विज्ञान कथा

(25/Jul/2018)

समानान्तर विश्व की अन्य समय रेखा 

प्रज्ञा गौतम
 
बैंगलोर में आयोजित ‘भारतीय विज्ञान काँग्रेस एसोसिएशन’ के सेशन में भारत के विभिन्न भागों से वैज्ञानिक और शोध-छात्र सम्मिलित हुए थे। इस सेशन में दो भौतिक-विज्ञ डॉ। घोष और डॉ। भगत अपना शोध-पत्र पढ़ने वाले थे। डॉ। घोष मंच पर आ गए थे। उनका शोध-कार्य अति विशिष्ट था, उसे सदी की एक क्रांतिकारी खोज माना जा सकता था। अपना शोध-पत्र पढ़ने से पहले उन्होंने एक छोटा सा उद्बोधन दिया-
“हमारी यह खोज अपने आप में विशिष्ट है और कई प्रचलित भौतिक मान्यताओं को चुनौती देने वाली है। पर अपना शोध-कार्य मैं दुनिया के सामने रख पा रहा हूँ, इसका श्रेय मैं अपने छात्र प्रेमदीप माथुर को दूँगा जो स्वयं भी एक भौतिक-विज्ञ है। यह विलक्षण बुद्धि का धनी होने के साथ-साथ बेहद साहसी भी है। मैं श्री माथुर को आमंत्रित करता हूँ कि अपने अनुभव को देश के वैज्ञानिकों के साथ साझा करे।’’
श्री माथुर मंच पर आ गए। उन्होंने बोलना प्रारंभ किया- “मैं दिल्ली में रह कर पीएच.-डी। कर रहा था और कॉलेज के हॉस्टल में रहता था। पिछले कुछ माह से मैं प्रयोगशाला में दिन-रात काम कर रहा था। मुझे बहुत मानसिक थकान हो गई थी और घर की याद आने लगी थी। यूँ तो विडियो कॉलिंग के जरिए माँ-पिताजी से बात हो जाया करती थी पर अब लगने लगा था कि मैं जा कर उनके गले लग जाऊँ। पहाडि़यों के बीच बसी अपनी कॉलोनी की साफ-सुथरी सड़कों पर दौड़ लगाऊँँ। अपने हॉस्टल के कमरे में, जब भी मैं लेटता तो सोचता कि काश इस दीवार में कोई दरवाजा हो और मैं सीधा अपने घर पहुँच जाऊँ। पर विज्ञान और तकनीकी के इस चरम युग में भी मुझे ऐसी कोई संभावना नज़र नहीं आती थी कि ऐसा कोई शॉर्ट-कट रास्ता बनाया जा सके।”
मैं डॉ। घोष के निर्देशन में शोध कर रहा था। उन दिनों डॉ। घोष डॉ। भगत पोस्ट-डॉक्टरल रिसर्च में संलग्न थे और एक ऐसा यंत्र बनाने में व्यस्त थे जो सुरक्षित ड्राइविंग से सम्बंधित था। यह यंत्र ड्राइविंग के समय व्यक्ति के मस्तिष्क को सक्रिय और ऊर्जावान रखता था।
मैंने डॉ। घोष से घर जाने के लिए छुट्टी चाही तो वे बोले कि तीन दिन की छुट्टियाँ हैं, तुम जा सकते हो। उन्होंने मुझे एक हैड-सैट दिया -“माथुर, तुम इसमें म्यूजिक सुन सकते हो साथ ही यह तुम्हें ड्राइविंग के दौरान नींद और थकावट से दूर रखेगा।” उनका यह हैड-सैट परीक्षण के दौर में ही था। उन्होंने मेरी कार और हैड-सैट में सेंसर लगा दिए थे ताकि मेरी स्थिति का उन्हें पता रहे और वो मेरे दिमाग की सक्रियता को माप सकें और नियंत्रित कर सकें।
