ़ाई आरंभ हुई और इस अल्पावस्था में उसने एक सूर्य घड़ी बनाई। अठारह वर्ष की अवस्था में थोर्न छोड़कर वह पोलैण्ड की राजधानी क्राकौ के विश्वविद्यालय में भर्ती हो गया। यहां एक प्रसिद्ध ज्योतिष और गणितज्ञ एलबर्ट ब्रुडझेवस्की से कोपर्निकस की भेंट हुई जिससे गणित और ज्योतिष में कोपर्निकस ने गहन अध्ययन किया।
शिक्षित दीक्षित होने के पश्चात 1493 में रोम विश्वविद्यालय में उन्होंने खगोलशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में नौकरी कर ली। इसी बीच उन्होंने जाना कि दो हजार वर्ष पूर्व प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस ने कहा था, कि ‘ब्रह्मांड का केन्द्र पृथ्वी नहीं है, बल्कि सूर्य है।’ अरस्तू ने उनका उपहास किया था। कोपर्निकस ने महसूस किया कि पाइथागोरस के विचारों को मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने गहरे अन्वेषण और धैर्य के साथ कहा कि सूर्य हमें स्थानान्तरण करता दिखाई देता है। परन्तु ऐसा सूर्य की किसी निजी गति के कारण नहीं, बल्कि पृथ्वी की गति के कारण है। ... दूसरे ग्रहों की तरह पृथ्वी भी सूर्य की परिक्रमा कर रही है और इसके साथ हम भी।
सन 1503 में कोपर्निकस ने गिरजे के कानून की ‘डाक्टरेट’ की उपाधि प्राप्त की और क्राउएनबर्ग में धर्मविज्ञान शास्त्री का पद संभाल लिया। यह पद ऐसा था कि अधिकांश समय काम में लग जाता था। वे चिकित्सा भी करते थे फलस्वरूप खगोलीय विज्ञान के लिए समय बमुश्किल निकलता था। गिरजे के अनुरोध पर उन्होंने एक नया कलेण्डर बनाया। कोपर्निकस का वर्षमान और वास्तविक वर्षमान में मात्र 26 सेकंड का अंतर था। इस पर क्लेवियस ने कहा था कि वर्ष का ठीक-ठाक मान निकालने वाला पहला व्यक्ति कोपर्निकस था।
कोपर्निकस ने जाना कि इस विशाल विश्व में मनुष्य का अस्तित्व बहुत तुच्छ है। पृथ्वी महज धूल के कण जितनी है और वह सूर्य की परिक्रमा करती है।
अपने निरंतर अध्ययन से खगोल-पिण्डों की गतियों के बारे में उन्होंने एक ऐसा सिद्धांत निकाला जो आज तक ‘कोपर्निकस का सिद्धांत’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस सिद्धांत में कहा गया था कि सूर्य विश्व के केंद्र में है। पृथ्वी दो गतियों में लट्टू की तरह सूर्य की परिक्रमा करती है। अपनी धुरी पर चक्कर लगाकर और वर्तुलाकार मार्ग में। इन गतियों के कारण रात और दिन का क्रम निर्धारित हुआ और ऋतुएं बदलती हैं। यहां तक कि पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा नहीं करती अन्य ग्रह भी करते हैं। ये सभी एक निश्चित कक्षा में परिभ्रमण करते हैं।
विज्ञान, खगोल शास्त्र और ज्योतिषशास्त्र के क्षेत्र में कोपर्निकस के सिद्धांत के साथ एक नये युग का सूत्रपात होता है। यह एक क्रांतिकारी कदम था जो गिरजे की मान्यता के विपरीत था। गिरजे ने इस बात पर कड़ा रुख अपनाया। कोपर्निकस ने आकाशीय गोलकों की परिक्रमाओं के बारे में एक पुस्तक लिखी जो बहुत समय तक अप्रकाशित रही। रिडेमान गाइसीयस नामक उनके एक मित्र ने जब इसे प्रकाशित किया तब कोपर्निकस 69 वर्ष के हो गए थे और वृद्धावस्था में अंतिम सांस गिन रहे थे। 24 मई 1543 में उनकी मृत्यु के बाद ब्रूनो ने कोपर्निकस के सिद्धांतों का समर्थन किया। उसने कहा कि ब्रह्मांड अनंत है। दूरवर्ती तारे, सूरज की तरह ही दूरवर्ती जगत है। ऐसा नहीं कि ये खगोलीय पिंड कभी बदलते ही न हों। वे पैदा होते हैं, विकसित होते हैं और खत्म भी हो सकते हैं। 
जिस समय ब्रूनों ने यह बात की, पृथ्वी सहित उस समय छह ग्रहों की गणना थी, बू्रनो ने यह भी कहा कि संख्या इससे भी अधिक है। बू्रनो की इस बात पर परम पवित्र धर्म-न्यायालय ने ब्रूनो को कैद कर काराग्रह में डाल दिया किन्तु उसने कहा कि मेरे अंतस की आग काकेशस पर्वत के शिखर पर जमी बर्फ भी नहीं बुझा सकती। इस उक्ति के बाद उसे खूंटे से बांधकर जला दिया गया। 
