विज्ञान कथा

(16/Jul/2016)

विज्ञान कथा

डिजिटल डीएनए डेटा बैंक  

सनोज कुमार

शाम का वक्त था। मैं लैब में डॉ. अय्यर के साथ काम में इतना मशगूल हो गया कि समय का पता ही नहीं चला। मेरा पद लैब असिस्टेंट का था। डॉ. अय्यर एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। डॉ. अय्यर बड़े ही जुझारू प्रवत्ति तथा इस संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक थे। वे एक बार किसी काम को हाथ में लेते तो उसे अंजाम तक पहुँचा कर ही दम लेते थे। इसीलिए उन्हें इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट का मुखिया बनाया गया था। इस प्रोजेक्ट के तहत समस्त भारतीयों का ब्लड सैंपल लेकर उससे डी.एन.ए. निकाल कर डिजिटल रूप में कम्प्यूटर में स्टोर करना था। इस तरह डिजिटल डी.एन.ए. डेटा बैंक बनाकर इंटरनेट के माध्यम से देश के चुनिन्दा संस्थानों को उपलब्ध कराना था। उस दिन का काम खत्म करने के बाद मैं डॉ. अय्यर के साथ बाहर निकला। अमूमन सबके जाने के बाद लैब मैं ही बंद करता था। लेकिन कभी-कभी डॉ. अय्यर अपने काम में इतना तल्लीन हो जाते कि समय का ध्यान ही नहीं रहता। उनकी वजह से मुझे भी बैठे रहना पड़ता। जैसे ही हम दोनों लैब से बाहर निकले, मैं तो ठंड से कांप गया। ‘क्या हुआ सुमित?’ डॉ. अय्यर ने पूछा।
‘कुछ नही सर’ मैं जवाब दिया। ‘यह कैप्सूल लो और मुंह में रख लो’ डॉ. अय्यर एक कैप्सूल देते हुए बोले। मैंने उस कैप्सूल को जैसे ही मुंह में रखा वैसे ही सर्दी लगना बंद हो गयी। मैं आश्चर्यचकित हो गया। ‘यह क्या है सर’ मैंने डॉ. अय्यर से सवाल किया।
‘क्या भाई, बाईसवी सदी में होकर यह प्रश्न करते हो? यह सी.बी.एच.टी. कैप्सूल है जो दो मध्यमों के बीच हीट ट्रांसमिशन को रोक देता है। इसलिए इसे खाते ही तुम्हे सर्दी लगना बंद हो गयी है। वैसे इस कैप्सूल का पेटेंट मिल गया है। फिर भी मैंने फैसला किया है कि देश हित में इस कैप्सूल का फार्मूला किसी प्राइवेट या विदेशी कंपनी को नहीं दूँगा वर्ना ये लोग इसका गलत फायदा उठायेगें। मेरा यह प्रोडक्ट सिर्फ भारत की गरीब जनता और बर्फीले तूफानों के बीच देश की सरहद की रक्षा करने वाले सैनिकों के लिए है।’
डॉ. अय्यर ने मेरे प्रश्न का जवाब दिया।
डॉ. अय्यर की लेबोरेटरी में पाँच वर्षों से काम कर रहा रहा था। काम के प्रति उनके समर्पण का मैं कायल था लेकिन उनके दिल में देश के लिए अथाह प्रेम जानकर मेरे मन में उनके लिए और भी आदर बड़़ गया था। सितम्बर का महीना था फिर भी सम्पूर्ण भारत में कड़ाके सर्दी पड़ रही थी। ऐसा मौसम तो पहले दिसम्बर और जनवरी में देखने को मिलता था। सितम्बर के महीने में ही कश्मीर से कन्याकुमारी तक बर्फीले तूफानों ने कहर मचा रखा था। पिछले 150 वर्षों में विश्व भर की जलवायु तेजी से बदल रही थी। उसकी एक खास वजह थी ग्लोबल वार्मिंग। इस वजह से उत्तरी ध्रुव में जमीं हुई सारी बर्फ पिघल चुकी थी। विंटर सोलिस्टस के दौरान सम्पूर्ण भारत बर्फीले तूफान आने लगे थे और समर सोलिस्टस में भयानक गर्मी। अब तक हिमालय की पूरी बर्फ पिघल चुकी थी।
