विज्ञान कथा

(07/Jul/2015)

भविष्य

दिनांक 5 जनवरी, 2030 को दूरदर्शन के प्रातः कालीन समाचार बुलेटिन में यह मुख्य समाचार प्रसारित हुआ-
‘‘इस वर्ष चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार सुप्रसिद्ध भारतीय चिकित्सक डॉ. दिवस को प्रदान किया गया है। पैंसठ वर्षीय डॉ. दिवस नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पांचवें भारतीय हैं।
डॉ. दिवस को कैंसर के अचूक टीके की खोज के लिए इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है....’’
अगले दिन स्टाकहोम की डेटलाइन के साथ सभी समाचार पत्रों में यह समाचार सुर्खियों में प्रकाशित हुआ। ‘रायटर’ तथा ए.एफ.पी. द्वारा प्रेषित समाचार के अनुसार: नोबेल पुरस्कार-समिति ने पुरस्कार की घोषणा करते हुए कहा कि जानलेवा रोगों के इस सबसे बड़े अविजित क्षेत्र में अद्वितीय सफलता और अचूक टीके की खोज से डॉ. दिवस ने मानवता की महान सेवा की है। इस शताब्दी की यह महानतम खोज है और इससे प्रति वर्ष विश्व के करोड़ों कैंसर रोगियों को जीवनदान मिल सकेगा। परीक्षणों के दौरान भारत में इस टीके से सैकड़ों रोगियों की जान बचाने में सफलता मिली है। पिछले शताब्दी इस रोग से संघर्ष में निकल गई थी और विरासत में यह रोग इस सदी को मिला। लेकिन अब डॉ. दिवस के टीके से इस प्राणलेवा रोग के क्रूर पंजों से मानवता को बचाने में सफलता मिल सकेगी। भारत में टीके का प्रयोग प्रारंभ हो चुका है और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे मान्यता दे दी है। इस टीके से कैंसरग्रस्त कोशिकाओं की वृद्धि तो रुकती ही है, उनमें उपस्थित दूषित पदार्थ भी नष्ट हो जाता है। इस कारण कैंसर की रसौलियों से रोगी कोशिकाएं न तो रोग फैला सकती हैं और न वे रसौली में ही रोगी बनी रह सकती हैं।
डॉ. दिवस ने कैंसर का कारण कोशिकाओं के न्यूक्लिइक अम्ल में विकार मानते हुए विषाणु टीके का आविष्कार किया तो स्वस्थ कोशिकाओं को किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाए बिना सीधे कैंसर कोशिकाओं पर प्रभाव डालता है। टीके में उपस्थित विशिष्ट विषाणु शरीर में पहुंचते ही सीधे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। यह ‘प्रोटीन’ के खोल में भरा ‘न्यक्लिइक अम्ल’ कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं में कारतूस से छूटे बारूद की तरह पहुंच जाता है। फिर यह रोगी कोशिकाओं के विकारग्रस्त ‘न्यूक्लिइक अम्ल’ के प्रभाव को नष्ट कर देता है, जिस कारण कैंसरग्रस्त कोशिकाएं सामान्य टूटी-फूटी कोशिकाओं की भांति शरीर में जज्ब हो जाती हैं। रक्त कैंसर अर्थात लिंफोब्लास्टिक ल्यूकेमिया में तो टीका लगने के तुरंत बाद श्वेत रक्त-कणिकाओं की संख्या घटने लगती हैं और कुछ सप्ताहों के भीतर ही सामान्य हो जाती है। इसके बाद अस्थि-मज्जा में सामान्य रूप से ष्वेत रक्त कणिकाएं बनने लगती हैं...