बू्रनों के बाद विद्रोह और नये मूल्यों की इस पताका को इटली के महान खगोलवेŸाा और भौतिकवेŸाा गैलीलियो ने संभाला।

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गैलीलियो का जन्म पीसा नगर में 18 फरवरी 1564 ई. को हुआ था। यह स्थान उŸार-पश्चिम इटली के टुस्कैनी क्षेत्र में है। पिता एक पेशेवर संगीतकार थे और पुत्र का मन विज्ञान में रमता था। हालत खस्ताहाल थी किंतु संगीतकार पिता गणित में भी दक्ष थे। उन्होंने पुरातन और आधुनिक संगीत से संदर्भित एक किताब भी छपवाई थी। उन्होंनेे गैलीलियो को व्यापार में लगाना चाहा किन्तु गैलीलियो की विज्ञान में गहरी रुचि देखकर वे चुप कर गए। चिकित्सा शास्त्र में शिक्षा के लिए गैलीलियो ने पीसा विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया किंतु उनकी गणित में गहरी दिलचस्पी थी। एक किंवदंती है कि भीतर हो रहे गणित के लेक्चर दीवार से कान लगाकर सुनते हुए विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी ने देख लिया था। इस घटना के बाद उनका तबादला गणित विभाग में हो गया। यहाँ भी वे बगैर तर्क के किसी भी बात को स्वीकार नहीं करते थे। इस समय उनकी उम्र अठारह वर्ष रही होगी। यह वह समय था जब उन्होंने गिरजे घर की छत पर लटकते हुए लैम्प को देखकर पेण्डुलम घड़ी की कल्पना की। उन्होंने लैम्प के हिलने का समय जानने के लिए नाड़ी पर हाथ रखकर उसका आकलन किया। यहीं से लोलक-घड़ियों की शुरुआत हुई।
तंगहाली के दिन थे और गैलीलियो की जिम्मेदारियां बढ़ती जा रही थी। 1585 में अंततः पीसा छोड़कर वे फ्लारैंस नगर चले आए। यहां आकर उन्होंने महसूस किया कि उनकी प्रसिद्धि भी दबे पाँव संग-संग चली आई है जो कि वास्तव में अन्य लोगों को नागवार गुजरती थी। स्वतंत्र चिंतन, संदेहवादी स्वभाव और कटु आलोचना के चलते उनका व्यवहारिक तौर पर निबाह मुश्किल था। तब पडुआ विश्वविद्यालय में वे गणित के प्राध्यापक हो गए, यहाँ रहकर उन्होंने सामरिक किलेबंदी पर किताब लिखी तथा कई उपयोगी आविष्कार किए जिसमें पानी सिंचाई के लिए पानी ऊपर ले जाने का यंत्र, थर्मामीटर का प्रारंभिक रूप आदि शामिल थे। इसी समय उन्होंने ज्यामितीय और सैनिक उपयोगों के लिए ‘कंपास’ का आविष्कार किया। गणना करने वाला यह यंत्र बहुउद्देशीय था जिसका उपयोग निशानेबाजी, घनमूल व वर्गमूल निकालने में हुआ। सन 1619 से 1624 के बीच उन्होंने सूक्ष्मदर्शी का निर्माण किया जो इस युग का सबसे महत्वपूर्ण, उल्लेखनीय और क्रांतिकारी आविष्कार था। दूरबीन के आविष्कारक के रूप में इसी से उन्हें ख्याति प्राप्त हुई। यद्यपि इसके पूर्व हैंस लिप्परसे ने 1608 में इसका आविष्कार कर लिया था और उसके भी पूर्व 1550 में लिओनार्ड डिगंज ने 1550 में दूरबीन बना लिया था तथापि गैलीलियो इसका उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति और वैज्ञानिक थे। वे सर्वश्रेष्ठ लेंस निर्माता भी कहे जाते हैं। उनके द्वारा निर्मित दूरबीन तीस गुना अधिक क्षमता वाली थी। इसी दूरबीन की सहायता से उन्होंने चंद्रमा पर मौजूद गड्ढ़ों का पता लगाया। उन्होंने ही ईओ, यूरोपा, गैनीमेड और केलिस्टो नामक बृहस्पति के उपग्रहों का पता लगाया। उन्होंने यह भी बताया कि चंद्रमा की तरह शुक्र की भी कलाएं होती हैं। इस तरह वे कोपर्निकस के सिद्धांत के करीब पहुंचे।
