विज्ञान कथा

(24/May/2018)

डिजिटल स्वरूप

कल्पना कुलश्रेष्ठ

जून माह की तपती दोपहर को काला कोट पहने मैं अपने ऑफिस की कुर्सी पर विराजमान था। हाथ में ठंडे मैंगो शेक का गिलास थामे मिसेज सत्या तिवारी मेरे सामने बैठी हुई थीं। हम दोनों के बीच रखी शीशम की बड़ी सी मेज पर कम्प्यूटर, फोन और मेरी फाइलें बेतरतीब ढंग से पड़ी थीं। सौर ऊर्जा से चलने वाले एसी ने कमरे को पर्याप्त ठंडा कर दिया था। 
मिसेज तिवारी के खूबसूरत चेहरे पर दुख के भाव छाए हुए थे। उनकी सफेद साड़ी, सूना माथा और खाली माँग मुझे विचलित कर रही थी।
“यह सामान्य मृत्यु नहीं है वकील साहब।’’ वह कह रही थीं।
“लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से साफ़ जाहिर है मैडम कि आपके पति प्रोफेसर अभिषेक तिवारी की मृत्यु हार्ट अटैक से ही हुई है।” मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की।
“एक माह पहले ही उनका पूरा चैक-अप हुआ था। वह बिलकुल स्वस्थ थे। लेकिन मृत्यु से कुछ दिनों पूर्व वह काफी परेशान से रहने लगे थे। उन्हें लगता था कि कुछ अशुभ घटित होने वाला है। आप शहर के जाने-माने वकील हैं मिस्टर ओंकारनाथ। मैं चाहती हूँ कि आप इस मामले की जाँच करें।” मिसेज तिवारी ने रुँधे स्वर में कहा।
“ठीक है। मै देखता हूँ इस केस में क्या हो सकता है।” मन ही मन गर्व से फूलते हुए मैंने सहमति में सिर हिलाया। वह मेरे एक रिश्तेदार के जरिए आई थीं इसलिए मैं वैसे भी उन्हें ना नहीं कह सकता था।
उनके जाने के बाद मैं टाई ढीली कर चैन से पैर फैलाकर बैठ गया। मेरी पी.ए.रुबी कोल्ड कॉफी बनाने में मगन थी। वह दरअसल एक ह्यूमन एंडरॉयड थी। मेरी विशेष फरमाइश पर कंपनी ने उसे बीते जमाने की मशहूर हीरोइन प्रियंका चोपड़ा जैसा लुक दिया था।
“दुनिया में तुमसे अच्छी कॉफी कोई नहीं बना सकता स्वीटी। जी करता है तुम्हारे हाथ चूम लूँ।” मैंने जानबूझकर उसे छेड़ा।
“ज़रूर वकील साहब’’ कहते हुए रुबी ने अपने हाथ बढ़ा दिए। उसके हाथों को छूते ही करंट के तेज झटके ने मेरा दिमाग ठिकाने पर ला दिया। कंपनी ने कैसी ज़बरदस्त प्रोग्रामिंग की थी उसकी। 
“मेरे अंदर लगे माइक्रोफोन का कनेक्शन सीधे आपकी पत्नी के स्मार्टफोन से है सर’’ रुबी ने मुस्करा कर कहा। 
‘‘ओह .....तो यह सब मेरी बीवी का किया-धरा था जो रुबी से जलती थी।’’ मैं गहरी साँस लेकर रह गया।
कॉफी पीकर तरोताजा हो मैं काम पर लग गया। मैंने इस केस को ‘ऑपरेशन डेथ’ के नाम से अपने कंप्यूटर में दर्ज कर लिया। यह एक हाई प्रोफाइल केस था। प्रोफेसर अभिषेक तिवारी जिस ‘यूनिवर्सल बायोइन्फॉर्मेटिक्स कंपनी’ में काम करते थे, वह कोई छोटी-मोटी कंपनी नहीं थी। न जाने कितने बड़े लोगों के उसमें शेयर थे। मुझे सावधानी से छानबीन करनी थी।
यों ही लगभग दस दिन बीत चले थे। इस बीच जो कुछ मेरे सामने आया, उससे मैं शंकित हो उठा था। निकट वर्षों में स्थापित प्रतिष्ठित यूनिवर्सल बायोइन्फॉर्मेटिक्स कंपनी यानी ‘यूबीसी’ के साथ कुछ विचित्र घटित हुआ था। कंपनी ने शानदार पैकेज पर उत्कृष्ट कम्प्यूटर व जैव विशेषज्ञों की नियुक्ति की थी। लेकिन कुछ समय बाद अधिकतर कर्मचारियो की प्राकृतिक या दुर्घटनावश मृत्यु हो गई थी। इस कारण कुछ लोग ‘यूबीसी’ को अभिशप्त मानने लगे थे तो कुछ का कहना था कि यह प्रतिद्वंद्वी कंपनियों का षड्यंत्र है । इन मौतों की तफ्तीश में कोई संदिग्ध बात सामने नहीं आई थी।