डॉ. दिवस के पास विश्वभर से बधाई के तार, केबल और पत्रों का अटूट सिलसिला शुरू हो गया। कैंसर के रोगियों ने अपने पत्रों में उन्हें कोटिशः बधाइयां दीं और जीवनदान के लिए हार्दिक आभार व्यक्त किए।
उन्हीं दिनों की बात है यह।
एक दिन अपनी डाक के ढेर में उन्हें एक पत्र मिला, जिस पर संयुक्त राज्य अमेरिका की मुहर लगी थी। पत्र कैलिफोर्निया स्थित ‘अंतर्राष्ट्रीय हिमीकरण संस्थान’ के निदेशक द्वारा भेजा गया था। लिखा थाः

‘‘प्रिय डॉ. दिवस,
कैंसर जैसे जानलेवा रोग के उपचार के लिए अचूक टीके की खोज करके आपने मानवता की महान सेवा की है। हमारे संस्थान की ओर से हार्दिक बधाई स्वीकार करें। एक ओर जहां आपने विश्व के करोड़ों जीवित कैंसर-रोगियों में जीवन की नई आशा का संचार किया है, वहीं पुनर्जीवन की आशा में द्रव नाइट्रोजन भरे क्रायोकैप्सूलों में पड़े हिमीकृत रोगियो के लिए भी एन जीवन की संभावना के द्वार खोल दिए हैं।’’
इस पत्र के माध्यम से हमें आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि हमारे इस संस्थान की स्थापना मानव को घातक जानलेवा रोगों से मुक्ति दिलाने के महान उद्देश्य से की गई थी, ताकि उन्हें समय आने पर रोग से मुक्ति करके नया जीवन दिया जा सके और जीवन के शेष वर्ष वे सुख के साथ जी सकें। संस्थान की स्थापना पिछली शताब्दी में सन 1984 में की गई थी और इसे विश्व के अधिकांश देशों से अनुदान मिलता रहा है। संस्थान में विश्व के सभी देशों के वैज्ञानिक अनुसंधान में सहयोग दे रहे हैं। आपको यह मालूम होगा कि इसी राज्य के प्रोफेसर जेम्स एच.बेडफोर्ड ने 1967 में कैंसर के कारण मौत के मुंह में जाने से पहले यह इच्छा व्यक्ति की थी कि मरने से पहले उनको हिमीकरण की विधि से जमा दिया जाए। बेडफोर्ड अपने इसी सपने के साथ सो गए कि कभी कैंसर का अचूक इलाज संभव हुआ तो शायद वे पुनः जिलाए जा सकेंगे। उन्होंने इस कार्य के लिए 42ए200 डॉलर की धनराशि दी थी और दो लाख डॉलर की संपत्ति ‘हिम-जैविक विज्ञान (क्रायोबायोलाजी) की सेवा के लिए दान कर दी थी। इस धनराशि से उनके नाम पर ‘बेडफोर्ड फाउंडेशन फॉर क्रायोबायोलाजी’ की स्थापना की गई। इस दिशा में लोगों की रुचि बढ़ती गई। दुःसाध्य रोगों से लोगों को मुक्त करने के उदद्ेश्य से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के आधार पर 1984 में हमारे इस हिमीकरण संस्थान की स्थापना की गई। वर्ष-दर-वर्ष संस्थान में आधुनिकतम उपकरण और अन्य सुविधाएं जुटाई गईं और हमें गर्व है कि आज यह विश्व का सर्वोत्तम हिमीकरण संस्थान है।
संस्थान में हम विगत 46 वर्षों में 175 व्यक्तियों का हिमीकरण कर चुके हैं। इनमें से 110 व्यक्ति कैंसर तथा शेष अन्य जानलेवा लोगों से पीड़ित थे। आज वे सभी भविष्य में पुनर्जीवित होने की आशा के साथ संस्थान के क्रायोटोरियम में द्रव नाइट्रोजन के कैप्स्यूलों के भीतर सोए हुए हैं।