बाईसवी सदी में पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन की वजह से जीवन बहुत संघर्षमय हो गया था। जीवन जीना बिना प्रौद्योगिकी के संभव नहीं रह गया था। मसलन सर्दियों में -200ब् तापमान में जिन्दा रहना। हम सब प्रौद्योगिकी की वजह से जिन्दा थे अथवा प्रौद्योगिकी के विकास की होड़ की वजह से जीवन का यह हाल हुआ था। फिर भी विश्व के सारे देश इसी की होड़ में दौड़ रहे थे। समस्त विश्व में 300 से ज्यादा देश बन चुके थे। लगभग सभी देशांे के पास अंतरिक्ष में अपने-अपने सैटेलाइट थे जो कभी-कभी एक दूसरे की ऑर्बिटल को क्रॉस कर जाते थे। जिसकी वजह से कभी-कभी आपस में टकरा जाते। सम्बंधित देशों को अरबों-खरबों डॉलर को नुकसान उठाना पड़ता था। घटना अंतरिक्ष में घटती और युद्ध धरती पर सम्बंधित देशो के बीच छिड़ जाता।
विश्व के सभी देशों से गरीबी लगभग खत्म हो चुकी थी जिसमें जलवायु परिवर्तन काफी हद जिम्मेदार थी। गरीब जनसंख्या संसाधनों के अभाव में कुदरत के कहर से बच नहीं पाई और बड़ी संख्या में काल कवलित हो गयी थी।
अगले दिन सुबह जब मैं लैब पहुँचा थोड़ी देर बाद डॉ. अय्यर अपने कनिष्ठ सहयोगी डॉ. सुयश डिसूजा के साथ लैब पहुँचे। अय्यर सर थोड़ा परेशान दिख रहे थे। डॉ. डिसूजा -क्या बात है? सर, आप टेंशन में दिख रहे हैं। 
डॉ. अय्यर - नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है डिसूजा। बस यूं ही प्रोजेक्ट के बारे में सोच रहा था।
डॉ. डिसूजा - सर आप निश्चिंत रहिए। हमारा प्रोजेक्ट निश्चित रूप से सफल होगा। आपका मार्गदर्शन बेकार नहीं जायेगा। भारत अब तक विश्व की महाशक्ति बन चुका था। परमाणु शक्ति के साथ-साथ भारत विश्व का प्रथम अपराध मुक्त देश बनने जा रहा था क्यांेकि हमारा संस्थान सभी भारतीयों का डी.एन.ए. डेटा बैंक बना रहा था। डॉ. अय्यर इस प्रोजेक्ट के डायरेक्टर थे। डॉ. अय्यर काफी परेशान थे। उन्हें लग रहा था कि उनका प्रोजेक्ट कही फेल न हो जाये। उनके इस प्रोजेक्ट का मानवाधिकार के नाम पर कुछ लोग पुरजोर विरोध भी कर रहे थे। उन लोगों को इस प्रोजेक्ट के माध्यम से व्यक्ति की आजादी छिनने डर सता रहा था क्योंकि हर व्यक्ति के डिजिटल डी.एन.ए. कोडिंग के साथ उसकी पहचान, पता, बैंक अकाउंट, पासपोर्ट, पेन तथा आधार अंक को जोड़ने की भी व्यवस्था थी। जबकि डॉ. अय्यर और उनकी टीम इस प्रोजेक्ट को मानवमात्र एवं समाज की सुविधा और रक्षा के लिए साकार करने के लिए दिन-रात एक कर रही थी। उन्होंने भारत सरकार के सहयोग से सभी भारतवासियों का डी.एन.ए. डेटा बैंक तैयार किया था। उन्हीं के परामर्श पर भारत सरकार ने सभी विदेशी नागरिकों के लिए डी.एन.ए. डेटा उपलब्ध करना वीजा के लिए अनिवार्य कर दिया था।
सभी लोग अपने-अपने काम में जुट गए। दोपहर के एक बज गए तो एक बार फिर लंच टेबल पर हम सब इक्कठे हुए। डॉ. अय्यर की लैब की एक खास बात यह थी कि कोई भी छोटा-बड़ा चाहे साइंटिस्ट हो या असिस्टेंट या रिसर्च स्कॉलर हो, लंच सब साथ में ही करते थे जिससे एक-दूसरे के प्रति कम्फर्ट लेबल बढ़ जाता था और प्रोफेशनल और पर्सनल रिलेशन भी बेहतर हो जाते थे। डॉ. मरियम प्रोजेक्ट की एसोसिएट डायरेक्टर थी। अक्सर वह लंच के दौरान काफी जानकारी देती रहती थी।
डॉ. मरियम- (सभी का ध्यानाकर्षित करते हुए) हमारा प्रोजेक्ट अब अंतिम चरण में पहुँच चुका है। लगभग 90ः कार्य पूरा हो चुका है। अब डी.एन.ए. सैंपलो का डिजिटलाईजेशन करना रह गया है। इस काम के लिए सेंट्रल इंस्टिट्यूट से प्रोफेसर असलम आने वाले है जो हमारी मदद करेगें। अगर हमारा प्रोजेक्ट सफल हो गया तो बहुत सारी समस्याएं हल हो जायेगी। वो कैसे मैडम ? मैंने उत्सुकतावश पूछा। डॉ. मरियम - डी.एन.ए. डेटा की वजह से काफी समस्याएं खत्म हो सकती है। जैसे चिकित्सा के क्षेत्र में ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन में बड़ी सहायता मिल सकती है। गुमशुदा व्यक्तियों, बच्चों एवं महिलाओं की तलाश में भी काफी मददगार साबित हो सकता है। मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। मैंने दुबारा प्रश्न किया।