यकायक मेरे ऑफिस की खिड़की पर एक कबूतर फड़फड़ाया। आजकल की इस इलेक्ट्रॉनिक दुनिया में किसी सूचना को गुप्त रखना लगभग असंभव था अतः इस केस में मैंने संदेश भेजने का सदियों पुराना नॉन-इलेक्ट्रॉनिक तरीका अपनाया था। कबूतर को अंदर लेते हुए मैंने उसके पैरों में बँधा पत्र खोल लिया। लिखा था, “वे कहते हैं कि कंपनी का काम थ्री.डी। तरीके से होता है। लेकिन यहाँ कुछ गड़बड़ अवश्य है। कल यूबीसी सिटी में मिलिए।’’ आपका मिलिंद। 
मैं सोच में डूब गया। इस पत्र ने मेरी क्लाइंट मिसेज सत्या तिवारी के शक पर मोहर लगा दी थी। यह पत्र मेरे सहायक मिलिंद का था जो ऑफिस बॉय के रूप में दस दिनों पहले ‘यूबीसी’ में प्लांट किया गया था। अपने संपर्कों का इस्तेमाल करके बड़ी मुश्किल से मैंने उसे वहाँ रखवाया था। निश्चित ही उसे कोई महत्वपूर्ण सुराग हाथ लगा था।
कुछ घंटों बाद मेरी हाई स्पीड एयर कार यूबीसी सिटी की एयर पार्किंग में उतर चुकी थी। लिफ्ट द्वारा नीचे आकर यूबीसी के स्वागत कक्ष में बैठा मैं रिसेप्शनिस्ट कंगना को देख रहा था जिसकी निरंतर मुस्कान बता रही थी कि वह भी रुबी की तरह ह्यूमन एंडरॉयड थी।
मेरे चारों ओर काँच के बड़े-बड़े शोकेस थे। इनमें कंपनी के उत्पाद डिस्प्ले पर रखे गए थे। ये बायो-इलेक्ट्रॉनिक जंतु चूहा,नेवला,बिल्ली व तितली आदि थे जिनमें न्यूरो चिप इंप्लांट की गई थी। इन्हें रिमोट या अपने स्मार्टफोन द्वारा नियंत्रित कर मनचाहा कार्य करवाया जा सकता था। लोग अपने पालतू जानवरों को ट्रेनिंग देने की बजाय यही तरीका अपनाना पसंद करते थे। जिससे वे उन्हें अपने इशारों पर नचा सकें। मैंने वहाँ रखे रिमोट का बटन दबाया तो नेवला गोल-गोल घूमने लगा ।
मैं एक अमीर ग्राहक बनकर कंपनी से मिला था और अपने शिंहुआहुआ कुत्ते को रिमोट चालित बनवाना चाहता था। कंपनी के और भी कई उत्पाद थे। जैसे गर्भस्थ शिशु के शरीर में खराबी आने पर गर्भवती को अलर्ट भेजना संभव था, कृत्रिम बुद्धियुक्त कंप्यूटर थे जो मनचाहे लक्षणों वाले बच्चे का डी.एन.ए.डिजाइन कर सकते थे।
मुझे कॉफी देने आए व्यक्ति ने बड़ी सफाई से मेरी जेब में कुछ रख दिया था। वह मिलिंद था। मैं सतर्क हो उठा। यूबीसी से इधर-उधर की जानकारी लेकर में लौट आया। कार में बैठकर मैंने जेब से कागज का पुर्जा निकाला ।        
“जो कुछ जाना वह इतना भयानक है कि विश्वास नहीं होता। ये लोग तो.....इन्हें रंगे हाथों पकड़ने के लिए स्पेशल साइबर क्राइम सेल के साथ यूबीसी की गुप्त प्रयोगशाला पर छापा मारना होगा।” नीचे एक नक्शा बना था।
मैं तुरंत काम में लग गया। प्रशासनिक उच्चाधिकारियों से मिलकर उन्हें स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया। वे फौरन हरकत में आ गए। सही समय, सही स्थान का चयन और सटीक रणनीति आवश्यक थी। इस पूरे मामले को-ऑपरेशन डेथ-का कोड नेम देकर तैयारी शुरू कर दी गई ।
और पाँच दिन बाद। .......प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया पर अचानक  एक  ‘सुपर सर्जिकल स्ट्राइक’ की खबरें वायरल हो उठीं। ऑपरेशन डेथ-सफलता के साथ पूरा हो चुका था।