महोदय, अब वह शुभ दिन आ गया है जब हम क्रायो कैप्स्यूलों में पड़े कैंसर के रोगियों को ‘जगा’ कर पुनर्जीवन का महान प्रयोग प्रारंभ कर सकते हैं। जिस प्रकार परीक्षणों के दौरान हजारों कैंसर रोगियों को जीवनदान मिला, हमें विश्वास है, उसी तरह हमारे संस्थान में वर्षों से नवजीवन की आस में हिमीकृत कैंसर रोगियों के शरीर में भी प्राणों का संचार हो सकेगा। संस्थान के प्रबंध-मंडल ने आपकी खोज से आशान्वित होेकर हिमीकृत कैंसर-रोगियों को ‘जगाने’ और आपके द्वारा आविष्कृत टीके से उनका उपचार करने का निर्णय लिया है। टीके का रक्त कैंसर अर्थात् लिंफोब्लास्टिक ल्यूकेमिया के रोगियों पर तुरंत असर होेता है, इसलिए सबसे पहले प्रोफेसर आस्टिन को चुना गया है। वे विगत 45 वर्षों से क्रायोकैप्स्यूल में सोए हुए हैं। रक्त कैंसर के कारण अंतिम सांस लेने से पूर्व ही उनकी इच्छानुसार उनका शरीर द्रव नाइट्रोजन में सुरक्षित रख दिया गया था। प्रोफेसर आस्टिन को जिलाने के इस प्रथम प्रयोग के अवसर पर यह संस्थान आपको सादर आमंत्रित करता है। हमारी हार्दिक अभिलाषा है कि हिमीकरण से पुनर्जागरण के इस ऐतिहासिक प्रयोग के अवसर पर प्रो.आस्टिन के शरीर में कैंसर का टीका आपके ही कर कमलों से लगे और आपके ही हाथों उन्हें नई जिंदगी मिले।
डॉ. दिवस की स्वीकृति मिलने के बाद उक्त प्रयोग की तिथि 15 मई 2030 तय कर दी गई।
उस दिन ‘अंतर्राष्ट्रीय हिमीकरण संस्थान’ में प्रातः से ही भारी चहल-पहल शुरू हो गई थी। डॉ. दिवस अमेरिका आ गए थे। उनके अतिरिक्त विश्व के विभिन्न देशों के अनेक प्रख्यात चिकित्सक तथा हिम-जैविकीविद् भी वहां उपस्थित थे। इनमें डॉ. कुजिनोव, डॉ. मुकल मेहता और डॉ. बर्नाड जैसे वैज्ञानिक भी थे, जिन्होंने सुदूर मंगल ग्रह तथा उससे भी आगे की अंतरिक्ष यात्राओं के लिए मनुष्य के हिमीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण खोजें की थीं।
डॉ. मुकुल मेहता ने चेतनावस्था में ही यौगिक क्रियाओं से समाधि की अवस्था प्राप्त करने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया था। उन्होंने सिद्ध किया था कि भौतिक परिस्थितियों में परिवर्तन किए बिना भी व्यक्ति के स्वैच्छिक या कृत्रिम रूप से प्रेरित मानसिक नियंत्रण से सुसुप्तावस्था अथवा समाधि की स्थिति बनाई जा सकती है। इस स्थिति में हिमीकरण के विपरीत वयक्ति की त्वचा और मस्तिष्क तो चेतन तथा अत्यधिक संवेदनशील रहते हैं, लेकिन उसकी ऑक्सीजन की आवश्यकता लगभग नगण्य हो जाती है। शरीर की सभी क्रियाएं धीरे-धीरे रुक जाती है और व्यक्ति समाधि की अवस्था में पहुंच जाता है। इस विधि से लंबी अवधि तक समाधि की संभावनाओं पर वे आगे अनुसंधान कर रहे थे।