जाहिर है कि जो संघर्ष और यातनाएं कोपर्निकस के जीवन में थीं वे ही अपना चेहरा बदलकर गैलीलियो के समक्ष आ खड़ी हुईं। इन सबके समानान्तर सामाजिक - पारिवारिक जिम्मेदारियां और अर्थाभाव में उनका जीवन बीत रहा था। मारीना गाम्बा नामक स्त्री के साथ उन्होंने अपना घर बसा लिया था। उन्हें तीन संतानें भी हो गईं थीं। बहन एक मूर्ख और लंपट व्यक्ति से विवाह करना चाहती थी, साथ ही अच्छा दहेज पाने की इच्छा रखती थी। ऐसी-ऐसी  परेशानियों के चलते उनका खर्च बढ़ता जा रहा था और आमदनी सीमित थी। इधर कोपर्निकस के सिद्धांतों की सत्यता का भान होते-होते गैलीलियो ने अपने आविष्कार और मतों पर लिखना-बताना शुरू किया। उनकी बात सारे यूरोप में फैल गई। कैथोलिक धर्म संप्रदाय को भी उनकी खोजों में दिलचस्पी लेनी पड़ी। पोप ने उन्हें बुलाकर निवृŸिा वेतन दिया। सन 1832 में उन्होंने ‘गैलीलियो गैलीलई का संसार क्रम’ पुस्तक प्रकाशित की जिसे ‘डायलाग आन द टू चीफ सिस्टम्स आफ द वर्ल्ड’ विश्व संबंधी दो प्रमुख प्रणालियों पर संवाद कहा गया। इस किताब में दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों की चर्चा थी जो विश्व संबंधी अवधारणाओं को लेकर थीं। गैलीलियो के प्रतिद्वंद्वियों द्वारा पुस्तक का दुष्प्रचार हुआ और उन्हें तानाशाही व्यवस्था के तहत दोषी ठहराया गया। यद्यपि पोप द्वारा गैलीलियो की सुनवाई हुई किंतु विरोधियों ने तर्क तक नहीं सुने। उनका मानना था कि गैलीलियो ने दूरबीन बनाई, जिसके माध्यम से पुरानी मान्यताएं खंडित होती हैं तो इसमें दोष गैलीलियो का ही है। टुस्कैनी के ड्यूक के आग्रह पर पोप ने गैलीलियो की सज़ा कम करने पर विचार किया और गैलीलियो से अपने विचार व मूल्यों को त्यागने की बात कही। गैलीलियो को यह स्वीकारना पड़ा और उन्होंने कहा, ‘‘मुझे इस आशय की आज्ञा की सूचना पूर्व से है कि मैं कोपर्निकस के पक्ष में अपने विचार त्याग दूं। चूंकि कोपर्निकस के मत को मैंने स्वीकार ही नहीं किया था, सो उसे कैसे त्यागूँ।’’ साथ ही घुटनों के बल बैठे गैललियो जब उठे तो वे बुदबुदा रहे थे- ‘लेकिन पृथ्वी घूमती जरूर है।’ उक्त बातें एक किंवदंती के रूप में सदियों से प्रचलित है जो संभव है कि उस  रूप में न हो जिसे पूर्ण सत्य कहा जा सकता है। किंतु अर्द्धसत्य तो है ही। सज़ा के तौर पर गैलीलियो को फ्लोरेंस के पास आर्केत्री में नजरबंद रखा गया। यहीं रहकर उन्होंने ‘टु न्यू साइंस’ (दो नए विज्ञान) नामक अपनी महान रचना पूरी की। इसकी पांडुलिपि किसी तरह इटली के बाहर भेज दी गई। कठोर परिश्रम, अत्यधिक जागरण, कम रोशनी में अध्ययन और लेखन के चलते उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरा। अंत समय उनके आँखों की ज्योति भी चली गई। जब अंत समय यह पुस्तक छप कर आयी तो उसका स्पर्श करते हुए गैलीलियो ने कहा कि ‘अपने जीवन के अत्यधिक कठिन-कष्टमय क्षणों में मैंने इसे लिखा है, इसलिए यह मेरी सर्वोत्तम कृति है।’ 
गैलीलियो जितने बड़े वैज्ञानिक थे उससे कहीं अधिक वे एक महान मनुष्य थे। मानवता उनके भीतर बहती थी। वे स्वयं की अंतस-यात्रा के लिए अवकाश निकाल लेते थे। साहित्य व अन्य विषयों के वे अच्छे अध्येता थे। कलाओं में उनकी गहरी रुचि थी। संगीत में वे आनंद पाते थे और बहुत अच्छी व मधुर बांसुरी बजाते थे। चित्रकारी में निपुणता के कारण वे  अपने खगोलीय अनुसंधानों को चित्रों के माध्यम से दर्शाते थे। इन सारे गुणों के चलते वे मनुष्य से मनुष्य को पाने और जोड़ने में उद्यत रहते थे।
मनुष्य से मनुष्य के बनने की इसी बात को आगे डार्विन ने व्याख्यायित की। यह तथ्य खगोलशास्त्र नहीं अपितु जीवविज्ञान में उजले सफों पर लिखा गया है।