रात्रि आठ बजे भोजन के उपरांत मैं घर के लिए निकल पड़ा। 23 सितम्बर, हाँ यही तारीख थी। उस दिन उमस नहीं थी। हल्की बारिश के बाद मौसम सुहावना हो गया था। मैंने हैड-सैट पहन लिया था। पाँच दशक पूर्व का माइकल जैक्सन का ‘थ्रिलर’ बज रहा था और कार तेज गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। रात्रि के साढ़े-बारह बज गए थे और सड़कें सुनसान थीं। सघन वन-क्षेत्र शुरू हो चुका था। आगे घाटियाँ और घुमावदार रास्ता था। 8 किमी का सफर बचा था बस। महिनों की काम की थकान थी मुझे, अब कुछ सुस्ती आने लगी थी। मैंने अपने हैड-सैट को हाई-फ्रीक्वेंसी पर सैट कर दिया।
अचानक मेरी कार अनियंत्रित होकर मुख्य सड़क से नीचे उतर गई और मुझे बड़ी जोर का झटका लगा। उसके बाद क्या हुआ मुझे याद नहीं।
जब मेरी चेतना लौटी तो सुबह हो चुकी थी। कार की खुली खिड़की से चेहरे पर पड़े पानी के छींटों और जंगल की ठंडी बरसाती हवा के स्पर्श से मेरी नींद खुल गई थी। जैसे-तैसे कार मुश्किल से स्टार्ट हुई और मैं उसको मुख्य सड़क पर लाया, पर यह क्या? आगे सड़क पर रास्ता बंद था और वन विभाग का बोर्ड लगा था ‘विंध्य हिल्स टाइगर रिजर्व।’ यह एक तिराहा था। एक रास्ता, जिससे मैं आया था, एक सड़क बाँयी ओर किसी अन्य शहर को जाती थी। मेरा गाँव दाँयी तरफ वाले रास्ते पर था जो कि बंद था। मैंने वन विभाग के गार्ड से पूछा तो उसने बताया कि टाइगर रिजर्व बन जाने से यह अब निषिद्ध क्षेत्र है। मुझे पुनः 30 किमी पीछे लौटना होगा और दूसरे रास्ते से गाँव पहुँचना होगा। मेरे लिए यह सूचना निराशाजनक थी।
माँ-पिताजी ने मुझे इस बारे में कभी नहीं बताया था। यद्यपि मैं इंजीनियर था और भौतिकी के क्षेत्र में शोध कर रहा था, मेरी पर्यावरण और जीव-जन्तुओं में गहरी रूचि थी। मैंने निश्चय कर लिया था कि घर जाने से पहले यहाँ घूम लेना चाहिए।
जब मैं टिकट खिड़की पर खड़ा था तो एक सज्जन मुझे घूरते हुए प्रतीत हुए। उन्होंने मेरी तरफ हाथ हिलाया और मुस्कुराए पर मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। वो मेरे पास आ गए और गर्मजोशी से मेरा हाथ पकड़ते हुए बोले, “अरे माथुर, तू बर्लिन से वापस कब आया? तेरा प्रोजेक्ट पूरा हो गया क्या?” 
मैं चौंक गया था। “मैं बर्लिन कब गया? और आप हैं कौन?”