हिम-जैविकीविदों, चिकित्सकों और सम्मानित व्यक्तियों की उपस्थिति में 15 मई को प्रायः छह बजे विश्वभर में अपनी तरह के पहले, अनूठे प्रयोग का शुभारंभ हुआ। प्रोफेसर आस्टिन का ‘फ्लास्क’ प्रयोगशाला में लाया गया और द्रव नाइट्रोजन से उनका शरीर बाहर निकालने से पूर्व संस्थान के महानिदेशक डॉ. नेल्सन ने अतिथि वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और सभी उपस्थित सम्मानित सदस्यों का स्वागत करते हुए संस्थान के इतिहास, उद्देश्य और प्रगति पर प्रकाश डाला तथा इस बात पर हर्ष व्यक्त किया कि उनके हिमीकरण संस्थान में 175 व्यक्ति क्रायोकैप्स्यूलों उर्फ ‘फ्लास्कों’ में नए जीवन के मीठे सपनों के साथ सोए हुए हैं।
उन्होंने कहा, इन्हें पुनर्जीवन प्रदान करना तो महान वैज्ञानिकों और चिकित्सकों की खोजों पर निर्भर करता है, लेकिन उन खोजों का व्यावहारिक प्रयोग करके उन्हें ‘जगाना’ संस्थान का पुनीत कर्तव्य है। डन्होंने संस्थान में हिमीकृत रोगियों के संदर्भ में डॉ. दिवस की महान खोज का वर्णन किया और अंत में घोषणा की कि हिमीकृत प्रोफेसर आस्टिन को जगाने के लिए कैंसर का टीका स्वयं इसके आविष्कारक डॉ. दिवस लगाएंगे। इस घोषणा पर लोगों ने तालियां बजाकर हर्ष व्यक्त किया।
महानिदेशक डॉ. नेल्सन ने प्रोफेसर आस्टिन का परिचय देते हुए कहा कि उन्हें संस्थान में 18 जनवरी 1985 को क्रायोकैप्स्यूल में सुलाया गया था। तत्कालीन रिकॉर्ड के अनुसार प्रोफेसर आस्टिन रक्त कैंसर से पीड़ित थे और उनके जीने की कोई भी संभावना शेष नहीं रह गई थी। चिकित्सकों ने उन्हें ला-इलाज घोषित कर दिया था। ऐसी स्थिति में उन्होंने संस्थान से अपना हिमीकरण करने की प्रार्थना की। वे कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में साहित्य के प्राध्यापक थे। हिमीकरण के समय उनके 20 तथा 27 वर्ष के दो पुत्र तथा 22 वर्ष की एक पुत्री थी। पत्नी की उम्र तब 50 वर्ष थी।
डॉ. नेल्सन ने मुस्कुराते हुए बताया कि प्रो. आस्टिन को अपने पारिवारिक जनों के आखिरी चुंबनों की अब भी सुखद याद होगी। वे शांति के साथ सोए थे और अब 45 वर्ष बाद और भी अधिक शांति एवं सुख के साथ जागेंगे।
वहां उपस्थित बूढ़े लोगों को सारी कार्यवाई कुतूहलपूर्ण लग रही थी और वे भारी संदेह के साथ प्रयोग की प्रतीक्षा कर रहे थे। कई लोगों को लग रहा था जैसे पिरामिडों में पाई गई किसी ‘ममी’ को जिलाने के प्रयास किए जा रहे हों। स्टेनलेस स्टील के चमकते हुए थर्मसनुमा क्रायोकैप्स्यूल पर सभी की आंखें टिकी हुई थीं। विभिन्न देशों के पत्रकार वहां उपस्थित थे और विश्वभर में प्रयोग की हर कार्यवाई को उपग्रह संचार प्रणाली से प्रसारित करने के लिए टेलीविजन कैमरों की आंखें भी क्रायोकैप्स्यूल वैज्ञानिकों तथा उपकरणों पर टिकी थीं।