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निकोलस कोपर्निकस ने अगर यह कहा कि ब्रह्मांड में पृथ्वी एक ग्रह ही है और उसकी कोई विशिष्ट स्थिति नहीं है। साथ ही गैलीलियो ने कोपर्निकस की बातों को तथ्यात्मक ढंग से साबित किया तो चार्ल्स डार्विन ने यह सिद्ध कर दिखाया कि मनुष्य के पूर्वज अन्य प्राणियों के पूर्वजों से अलग नहीं है। यद्यपि उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में लोमानोसोव, कार्ल उन्नेउस, जार्ज बूफो और जां लामार्क ने क्रमशः कहा कि पृथ्वी और विश्व की सत्ताएं आरंभ जैसी नहीं हैं। प्रकृति विज्ञान के तथ्य न केवल प्रकृति की अपरिवर्तनशीलता संबंधी धार्मिक उपदेशों के विरूद्ध गवाही देते हैं अपितु हमें अन्य प्राणियों के साथ घनिष्ट संबंध के बारे में विचारशील बनाते हैं। मनुष्य का सबसे निकटतम पूर्वज दो पैरवाली प्रजाति का वानर है।
इन विचारों को तथ्यों द्वारा सिद्ध करना अब तक संभव न हो सका था किन्तु चार्ल्स डार्विन ने यह संभव कर दिखाया। उन्होंने सिद्ध किया कि मनुष्य प्राणी जगत के विकास की उच्चतर कड़ी है। प्राणी जगत और वनस्पति जगत परिवर्तनशील है। प्रकृति रोज अपना रूप बदलती है जिसमें प्राणीमात्र शामिल हैं। साथ-साथ उनकी प्रकृति, विशेषताएं और गुण बदलते हैं। चार्ल्स डार्विन का यह सिद्धांत जीवविज्ञान और जीवन के संबंध में व्यवहारिक दृष्टिकोण लेकर आया, अन्यथा धार्मिक दृष्टि से ईश्वर के द्वारा संसार की निर्मिति की बात कही जाती रही थी। थियोडोसियस डोब्झांस्की ने लिखा है - ‘‘हम क्या हैं? कहाँ से आए? कहाँ जाएंगे? जैसे सनातन प्रश्नों से हर मानव जूझा है- विकास के सिद्धांत का प्रकाश न हो तो जीवविज्ञान में कुछ भी संगत नहीं लगता है।’’ प्राणीजगत में डार्विन की इस खोज को ‘विकासवाद’ कहा जाता है। इस सिद्धांत की प्रारंभिक व्याख्या करने के लिए डार्विन ने ;व्तपहपद व िैचमबपमेद्ध (प्राणियों की उत्पत्ति) नामक किताब लिखी। इस किताब को पढ़कर थामस हक्सले ने कहा था - ‘‘मैं कितना मूर्ख था कि स्वयं इस बात को पहले न सोच सका।’’ चार्ल्स डार्विन का जन्म इंग्लैंड के श्रुस्बरी नामक स्थान पर 12 फरवरी 1809 को हुआ था। यह बहुत ही सुखद योग है कि इसी दिन अब्राहिंम लिंकन का जन्म भी हुआ था। इन दोनों विभूतियों ने मनुष्यों को दासता से मुक्त किया। पहले ने अज्ञान से, दूसरे ने श्रम से । चार्ल्स बचपन से ही शांत, गंभीर और कुशाग्र थे। उसे तरह-तरह के कीट-पतंगे, अण्डे, फूल-पत्ती, सिक्के, रंगीन पत्थर आदि के संग्रह का शौक था। वह बंदूक से पक्षियों का शिकार भी करता था किन्तु एक बार आहत पक्षी की पीड़ा देखकर उसने कभी भी किसी प्राणी की हत्या न करने का प्रण लिया। आरंभिक शिक्षा बड़े बेमन से ग्रहण करने के बाद चार्ल्स डार्विन की चिकित्सा शास्त्र में रुचि जगी। किन्तु वे यह पढ़ाई भी पूरी न कर पाए। अंततः पिता की इच्छा रखते हुए धर्म-विज्ञान का अध्ययन करके वे पादरी बन गए। यहाँ भू-विज्ञान के प्रोफेसर ऐडम सेजविक और वनस्पति विज्ञान पादरी जॉन हेस्लो की संगत में उनकी रुचि पुनः विज्ञान में बलवती हुई। चार्ल्स के पास कोई औपचारिक डिग्री नहीं थी तथापि प्रो. हेस्लो की सहायता से डार्विन को ‘बीगल’ जहाज पर काम मिल गया। इस जहाज की यात्रा का उद्देश्य दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड सहित अन्य द्वीपों का भौगोलिक और प्राकृतिक अध्ययन करना था। डार्विन ने इसे सहज स्वीकारा। यह यात्रा पांच वर्ष तक हुई और इसी दौरान चार्ल्स डार्विन ने ‘विकासवाद’ के तथ्यों को एकत्र किया। यात्रा से लौटने के बाद डार्विन ने इमा वेड्गवुड से विवाह किया और सामाजिक दायित्व को पूरा करते-करते बीस वर्षों तक अपने सिद्धांत पर काम किया। जब 1858 को उनकी किताब प्रजातियों की उत्पŸिा छपकर आयी तो ‘धर्म’ को धक्का लगा। यद्यपि थामस हक्सले ने चार्ल्स डार्विन के सिद्धांतों की पैरवी की। आज डार्विन के बताए गए तथ्यों को शताब्दी हो गई किन्तु अब भी वे वैसे ही चमकदार और रोशन है। अंत समय डार्विन का पीड़ा में बीता और लंबी बीमारी के बाद 19 अप्रैल 1892 में उनका देहावसान हो गया। डार्विन की तरह ही प्राकृतिक गुणों की व्याख्या डेमित्री इवानोविच मेंडेलीफ ने की जो मनुष्य नहीं अस्तु तत्वों के बारे में थीं। 