नई दिल्ली के किसी गुप्त स्थान पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनिंदा पत्रकारों और आला अधिकारियों के बीच अपराधी सिर झुकाए बैठे थे।
“क्या योजना थी आपकी?’’ एक पत्रकार ने पूछा। 
“हमें सामान्य जीवों को बायो-इलेक्ट्रॉनिक जंतुओं में बदलने में महारत हासिल थी। फिर हमारी टेक्निकल टीम ने मनुष्यों पर भी प्रयोग शुरू कर दिए। इन्हीं प्रयोगों के दौरान हमें सूझा कि क्यों न मनुष्य के मस्तिष्क को डिजिटाइज करने का प्रयास किया जाए। मस्तिष्क के न्यूरॉन और उनके कनेक्शन को स्मृतियों सहित स्कैन करके हूबहू वैसी ही डिजिटल प्रतिकृति कंपनी द्वारा विकसित क्वांटम कम्प्यूटर पर बनाई जाए। हम इसमें सफल रहे।
फिर हमने ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित किया जिसके द्वारा मस्तिष्क का डिजिटल स्वरूप बिलकुल वास्तविक जीवित मस्तिष्क की तरह कार्य कर सकता था। यह इतना हाईटेक था कि सुख-दुःख, संवेदनाओं व भावनाओं पर भी प्रतिक्रिया देता था। इसे इच्छानुसार नियंत्रित व निर्देशित किया जा सकता था। यही नहीं बल्कि इसमें स्मृतियाँ भी फीड या डिलीट की जा सकती थीं।”  
कंपनी के टेक्निकल हेड मिस्टर रजत ने गर्व भरे स्वर में कहा। सभी अवाक थे।
“एक तरह से देखा जाए तो हम मनुष्य के मस्तिष्क को गुलाम बनाने में सफल हो गए थे। फिर हमने इसका उपयोग कंपनी के फायदे के लिए करने का निश्चय किया। करोड़ों के पैकेज पर विशेषज्ञों की नियुक्ति करने का क्या औचित्य था, जब उनसे वही काम हम मुफ्त में भी ले सकते थे। दुनिया के लिए वे सभी मृत हैं पर हमारे कंप्यूटरों में मौजूद हैं और लगातार अनुसंधान, विकास व नए उत्पाद विकसित करने में लगे हुए हैं। आज हमारे अधिकतर उत्पाद इन्हीं ‘डिजिटल डेड डूअर्स’ यानी मृत डिजिटल कर्मियों की देन हैं।” यूबीसी  के फाउंडर मिस्टर सैमुअल दयाल ने भावहीन स्वर में बताया।           
“तो यह था थ्री डी तरीका। लेकिन इसका उनकी मृत्यु से क्या संबंध था?आप मस्तिष्क की कॉपी करने के बाद उन्हें नौकरी से निकाल भी तो सकते थे।’’ पत्रकारों के प्रश्न जारी थे।
“दरअसल एक तकनीकी अड़चन थी। मस्तिष्क को रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति जारी रहते हुए उसकी डिजिटल कॉपी तैयार करना संभव नहीं था। इसलिए कुछ विशेष उपायों द्वारा हम उन्हें सामान्य लगने वाली मृत्यु देते थे। आपको एक नमूना दिखाता हूँ।’’ कहते हुए मिस्टर सैमुअल ने अपने सामने रखा कंप्यूटर ऑन किया। स्क्रीन पर प्रोफेसर अभिषेक तिवारी का मुस्कराता चेहरा सामने था ।
“गुड मॉर्निंग। कैसे हैं आप?’’ मिस्टर सैमुअल ने पूछा ।
“अच्छा हूँ। हालाँकि रात को देर से सोया। बायो कंप्यूटर की डिजाइन देखता रहा। काफी लोग आए हैं। कंपनी की मीटिंग है क्या? मुझे तो कोई सूचना नहीं दी गई।” प्रोफेसर अभिषेक का शिकायती स्वर सुनाई दिया।
“यहाँ के दृश्य को स्कैन करके हमारा सॉफ्टवेयर इनके मस्तिष्क को संकेत भेज रहा है। वह स्वयं को यहाँ उपस्थित समझ रहे हैं। ये नहीं जानते कि ये मर चुके हैं क्योंकि हमने इनकी मृत्यु स्मृति मिटा दी है। यों भी शरीर का अस्तित्व मस्तिष्क के द्वारा ही अनुभव होता है। चेतना, भावना, संवेदना सब कुछ मस्तिष्क की ही तो करामात है।’’ कहते हुए मिस्टर दयाल ने कंप्यूटर पर कोई कमांड दी। तुरंत ही प्रोफेसर अभिषेक ने अपना सिर थाम लिया।