प्रयोग प्रातः ठीक 4 बजे प्रारंभ हुआ। चमकते क्रायोकैप्स्यूल को खोलकर प्रोफेसर आस्टिन का शरीर सावधानी पूर्वक, धीरे-धीरे बाहर निकाला गया। द्रव नाइट्रोजन में 45 वर्षों से पड़ा उनका शरीर हिमीकृत हो चुका था। धीरे-धीरे प्लास्टिक का खोल भी हटा दिया गया। उनके बाद पैर की फीमोरल धमनी से धीरे-धीरे शरीर में भरा हुआ ठंडा डाइमिथाइल सल्फाइड का घोल निकाल लिया गया। इसी रसायन के कारण उनके शरीर की कोशिकाएं सुरक्षित रही होंगी। इसके बाद धीरे-धीरे शरीर का तापमान बढ़ाया जाने लगा। साथ ही डाइमिथाइल सल्फाइड पूरी तरह निकाल लेने के बाद कलाइयों से उनके शरी में खून चढ़ाया जाने लगा।
संस्थान के प्रमुख हिम-जैविकीविद डॉ.असिमोव ने शीशे के उस पूर्णतः प्रतिरक्षित कमरे के भीतर तापमान नियंत्रण प्रणाली का एक बार पुनः परीक्षण किया। द्रव नाइट्रोजन में -196 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 45 वर्षों तक सोया प्रोफेसर आस्टिन का शरीर बढ़ते तापमान के साथ धीरे-धीरे ढीला होता जा रहा था। तापमान में अंश-दर-अंश वृद्धि होती जा रही थी। थर्मामीटरों में पारा ऊपर चढ़ रहा था।
कमरे में इतने लोगों की उपस्थिति के बावजूद खामोशी छोई हुई थी। लोगों को अपने हृदय की घड़कनें तक सुनाई दे रही थीं। कुतुहल और उत्सुकता में पल-पल बीतते समय का अहसास ही नहीं हो पा रहा था।
उधर घड़ी के बदलते अंकों के साथ तापमान शून्य तक पहुंच गया। प्रोफेसर का शरीर निस्पंद पड़ा था, जैसे कड़ाके की सर्दी में कोई मेंढक दम साधकर समाधिस्त पड़ा हो या चेरी की कोई कली शीत ऋतु में सोई हुई हो- ‘वसंत की प्रतीक्षा में, जो बढ़ते तापमान के साथ-साथ वसंत में खिल उठेगी।’
प्रोफेसर आस्टिन के प्राणों को जगाने के लिए भी तो हिम-जैविकीविद एक नया वसंत लाने का प्रयास कर रहे थे- जब हिमीकृत शरीर में प्राण जाग उठेंगे और रोगमुक्त होकर उम्र की शाख पर खिल उठेंगे।
‘अद्भुत! रोमांचक!’ डॉ. असिमोव की आवाज खामोशी में गूंज उठी, ‘पिछली 45 वर्षों की अवधि भी इतनी लंबी अनुभव नहीं हुई होगी, जितनी यहां प्रतीक्षा की ये घड़ियां अनुभव हो रही है। हर पल युगों लंबा महसूस हो रहा है। बेहद रोमांचक लग रहा है।’
‘उठिए प्रोफेसर आस्टिन! सुबह हो गई है। अब उठिए भी!’ डॉ. असिमोव ने कुछ ऐसी मुद्रा बनाकर अनुनय भरे स्वर में कहा कि कमरे में लोगों की हंसी बिखर गई। वातावरण में पारे की लकीर 25 डिग्री सेंटीग्रेड को छूकर आगे बढ़ गई। धीरे-धीरे तापमान ‘मैस्कुलिन कंफर्ट जोन’ में पहुंच गया।
डॉ.असिमोव ने प्रतिरक्षित कक्ष की पारदर्शी दीवार से भीतर की ओर जुड़े लंबे सफेद दस्तानों में हाथ डालकर कक्षा के भीतर यथास्थान रखी हुई सुई उठाई और उसमें रक्त को जमने से रोकने वाले तथा उत्तेजक रसायनों व शरीर की चैतन्य बनाने के लिए अन्य आवश्यक प्राणदायक दवाइयों की निर्धारित मात्रा प्रोफेसर आस्टिन के शरीर में प्रविष्ट करा दी। कक्ष में ऑक्सीजन की समुचित मात्रा निरंतर प्रवाहित हो रही थी। रोमांच के वे चरम क्षण थे और लोग दिल पर हाथ रखे प्रतीक्षा की घड़ियां गिन रहे थे....