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मेंडलीफ ने तत्वों के क्रम की तालिका का आविष्कार किया। यह विज्ञान के चहुँमुखी विकास के लिए आवश्यक तथा सहायक सिद्ध हुई। इस तालिका में मेंडलीफ ने तत्वों को उनके रासायनिक गुण-धर्मों के आधार पर इकट्ठा किया, साथ ही उनके बारे में भविष्यवाणियां कीं। वर्षों के अंतराल पर भी उसका महत्व जस का तस बना हुआ है। इसी के आधार पर भौतिक और रसायन शास्त्र का विकास संभव हुआ। मेंडलीफ की यह उपलब्धि उन्हीं के नाम ‘मेंडलीफ की आवर्त तालिका’ से जाना जाता है। जब उन्होंने इसे बनाया था तब पचहत्तर तत्वों की खोज हुई थी। उनकी नियमितता को देखना मुमकिन नहीं था, अस्तु मेंडलीफ ने उनके गुण-धर्मों के विषय में बताया। बाद में जो तत्व ज्ञात हुए तो उन पर मेंडलीफ की बातें शत-प्रतिशत सही साबित हुई।
मेंडलीफ का जन्म 8 फरवरी 1834 को तोबल्स्क शहर में हुआ जो साइबेरिया में स्थित है। आरंभिक शिक्षा के लिए मेंडलीफ टोबल्स्क के जिमनेशियम में पढ़ने गया। पिता के निधन हो जाने से बचपन में ही उसे स्कूल छोड़ना पड़ा। मां उन्हें लेकर मास्को आ गई। मास्को विश्वविद्यालय में दाखिला न मिल सकने पर वह बमुश्किल सेंट पीटर्सबर्ग के टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज के गणित और विज्ञान में प्रवेश पा सका। अपने विधार्थी जीवन में ही उसने रसायन के मौलिक सिद्धांतों की व्याख्या की और उन्हें स्थापित कर सका। 1854 में मेंडलीफ ने ‘आइसोमोर्फिज्म’ पर शोध किया और अगले वर्ष प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। 1855 में एक दशक तक मेंडलीफ ने ओडेसा के स्कूल में अध्यापन किया तथा 1864 में सेंट पीटर्सबर्ग के विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हो गए। अगले तीन वर्षों में मेंडलीफ ने ‘रसायन के मूल आधार’ नामक पुस्तक लिखी जो रसायन शास्त्र के मूल अवधारणा से संबंधित थी। इसके विषय में खुद मेंडलीफ ने कहा था कि इसमें मेरे अध्यापन जीवन के अनुभव और विज्ञान संबंधित गंभीर विचार हैं।
अगले दस वर्ष उनके जीवन में काफी उतार-चढ़ाव वाले रहे। 1862 में उन्होंने फेओझबो से विवाह किया तथा अगले चार वर्षों में उसकी भेंट आना इवानोबना पोपोवा से हुई जिसे वह प्रेम करने लगे। चार वर्ष के बाद पहली पत्नी से तलाक होने पर वह विवाह कर सके। शिक्षा विभाग में मतभेद के चलते उन्होंने नौकरी छोड़ दी। रूस ही नहीं अस्तु विश्वविख्यात वैज्ञानिक होने के बावजूद वह विज्ञान अकादमी के सदस्य नहीं चुने गए। अंततः 1890 में उन्होंने नौसेना में नौकरी करते हुए एक नए किस्म की बारूद बनाई और चार वर्षों के बाद यह नौकरी भी छोड़ दी। फिर सरकारी नापतौल विभाग में सेवा देते हुए 1899 में उन्हें मीट्रिक प्रणाली की शुरुआत करने में सफलता मिली।
मेंडलीफ ने जीवन भर श्रम और कार्य किया। वे कभी निरुद्देश्य और खाली नहीं बैठे। सक्रिय रहना उनके जीवन का मूलमंत्र था। वे कहते थे - ‘‘काम! काम में शांति और सुख खोजो। ये अन्यत्र आपको कहीं भी नहीं मिलेंगे।’’ इसी गुण के चलते वे अपने जीवन के अंतिम समय तक काम करते रहे। उनकी इच्छा रूस की औद्योगिक और सामाजिक व्यवस्था के बारे में अपनी प्रतिक्रियाएं लिखने की थीं। दृष्टि क्षीण होने के बाद भी वे सक्रिय रहे।
जनवरी 1907 में वे ठंडी हवा लगने से बीमार हो गए और फिर कभी स्वस्थ न हो पाए। 