“माफ कीजिएगा। सिर में अचानक तेज दर्द उठ आया है। घर जाता हूँ और दवा खाकर आराम करता हूँ।” दर्द की अधिकता से उनकी आँखों में छलकता पानी साफ दिखाई दे रहा था।
यह कैसा भ्रम था? कैसा मायाजाल रचा था? कैसे थे ये रचयिता? जिन्होंने मानव को उसके जीवन-मरण का अंतर ही भुला दिया था। विष्णु भगवान द्वारा नारद मुनि को मायाजाल में फँसाने की कथा न जाने मुझे याद आ गई।
यूबीसी के भयानक खेल का पर्दा फाश हो चुका था दोषियों को गिरफ्तार करके कंपनी सील कर दी गईं थी। 
तीन दिन बाद। .....अपने ऑफिस में रुबी के हाथ की कॉफी पीते हुए मैं इस केस की पूरी कहानी उसे सुनाते हुए फीड करवा रहा था कि अचानक मिसेज तिवारी आ गईं। माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी, भरी हुई माँग, रंगीन बनारसी साड़ी और हाथों में चूडि़याँ देख कर मैं चौंक गया। होठों पर मधुर मुस्कान लिए प्रफुल्लित मुख के साथ वह मेरे सामने बैठ गईं। 
“आपके शक के कारण न जाने कितने लोगों की जान बच गई। वरना पता नहीं यह कब तक चलता रहता।” मैंने उनके लिए कॉफी बनाते हुए कहा।
‘‘मै आपको धन्यवाद देना चाहती हूँ वकील साहब। आपके कारण मैं अपने पति को वापस पा सकी। “ उनकी आँखों में नमी छलक आई।
“ये आप क्या कह रही हैं ? वह तो मर ...’’
मैं बुरी तरह चौंक उठा ।
“नहीं। .. .यह आपका दृष्टिकोण है। मैं ऐसा नहीं समझती। नश्वर शरीर का क्या है, वह तो किसी बीमारी या दुर्घटना में भी खराब हो सकता है। कल मैं उनसे मिली थी। उन्हें सब याद है। हमारा इतने बरसों का साहचर्य, साथ बिताया गया एक-एक पल, मधुर स्मृतियाँ सब कुछ।” उनकी नम आँखों में अतीत की परछाँइयाँ उतरने लगी।
“कानूनी और चिकित्सकीय दृष्टि से मृत उसे माना जाता है जिसका मस्तिष्क मर चुका हो यानी ब्रेन डेड। जबकि उनका मस्तिष्क तो बिलकुल सही ढंग से काम कर रहा है। क्या इस परिभाषा के अनुसार वह जीवित नहीं हैं? जब वह भी स्वयं को जीवित समझते हैं तो मैं कैसे उन्हें मरा हुआ स्वीकार करूँ?’’ मिसेज तिवारी के गोरे गालों पर आँसू बहने लगे।
“जहाँ तक मुझे लगता है मैडम, अब यूबीसी का सारा सॉफ्टवेयर नष्ट कर दिया जाएगा। कम्प्यूटर में मौजूद वह जीवन वास्तविक नहीं बल्कि आभासी है, एक भ्रम है।’’ मैंने धीरे से कहा।
‘‘ऐसा कभी नहीं होगा। सशरीर न सही पर अब भी वह मेरे पति हैं। वैसे भी अपने डिजिटल स्वरूप में वह अमर रहेंगे। मैं तो सदा-सुहागन हूँ। सावित्री यमराज से अपने पति के प्राण वापस ले आई थी। मैं भी उन्हें वापस पाने के लिए अंतिम साँस तक कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हूँ। इसमें आपको मेरी सहायता करनी होगी। करेंगे न? प्लीज़।’’ मिसेज तिवारी ने मेरे सामने हाथ जोड़ दिए।
यह सब क्या था? कितना विचित्र है मानव मन। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहूँ। मैंने गौर से उनकी ओर देखा। एक अनोखा तेज उनके मुख पर दीपशिखा सा चमक रहा था, सारे संशय निगलने को आतुर। मैं समझ गया था कि मुझे क्या करना है।  


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