सूर्य की किरणें फूट रही थीं, जब प्रोफेसर आस्टिमन के शरीर में गर्माहट आई और हल्की, बहुत हल्की कंपकंपी हुई। तभी डॉ.असिमोव चिल्लाए- ‘हम सफल हो गए हैं! हे ईश्वर, हम सचमुच सफल हो गए हैं।’
तभी उपस्थित वैज्ञानिक, चिकित्सक तथा अन्य व्यक्ति खुशी से झूम उठे। लेकिन डॉ. असिमोव ने अपनी उत्तेजना पर नियंत्रण करते हुए कहा, ‘कृपया शांत रहे, प्रोफेसर आस्टिन जाग रहे हैं। उनकी मांसपेशियों ने ऊर्जा का निर्माण शुरू कर दिया है। वे धीरे, बहुत धीरे सांस लेने लगे हैं। आप लोगों से प्रार्थन है, प्रयोग को सफलतापूर्वक आगे बढ़ने दें और आगे की कार्यवाई बाहर टेलीविजन पर देखें।’
इस अनुरोध के साथ ही भीतर बैठे सम्मानित व्यक्ति धीरे-धीरे बाहर चले गए। कक्ष के पास केवल डॉ. दिवस, डॉ.असिमोव, डॉ तथा दो नर्सें रह गई। हां, दस्तानों में हाथ डाले डॉ. दिवस टीके की सुई थामें तत्पर खड़े थे।
तभी कक्ष से जुड़े जटिल यंत्रों में से एक यंत्र की सुई हिली और डॉ. असिमोव खुशी से चीखे, ‘शुरू हो गई। दिल की सामान्य धड़कनें भी शुरू हो गई हैं। शरीर का तापमान भी सामान्य हो गया है।’
डॉ. दिवस धीरे-धीरे जागते हुए प्रोफेसर आस्टिन के शरीर में हो रहे परिवर्तनों को देख रहे थे और टीके की सुई लगाने के लिए सही समय का इंतजार कर रहे थे। तभी तापमान सामान्य हो गया। प्रोफेसर के शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस पर स्थित हो गया। उनके शरीर में जीवन का संचार हो गया था। वैज्ञानिक यंत्र बता रहे थे कि उनके दिल की धड़कने, नाड़ी और सांस की गति लगभग सामान्य हो गई हैं। इसी समय प्रोफेसर ने जैसे दर्द से अपने हाथ-पैर हिलाए और उनके मुंह से हल्की ‘आह’ निकली! बस, यही क्षण था जब डॉ. दिवस ने अपने हाथों में पकड़ी कैंसर के टीके की सुई प्रोफेसर आस्टिन की बांह में चुभो दी।
प्रोफेसर के मुंह से जैसे नींद में ही हल्की ‘उफ’ की आवाज आई और वे शांत पड़े रहे।
डॉ.असिमोव ने भी निर्धारित मात्रा में पोषक घोल तथा अन्य जीवनदायी रसायनों की सुइयां लगाई। दाएं हाथ की कलाई से बूंद-बूंद रक्त उनके शरीर में अब भी पहुंच रहा था। डॉ. नेल्सन ने तभी बहुत ही धीमे सवर में सुमधुर संगीत का स्विच ऑन कर दिया।
लगभग पांच घंटे बाद प्रोफेसर आस्टिन ने धीरे-धीरे अपनी पलकें खोलीं और बिना हिले-डुल कुतूहल से कक्ष को घूरने लगे। तभी उनकी आंखें प्रतिरक्षित कक्ष की पारदर्शी दीवार के पार टकटकी बांधे डॉ. दिवस, डॉ.नेल्सन व डॉ. असिमोव से टकराई।
वे कुछ पल देखते रहे, लेकिन उनकी आंखों में अपरिचय की परछाइयां डोल रही थीं। तीनों ने मुस्कुराकर सिर हिलाते हुए खामोशी से उनका अभिवादन किया। उत्तर में उनहें भी एक क्षीण मुस्कुराहट मिली, जिससे दोनों वैज्ञानिकों की आंखे सफलता की खुशी के आंसुओं से भर उठीं।
अगले दिन विश्वभर के समाचार पत्रों की सुर्खियों में 45 वर्षों बाद हिमीकरण से जिलाए गए प्रोफेसर आस्टिन और उइस प्रयोग को सफल बनाने वाले हिम जैविकीविदों तथा डॉ. दिवस के बारे में विस्तृत विवरण दिए गए। कई समाचार पत्रों ने तो इस घटना को ‘बीसवीं सदी की ममी पुनर्जीवित’ शीर्षक दिया और रंगीन चित्रों के साथ रोमांचक विवरण प्रकाशित किए।