मेंडलीफ के एक रिश्तेदार कापुस्टिना गुबकिना ने उनके अंतिम समय का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है-
मेंडलीफ की बहन माशेन्का ने उसके अध्ययन कक्ष में प्रवेश किया। मेंडलीफ का चेहरा पीला पड़ गया था। चेहरे पर न रेखांकित कर सकने वाले अजीबो-गरीब से भाव तैर रहे थे- उसके हाथं में कलम थी।
‘‘क्या बात है? क्या स्वास्थ्य अच्छा नहीं? तुम्हारे लिए अच्छा होगा कि तुम लेट जाओ।’’ बहन ने कहा।
‘‘नहीं, कुछ नहीं। मैं ठीक हूँ। ... यह सिगरेट लो माशेन्का।’’
‘‘नहीं, मैं सोचती हूँ कि मेरे यहाँ सिगरेट पीने से तुम्हें तकलीफ होगी।’’
‘‘बिलकुल नहीं, बल्कि मैं भी एक सिगरेट लूंगा।’’
उन्होंने सिगरेट सुलगाई। कलम उसके हाथ में ही थी।
माशेन्का कश खींचते हुए कमरे से बाहर निकल गई। जब वह लौटी तो उसने देखा मेंडलीफ का शरीर झुका हुआ था। कलम अब भी उसके हाथ में ही थी।
यह 20 जनवरी 1907 का दिन था जब मेंडलीफ के हृदय ने काम करना बंद कर दिया। डोब्रोलायुबोव, पीझाारेव, तुर्गनेव जैसे अन्य साहित्यकार-वैज्ञानिकों के पास ही मेंडलीफ को दफनाया गया। इन सबका प्रकाश उसके प्रकाशपुंज में मिल आज जगत-जीवन को आलोकित कर रहा है।
प्रकाश फैलाने का काम आगे चलकर एक और वैज्ञानिक ने किया जिसका नाम थॉमस अल्वा एडिसन था। उसने कहा था, ‘‘मात्र धनाड्य व्यक्ति ही मोमबत्ती जला पाएंगे-एक दिन में ऐसा बल्ब बनाऊंगा।’’

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एडिसन 11 फरवरी 1847 को मिलान ओहियो में जन्मे थे। उन्हें औपचारिक शिक्षा बहुत कम प्राप्त हुई। वे कम सुन पाते थे जिसके चलते उन्हें मंदबुद्धि समझकर स्कूल से निकाल दिया गया था। प्राध्यापिका मां ने ही पढ़ना-लिखना सिखाया। अंक गणित का अभ्यास कराते उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एडिसन विषयों को खुद सीखे। बचपन में ही उन्होंने प्रायोगिक उपकरण एकत्र कर  एक छोटी सी प्रयोगशाला का निर्माण कर लिया था। घर पर रहकर ही उन्होंने चार्ल्स डिकेंस, विलियम शेक्सपियर तथा एडवर्ड गिबंस को बारह वर्ष की आयु में ही पढ़ लिया था और तेरह वर्ष की अवस्था में कार्य करना आरंभ कर दिया था।
सन 1862 से 1868 के बीच उन्होंने अमेरिका के पश्चिमी राज्यों के साथ-साथ कनाडा में टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में काम किया और टेलीग्राफिक उपकरणों के लिए निरंतर प्रयोग करते रहे। उन्होंने एक ऐसी टेलीग्राफी मशीन का विकास किया जिससे कई संदेश भेजे जा सकते थे। इसके साथ ही अन्य आविष्कारों के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी और न्यूयार्क चले आए। उनका पहला आविष्कार ‘इलेक्ट्रिकल वोट रिकार्डर’ था जिसका उपयोग निर्वाचन निकायों द्वारा चुनाव प्रक्रिया तेज करने के लिए होता था। पहला पेंटेंट इसी का हुआ। फिर ये सिलसिला जब चल पड़ा तो एडिसन के नाम विश्व के सबसे अधिक पेटेंट कराने का रिकार्ड बना। उन्होंने लगातार पैंसठ वर्षों तक पेटेंट कराए। एडिसन के आविष्कारों में तापदीप्त विद्युत प्रकाश बल्व, फोनोग्राफ, मोशन पिक्चर प्रोजेक्टर, स्वचालित मल्टीप्लेक्स टेलीफोन, अल्कलाइन स्टोरेज बैटरी और कार्बन टेलीफोन ट्रांसमीटर शामिल हैं। सिनेमा, टेलीफोन, रिकॉर्ड और सी.डी. के सृजन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके द्वारा बनाई गई वस्तुएं और आविष्कारों का उपयोग दैनन्दिन में आज भी हम कर रहे हैं।