उनका चेहरा उतर गया था। 
“यार, तू तीन महीने में अपने जिगरी दोस्त प्रवीण को भूल गया।” 
उन्होंने मेरा हाथ छोड़ते हुए कहा। 
उन्होंने ऊपर से नीचे तक मेरा अवलोकन किया। मेरे बढ़े हुए बाल और दाढ़ी, अस्त-व्यस्त वेश-भूषा से वो मेरी दिमागी हालत का आकलन कर रहे थे शायद। मैं सचमुच इस व्यक्ति को बिल्कुल नहीं जानता था पर इस बार मैं जबरदस्ती मुस्कुरा दिया और बोला, “प्रवीण तुम हो। रात मेरा एक्सीडेंट हो गया था और मैं अभी तक सदमे से नहीं उबर पाया हूँ।” मैंने बात बनाते हुए कहा। प्रवीण के होठों पर एक आश्वस्त और दोस्ताना मुस्कुराहट लौट आयी थी। मेरे टिकट के पैसे भी प्रवीण ने दे दिये थे। हम एक ही जिप्सी में थे।
गाइड ने बताया कि यहाँ बाघों के अलावा भारतीय चीते भी हैं। भारतीय चीता? शायद कुछ क्लोनिंग विधि द्वारा संवर्धित कर लिए हों। मैंने ऐसे प्रयोगों के बारे में सुना था। यहाँ के छोटे से तालाब में मैंने गुलाबी सिर वाली बत्तख और अन्य अनेक ऐसे जीव देखे जो मेरी जानकारी में लुप्त हो चुके थे। मैं मुग्ध था और आश्चर्य-चकित भी। मि। प्रवीण मेरी बगल में बैठे मुझे अपने नये रियल एस्टेट कारोबार के बारे में बता रहे थे जिसमें मेरी तनिक भी रूचि नहीं थी। उनकी बातों से मेरा सिर दुख गया था। वो शायद यहाँ अनेक बार घूम लिए थे और आज सिर्फ उस नए विचित्र से सरीसृप को देखने आए थे। मेरे लिए यह एक अद्भुत अनुभव था जिसमें मुझे विचित्र जीव-जंतुओं से मुलाकात के अलावा मि। प्रवीण नामक दोस्त भी प्राप्त हो गया था। और उस वक्त मुझे चलती हुई जिप्सी में पूरी पृथ्वी ही गोल-गोल घूमती प्रतीत हुई थी जब गाइड ने कहा था कि इस टाइगर-रिजर्व को बने पांच वर्ष हो चुके हैं। पिछली दीवाली पर जब मैं आया था तब यह नहीं था।
    दोपहर हो गई थी। प्रवीण मुझे छोड़ने कार तक आए। उन्होंने मेरी कार को इतनी विचित्र नजरों से देखा जितना उस बड़े से अजीबोगरीब सरीसृप को भी नहीं देखा था। उसके कुछ बोलने से पहले ही मैंने हैड-सैट पहन कर कार स्टार्ट कर दी। मैं पहले ही भ्रमित था और कोई नई बात सुनने का इच्छुक बिल्कुल नहीं था।
    कार को घुमा कर मैं पुनः उसी रास्ते पर ले आया, जिधर से आया था पर मेरी बदकिस्मती कि कार फिर संतुलन खो बैठी। दिन का समय था और मैं पूरी तरह चैतन्य था, फिर भी लगा कि कार सामने किसी से टकराई है, जबकि सामने कुछ नहीं दिख रहा था। एक क्षण के लिए मेरी आँखों के आगे धुंध छा गई। कुछ देर बाद जब मैं सामान्य हुआ और कार को स्टार्ट करने की कोशिश की तो वह स्टार्ट नहीं हुई।
    जब मैं आया तब रात थी, अब दिन के प्रकाश में रास्ता बड़ा ही खूबसूरत लग रहा था। रास्ते में दोनों तरफ कचनार, गुलमोहर और अन्य जातियों के फूलदार वृक्ष थे और इस मौसम में भी वृक्ष फूलों से लदे थे। आसमानी रंग की लंबी, चपटी बसें यदा-कदा रास्ते से गुजरतीं और कारें जो अलग डिजाइन की थीं।