कुछ और समाचार पत्रों ने इसे कैंसर से मानवता को मुक्ति दिलाने वाले डॉ. दिवस की सुई से मृत शरीर में प्राणों के संचार की संज्ञा दी। पत्रकारों ने खोद-खोदकर इस अभूतपूर्व प्रयोग का रोमांचकारी विवरण धारावाहिक रूप से प्रकाशित करना प्रारंभ कर दिया। कई भारतीय समाचार पत्रों ने पौराणिक संदर्भ दे-देकर इस प्राचीन भारतीय विधि का नया रूप बताया।
प्रोफेसर आस्टिन 45 वर्षों की रिकार्ड अवधि में हिमीकरण से जागने वाले विश्व के प्रथम व्यक्ति घोषित कर दिए गए। कैंसररोधी टीका लगाने के बाद उनकी अत्यधिक सावधानीपूर्वक निगरानी की जा रही थी और चिकित्सक प्रतिरक्षित कक्ष के भीतर उनकी हालत का हर पल अध्ययन कर रहे थे। उनके शरीर की नियमित जांच से पता लग रहा था कि कैंसर धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। कैंसरग्रस्त कोशिकाएं प्रभावहीन हो रही थीं तथा उनके स्थान पर नई स्वस्थ कोशिकाओं का बनना शुरू हो चुका था।
दो माह लगे प्रोफेसर आस्टिन के चेहरे पर पीड़ारहित, सहज मुस्कान को उभरने में, जिसे देखकर हिम-जैविकीविदों और चिकित्सकों ने संतोष की सांस ली। लंबे तनाव से मुरझाए उनके चेहरे खिल उठे।
‘अब कैसा अनुभव कर रहे हैं प्रोफेसर आस्टिन?’ डॉ. असिमोव ने एक दिन पूछा।
‘अचानक काफी आराम मिला है, डाक्टर! मैंने तो जीने की आस ही छोड़ दी थी, लेकिन आप लोगों ने बचा लिया। नई जिंदगी दी है आप लोगों ने .... कैसे धन्यवाद दूं ... हां, जरा बच्चों को बुला देंगे .... इंतजार करते-करते थक गए होंगे।’ प्रोफेसर आस्टिन बुदबुदाए।
हिम-जैविकीविदों का माथा ठनका।
क्या कहना चाहते हैं प्रोफेसर आस्टिन? बच्चों को बुला देंगे जरा? जैसे यहीं कहीं इंतजार कर रहे हैं उनके बच्चे! क्या उन्हें पता नहीं है कि वे 45 वर्षों बाद जाग रहे हैं? उनकी पत्नी आज से 20 वर्ष पूर्व 75 वर्ष की आयु में गुजर गई थी- 2110 में। बड़ा लड़का 2115 में 60 वर्ष की आयु में दुर्घटना का शिकार हो गया और छोटी लड़की की 2021 में मृत्यु हो गई थी। दोनों लड़के जब तक जीवित रहे, पिता की संपत्ति के लिए अदालतों के दरवाजे खटखटाते रहे, लेकिन वसीयत के अनुसार अधिकांश संपत्ति प्रोफेसर आस्टिन के हिमीकरण और पुनर्जीवन के प्रयोग पर ही खर्च की जानी थी।
कहा जाता है, लड़की अध्ययन के दौरान किसी हिप्पी बन कर, भौतिक सुखों से ऊबकर पूर्व की ओर संभवतः भारत चली गई थी। उसके बारे में इससे अधिक कुछ मालूम न था।
डॉ.असिमोव ने सोचा अगर उसके बारे में पता लगाया भी जाए तो क्या लाभ? आज वह 67 वर्ष की वृद्धा होगी।
चिकित्सकों एवं हिम-जैविकीविदों को असमंजस में खड़ा देखकर प्रोफेसर आस्टिन ने धीरे-धीरे फिर कहा, ‘कृपया, उन्हें बुला दीजिए। मैं बस इतना कह दूं उनसे कि अब मैं ठीक हूं, ताकि उनकी परेशानी दूर हो जाए। जब से उन्हें मेरी हिमीकरण की इच्छा का पता लगा है-तब से वे बहुत घबराए हुए हैं...’