‘मैडम, प्लीज विस्तार से समझाइए’
​डॉ. मरियम - ‘गुमशुदा व्यक्ति का ब्लड सैंपल लेकर उसके डी.एन.ए. को डी.एन.ए. डेटा बैंक से मिलान करने पर उससे संबंधित पूरी जानकारी डिजिटल डी.एन.ए. डेटा कोडिंग से लिंक होने के कारण मिल जायेगी और उसकी पहचान करके उसके घर भेजा जा सकेगा। इसी तरह भ्रष्टाचार सहित आतंकवादी घटनाओं पर लगाम लगाई जा सकती है। देश में वैध तरीके से आने वाले सभी विदेशी नागरिको को भी ब्लड सैंपल अथवा डी.एन.ए. डेटा भारत सरकार को उपलब्ध करना अनिवार्य करने से आतंकवादी घटनाओं में लिप्त लोगों की तुरंत पहचान की जा सकेगी। रेप की घटनाओं में तुरंत अपराधी की पहचान की जा सकेगी क्योंकि महिला अथवा घटना स्थल से लिए गये सिमेन से डी.एन.ए. निकाल कर उसकी डी.एन.ए. डेटा बैंक से मिलन करने पर तुरंत रेपिस्ट की पहचान हो जायेगी और ठोस सबूत की तरह इस्तेमाल करके अपराधी को तुरंत कड़ी सजा देकर ऐसे घिनौने अपराध पर रोक लगाई जा सकती है।’
डॉ. मरियम का जवाब सुनकर हम सबने तालियां बजाकर अपने प्रोजेक्ट की उपयोगिता पर खुशी जाहिर की और लंच के बाद फिर हम सभी अपने कामों में जुट गए। कुछ महीनों बाद यह प्रोजेक्ट एक कदम आगे बढ़ चुका था। भारत सरकार ने समस्त भारतवासियों का सारा डी.एन.ए. डेटा, रीजनल डी.एन.ए. डेटा बैंक तथा सेंट्रल डी.एन.ए. डेटा बैंक को जारी करने का आदेश दे दिया। उस दिन डॉ. अय्यर समेत टीम के सभी सदस्यों की खुशियों का ठिकाना नहीं था। सभी लोग एक दूसरे को बधाईयाँ दे रहे थे। अगले महीने की दस तारीख को संस्थान के सेंट्रल हाल में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें भारत के प्रधानमंत्री ने सभी वैज्ञानिकों की उपस्थिति में डी.एन.ए. डेटा बैंक को इंटरनेट से जोड़ कर इस प्रोजेक्ट को देश को समर्पित कर दिया। उसी दिन शाम को प्रोजेक्ट की सफलता पूर्वक क्रियान्वन को लेकर भारत सरकार की ओर से डॉ. अय्यर और टीम के सभी सदस्यों के सम्मान में रात्रि भोज पर देश के सम्मानित नागरिकों, वरिष्ठ वैज्ञानिकों, शोधकर्तायो को आमंत्रित किया। भोज के दौरान सभी लोगों ने डॉ. अय्यर की योग्यता और नेतृत्व क्षमता का जिक्र करते हुए मुबारकबाद दीं।
एक वर्ष बाद भारत सरकार ने एक रिपोर्ट जारी की जिसमें कहा गया कि स्वास्थ्य के क्षेत्र अभूतपूर्व सुधार आया है। अपराध खासकर मर्डर, रेप आदि में संलिप्त अपराधियों के डी.एन.ए. का डी.एन.ए. डेटा बैंक से मिलान की पुष्टि होने से इस तरह के अपराधों में तेजी से गिरावट दर्ज की गयी। उसी दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ की वार्षिक रिपोर्ट में भारत दुनिया का सबसे सुरक्षित, भ्रष्टाचार मुक्त, अपराध मुक्त और गरीबी मुक्त देश घोषित किया गया। आने वाले गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति द्वारा डॉ. अय्यर को सर्वोच्च वैज्ञानिक पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गयी जो हमारे संस्थान तथा समस्त कर्मचारियों के लिए गौरव की बात थी। मैं भी भावुक हो गया था क्योंकि ऐसे महान व्यक्ति के सानिध्य में काम करना मेरे लिए भी किसी पुरस्कार से कम नहीं था।

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