    एक कार को रोककर मैंने पूछा तो कार-चालक ने बताया कि कुछ दूरी पर एक मिड-वे ढाबा और मैकेनिक की छोटी सी दुकान है। वह मुझे और मेरी कार को अजीब तरह से देखकर आगे चला गया।
    थोड़ा धक्का लगाकर, थोड़ा चलाकर किसी तरह मैं दुकान तक आया।
    मैकेनिक ने कहा, “यह गाड़ी कहाँ से लाए? इसके पार्ट्स तो शायद ही मिलें। खैर, आप इसे छोड़ जाइए।”
    ढाबे वाले ने मेरा नोट लेने से इन्कार कर दिया और मुझे अपनी भूख बैग में पड़े बिस्किट्स को खाकर मिटानी पड़ी।
बस के लिए मुझे लंबा इंतजार करना पड़ा। भूखा-प्यासा बेहद थका हुआ जब मैं बस से उतरा तो शाम के सात बज रहे थे। मेरा किराया भी किसी भले व्यक्ति ने दिया जब कंडक्टर मुझसे अपशब्द कह रहा था। अपनी कॉलोनी की जमीन पर जब मैंने पैर रखे तो लगा जैसे मैं पंख सा हल्का हो गया हूँ। मैंने खुली हवा में एक गहरी साँस ली। मेरा अपना गाँव, अपनी कॉलोनी। थकान और भूख-प्यास से घायल होते हुए भी मैं बेहद खुश था।
मैं घुमावदार सड़क पर नीचे अपने घर की ओर चला। अपने घर की सड़क पर मैंने एक महिला को देखा जो पीछे से माँ जैसी लग रही थी। 
“माँ ऽ ऽ ऽ” अपना बैग संभाले मैं पीछे दौड़ा। लंबोतरे चेहरे की उस महिला ने मुड़ कर देखा। वह माँ नहीं थी। मेरी ओर ध्यान से देखने पर उसके चेहरे पर दहशत के भाव आ गए और वह फुर्ती से सीढि़याँ उतर कर नीचे वाले क्वार्ट्स की तरफ चली गई। मेरा घर आ गया था। पता नहीं क्यों अंधेरा कुछ ज्यादा ही घिर आया था। रोड लाइट्स जल गईं थीं। सड़कें लगभग सुनसान थीं। इक्का-दुक्का जो लोग रास्ते में मिले थे मुझे देखकर सहम गए थे।
अब मैं घर के पिछले हिस्से में आ गया था। दो क्वार्ट्स के पिछले हिस्से आमने-सामने थे जो कि टिन शेड से ढँके हुए थे। अंदर जाने के लिए एक छोटा दरवाजा था। मैं वहाँ रुका तो हँसी ठहाकों की आवाज आ रही थी। तो, माँ यहाँ बैठी गप्पे लगा रही है।
मैंने दस्तक दी, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। दरवाजे और दीवार के बीच एक बड़ा गोलाकार छेद था, जिसमें मैंने अपना मुँह सटा दिया ताकि अंदर का दृश्य देख सकूँ। वहाँ दो महिलाएँ और दो लड़कियाँ बैठी गप्पे लगा रही थीं पर वहाँ मेरी माँ नहीं थी। मैं निराश हो गया। एक महिला कोई मजेदार वाकया सुना रही थी।
“मेरी दादी बताया करती थीं कि दादाजी की मृत्यु के बाद घर की लाइट्स अपने आप जल जाया करती थीं।” उनकी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि पेड़ पर एक बंदर जोर से खाँसा।
“यह कौन खाँस रहा है?” एक लड़की बोली। 
“मैंने अभी दरवाजे पर दस्तक भी सुनी थी।” छोटी बच्ची बोली। महिला ने जब दरवाजे की तरफ घूम कर देखा, मेरा चेहरा गोलाकार छिद्र में फँसा था, अस्त-व्यस्त! उनके मँुह से चीख निकल गई “भूऽऽऽ त ऽऽ।”
“अरे, देखो तो सही कौन है।” 
दूसरी महिला ने दरवाजा खोल दिया। 
“यह तो माथुर है। पी.डी। माथुर!” 