‘एडिसन यूनिवर्सल स्टॉक प्रिंटर’ और ‘टिन फॉयल फोनोग्राफ’ एडिसन के आरंभिक और बड़े आविष्कार थे जिनसे उन्हें अपार धन तथा प्रसिद्धि मिली। टिन फॉयल फोनोग्राफ एक ऐसी मशीन थी जो ध्वनि को रिकार्ड कर उसका पुनः उत्पादन कर सकती थी। यही फोनोग्राफ था जिससे एडिसन को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। 1878 में राष्ट्रपति रदरफोर्ड हेज ने इसे बखूबी सराहा और अगले दो वर्षों में इसकी सार्वजनिक बिक्री हुई। इस आविष्कार के बाद एडिसन ने तापदीप्त विद्युत प्रकाश के विकास का काम हाथ में लिया। कठोर परिश्रम और समय लगाने के बाद अंततः 1879 में वे ऐसा बल्व बनाने में सफल हो गए जो प्रायोगिक आकलन की तुलना में अधिक समय तक जलता था। इतना ही नहीं उन्होंने एक विद्युत प्रकाश प्रणाली भी विकसित की जिसमें सभी आवश्यक घटक डायनमो, तार, फ्यूज, विद्युत मीटर, प्रकाश को ऑन-ऑफ करने के स्विच आदि थे। इसका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन दिसम्बर 1879 में हुआ। जाहिर है उनके द्वारा दिए गए प्रकाश से सब चकाचौंध हो गए।
1880 में एडिसन ने न्यूयार्क में दुनिया की पहली विद्युत शक्ति कंपनी बनाई। इस तरह वे विद्युत के व्यवसाय में आए। वस्तुतः एडीसन ने इसे कभी व्यवसाय न समझा, अस्तु यह उनके लिए एक काम ही रहा। 1862 में पहली बार जे.पी.आर्गन और न्यूयार्क टाइम्स के कार्यालयों को भूमिगत तारों से जोड़कर बिजली प्रदान की गई। इस प्रकार उन्होंने विद्युत शक्ति प्रणाली का आविष्कार किया। एडिसन ने दशकों तक इस क्षेत्र में काम किया और जॉन पीयरमेंट मॉर्गन तथा बेंडर बिल्टस के साथ मिलकर ‘एडिसन जनरल इलेक्ट्रिक लाइट’ कंपनी की स्थापना की। उक्त दोनों व्यक्ति न्यूयार्क के सबसे धनी व्यक्ति थे अतः इस प्रकाश क्रांति को विश्व में फैलते देर न लगी।
इस क्रांति के बाद एडिसन  ने अगला आविष्कार मोशन पिक्चर कैमरे के क्षेत्र में किया जिसमें चित्र के साथ ध्वनि को प्रस्तुत कर सके। 1913 में एडिसन ने बोलने वाले चलचित्र का निर्माण कर लिया। यह बहुत ही रोचक था। उन्होंने इस आविष्कार सहित अन्य आविष्कार के प्रणालियों को लिखा, प्रयोगों को लिखा, प्रारूपों को लिखा और एक मुकम्मल दस्तावेज तैयार किया जो कि विश्व के पास उनकी एक अमूल्य धरोहर है। उनके ही शब्द आज उन्हीं के इस काम के लिए प्रासंगिक हो गए हैं कि प्रमाण, प्रमाण! मैं सदा इसी के पीछे पड़ा रहता हूँ, किसी सिद्धांत को एक तथ्य के रूप में स्वीकार करने से पहले मेरे मस्तिष्क को उसका प्रमाण चाहिए। एडिसन के अधिकतर पेटेंट जीवन में काम आने वाले हैं। उपयोगी पेटेंट के तहत वह आविष्कारक-उत्पाद या प्रक्रिया आ सकती है जिसकी प्रकृति वैद्युत यांत्रिक या रासायनिक होती है। उनके पेटेंट इन्हीं श्रेणी में आते थे जो कई-कई संरचना और बनावट-बुनावट के थे। इन उत्पादन, आविष्कार और खोज के जरिए उन्होंने अपने जीवन में करोड़ों डॉलर कमाए और उन्हें खर्च भी किये। हेनरी फोर्ड जो आटोमोबाइल उद्योगपति रहे ने उनके बारे में कहा था कि एडिसन खुशहाल व्यक्ति थे और आनंदित रहते थे। उन्हें जब भी जिस चीज की जरूरत हुई, आसानी से मिल गई। वे व्यवसाय करने वाले प्राणी नहीं थे अपितु विश्व के लिए उन्होंने जितना धन बनाया उसकी तुलना में उन्हें कुछ खास नहीं मिला था।
एडिसन ने विश्व को प्रकाश दिया। यह प्रकाश ज्ञान से लेकर भौतिक जगत का भी था। उन्होंने जितने भी आविष्कार किये आज सभी हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। सुबह सूर्य की पहली किरण के साथ ही हम उनके आविष्कारों का उपयोग करते हैं और रात निद्रा में जाने के पूर्व भी।
एडिसन को बीसवीं सदी का एकाकी आविष्कारक कहा जाता है और सच भी है उनके द्वारा किए गए आविष्कारों को अगर भूल जाएं तो विश्व पुनः अंधकार में चला जाएगा।  