उनके चेहरे पर अजीब से भाव आ गए और खटाक से दरवाजा बंद हो गया। वे लोग अपने-अपने घर में घुस गए। मैं हतप्रभ सा खड़ा रहा कि किसी से माँ-पिताजी के बारे में पूछ सकूँ पर थोड़ी ही देर में पुलिस की जीप मेरे सामने थी। मुझे गिरफ्तार कर लिया गया।
“आखिर मेरा अपराध क्या है? मैं तो अभी-अभी यहाँ आया हूँ।”
“हमें पता है, तुम अभी आए हो। हमें बहुत दिनों से तुम्हारी तलाश थी।”
मेरी कोई बात किसी ने नहीं सुनी और मैं जेल में बंद कर दिया गया। मुझे वहाँ पुलिस वालों से ही पता चलाकि मैं यहाँ पावर हाउस में सीनियर इंजीनियर हूँ। बहुत सारी डिग्रियाँ हैं मेरे पास, पर मुझे पागलपन के दौरे पड़ते हैं। मैंने एक दिन पावर हाउस का सुपर कम्प्यूटर तोड़ डाला और उसके बाद कॉलोनी में उत्पात मचाया और एक छोटे बच्चे को नदी में फेंक दिया।
दो दिन से मैं एक चक्रव्यूह में फँसा हुआ था। बस जगहें परिचित थीं बाकी सब बदल गया था। और हर जगह एक प्रेमदीप माथुर था मेरे ही सदृश!
सुबह मुझे मानसिक अस्पताल ले जाया गया। जब मुझे अलग-अलग कक्षों में जाँच के लिए ले जाया जा रहा था, मैं अपनी चौकस नज़रों से अस्पताल का निरीक्षण कर रहा था कि कहीं किसी दरवाजे पर सुरक्षा कम हो और मैं भाग सकूँ। मैंने जाँचों में पूरा सहयोग दिया। अर्द्ध-रात्रि में, ऊँघते हुए सुरक्षा गार्ड को चकमा देकर मैं भाग निकला।
कितने साधन बदलते हुए मैंने वह 35 किमी की दूरी तय की जबकि मेरे पास एक पैसा भी नहीं था, इसे शब्दों में व्यक्त करना बेहद कठिन है। जब मैं उस मैकेनिक की दुकान तक पहुँचा तो सुबह के सात बज रहे थे। मैकेनिक की प्रतिभा का मैं कायल हो गया था क्योंकि जुगाड़ तकनीक से उसने मेरी कार को चलने योग्य बना दिया था। मैंने अपनी कीमती घड़ी उस मैकेनिक को प्रदान की और धन्यवाद दिया। मुझे अब इस मायाजाल से निकलना था पुलिस मुझे किसी भी क्षण गिरफ्तार कर सकती थी।
अब तक मुझे आभास हो गया था कि मैं समानान्तर विश्वों की अन्य समय रेखाओं पर भटक रहा हूँ उसी तरह जैसे किसी मैट्रो स्टेशन की येलो लाइन पर चलते-चलते गलती से कोई वॉयलेट लाइन और रेड लाइन पर चला जाए।
जब मैंने अपने हैड-सैट को हाई-फ्रीक्वेंसी पर सैट कर दिया था तो उसने मेरी मस्तिष्क तरंगों को इतना ऊर्जित और त्वरित कर दिया कि किसी क्षेत्र विशेष में जाने पर मैं खिंच कर किसी अन्य समानान्तर विश्व में चला गया था।
मुझे वह दुर्घटना वाली जगह और दिशा अच्छी तरह याद थी। मैं एक बार फिर अपनी कार को उसी जगह ले आया। अपनी दुनिया में वापस लौटने के लिए........या फिर कहीं और??
जब मेरी तंद्रा टूटी तो मैं उसी तिराहे पर था। मेरा फोन बज उठा। डॉ। घोष थे। “हम सब तुम्हें ढँूढ रहे हैं। तुम कहाँ चले गए थे।”
“वहीं रुकना, तुम्हारे माँ-पिताजी आ रहे हैं।” आधे घंटे में माँ-पिताजी मेरे सामने थे। मेरे आँसू नहीं रुक रहे थे। उस स्थिति का वर्णन करना असंभव है। जब कम्प्यूटर स्क्रीन से मेरी कार अचानक गायब हो गई और हैड-सैट से संकेत मिलने बंद हो गए तो डॉ। घोष और भगत परेशान हो गए थे। उन्होंने मेरे माँ-पिताजी व पुलिस को सूचना दे दी थी।
और यह थी एक सामान्य यंत्र को बनाते-बनाते एक महान आविष्कार होने की कथा!
 
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