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उक्त पांचों वैज्ञानिक के साथ जिनका स्मरण किया जाना चाहिए उस विज्ञान परिवार में टी.आर.शेषाद्रि, विलियम जॉनसन, विलियम शोक्ली, शांति स्वरूप भटनागर भी शामिल हैं। इस माह के वैज्ञानिकों में जो अन्य नाम आते हैं उनमें रसायन के क्षेत्र में स्वान्ते आगस्त अरहेनिअस ने इलेक्ट्रोलाइट डिस्सोसिएशन (विद्युत अपघटन) के संबंध में महत्वपूर्ण कार्य किया। हांस कार्ल अगस्ट मिमॉन वॉन युलेर ने एंजाइम की खोज की जो शर्करा में खमीर के लिए उत्तरदायी होते हैं। लाइनस कार्ल पॉलिंग ने अणु की संरचना के क्षेत्र में काम किया। गुलिओ नाता ने बढ़िया किस्म का प्लास्टिक बनाया जिससे फिल्म, फाइबर, सिंथेटिक रबर तैयार इुए। राबर्ट हूबर ने जटिल अणु की संरचना को फोटो सिंथेसिस के माध्यम से स्पष्ट किया। भौतिकी के क्षेत्र में विल्हेम कोनराड रोन्तजेन ने एक्स-रे का आविष्कार किया जिससे रेडियो एक्टिविटी के अन्य आविष्कार संभव हुए। चार्ल्स एडुअर्ड गिल्लामे ने धातुओं के मिश्रण संबंधी अनेक परीक्षण किए, विशेष रूप से फैरोनिकल मिश्रणों के संबंध में जिसके परिणाम थे निकल और स्टली के मिश्रण। चार्ल्स थामसन रीस विल्सन ने ‘विल्सन क्लाउड चैम्बर’ नामक उपकरण बनाया जिससे रेडियोधर्मिता, एक्स किरणों, अंतरिक्ष में प्रसारित होने वाली किरणों तथा परमाणु के नाभकीय विषयों का अध्ययन संभव हुआ। ऑटो स्टर्न ने आणविक किरण के विकास और उसके द्वारा प्रोट्रॉन के चुम्बकीय काल को मापने तथा स्वभाव का अध्ययन-विश्लेषण किया। वाल्टर हाउसर ब्राटेन ने अर्द्धचालकों के गुणधर्म की खोज की जिससे टांजिस्टरों के विकास में मदद मिली। एमिलिओ गिनोसेग्रे ने एंटीप्रोटीन का पता लगाया। राबर्ट हाफ्सटाटर ने प्रोटोन और न्यूट्रॉन के ढॉचे के संबंध में अधिक गहराई से अध्ययन व छानबीन की। जुलिअन सीमूर श्विंगर ने अपने अध्ययन से स्पष्ट किया कि क्वांटम इलेक्ट्रोडायनामिक्स के संबंध में सिद्धांत निश्चित करने से क्वांटम यंत्र विज्ञान का आइंस्टाइन के सापेक्षता संबंधी विशेष सिद्धांत से संबंध स्थापित हो जाता है। लियोन एन.कूपर ने सुपर कंडक्टिविटी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जीव विज्ञान के क्षेत्र में कार्ल पीटर हेनरिक दाम ने रक्त स्राव रोधी तत्वों का पता लगाया तथा विटामिन ‘के’ की खोज की। विलियम पैरी मर्फी ने जिगर चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोधकार्य किए। फिलिप शोवाल्टर हेंच ने ग्रंथि (अधिवृक्क) के हार्मोन्स संबंधी खोज की तथा बताया कि उनकी बनावट कैसी होती है और शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है। जॉन फ्रेंकलिन एण्डर्स ने नॉन-नर्वस कल्चर द्वारा पोलियो रोग के वायरस पैदा करने में सफलता प्राप्त की जिसके परिणाम स्वरूप पोलियो रोग के टीके का विकास हुआ। सर पीटर ब्रिआन मेडावर ने प्रतिरोपित ऊतकों द्वारा स्वतः रोग संक्राम्य सहजता प्राप्त करने का पता लगाया। सर एलन लायड हाजकिन ने उस रासायनिक प्रक्रिया का पता लगाया जो आवेग अथवा मनोभाव के किसी विशिष्ट धमनी की कोशिकाओं द्वारा प्रचारित व सूचित करने के लिए उत्तरदायी है। जैक्व मॉनोद ने स्पष्ट किया कि किस प्रकार जीन कोशिकाओं के आयान्तरण को एन्जाइमों के जैव संश्लेषण द्वारा नियमित अथवा नियंत्रित करता है। उल्फ वॉन उलेर की खोज का मुख्य विषय तंत्रिकाओं द्वारा आवेगों का संप्रेषण रहा। रेनाटो उलबेको ने यह बताया कि किस प्रकार एक सामान्य कोशिका कैंसर युक्त हो जाती है, उन्होंने इसके लिए अनुसंधानात्मक ढांचा भी तैयार किया। रसायन शास्त्र, भौतिकी और जीवविज्ञान के क्षेत्रों में आविष्कार तथा खोज करने वाले इन सभी वैज्ञानिकों को नोबल पुरस्कार मिला। 
इन सभी वैज्ञानिकों का जन्म फरवरी माह में ही हुआ।


(इलेक्ट्रॉनिकी कक्ष से)