वैज्ञानिकों के चेहरे पीले पड़ गए हैं। वही बात है, प्रोफेसर आस्टिन को 45 वर्ष के अंतराल का पता ही नहीं है। वे सोच रहे हैं, सामान्य एनेस्थीसिया के बाद होश में आए हैं। डॉ. नेल्सन ने सभी को बाहर निकलने का इशारा किया है और जोर से बोले - ‘हां अब तो प्रोफेसर को उनके परिवारिक जनों से मिलने दिया जा सकता है। उन्हें इस खुशी में शामिल होने दीजिए। आइए, हम लोग बाहर चलें।’
सभी लोग बाहर निकल गए और चकित होकर एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। तुरंत आपात कालीन बैठक बुलाई गई। बैठक को संबोधित करते हुए डॉ. नेल्सन ने कहा ‘आप लोगों में से भूलकर भी कोई प्रोफेसर आस्टिन को असलियत के बारे में न बताएं अन्यथा इस सदमें को वे झेल नहीं सकेंगे। उनका शरीर इस स्थिति में अभी नहीं है कि वे कोई भी शारीरिक अथवा मानसिक आधात सह सकें। एक छोटी-सी गलती भी हमारी इस महान, अभूतपूर्व सफलता को क्षण भर में मिट्टी में मिला सकती है और प्रोफेसर के जीवन को खतरे में डाल सकती है।’
गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श करने के बाद अंततः यही तय हुआ कि जब तक प्रोफेसर आस्टिन पूर्णतः स्वस्थ नहीं हो जाते और अतीत तथा वर्तमान की बदलती हुई परिस्थितियों को सहज रूप से सहने की आत्मशक्ति उनमें नहीं आ जाती, तब तक उन्हें भरमाना होगा।
डॉ. नेैल्सन ने कहा- ‘हो सकता है, इसके लिए आप लोगों को उन्हें ‘मूड पिल्स’ देनी पड़ें या एल.एस.डी. के कल्पनालोक में भरमाना पड़े, लेकिन ध्यान रखें, किसी भी हालत में उन्हें अभी वास्तविकता का पता न चले। उनकी स्मृति पूर्णतः सुरक्षित है और हिमीकरण की अवधि का अहसास न होने के कारण उन्होंने अपने घर-परिवार और समाज को लेकरन न जाने मन में कितना बड़ा और कैसा इंद्रजाल रचा हो। यह इंद्रजाल टूटने न पाए अन्यथा वे सत्य को शायद झेल नहीं पाएंगे।’
डॉ. नेल्सन ने अपने चेहरे पर से चिंता पोंछी और हिम-जैविकीविदों के साथ प्रफुल्ल मुद्र में भीतर प्रवेश किया। प्रोफेसर आस्टिन ने धीरे से चेहरा मोड़ा और आशाभरी नजरों से उन्हें ताकते हुए बोले - ‘क्या हुआ डॉक्टर? कहां है वे?’
‘क्षमा कीजिए प्रोफेसर, नियमानुसार किसी नर्स ने उन्हें सायंकाल निर्धारित समय पर मिलने के लिए कहा दिया था। वे शायद कुछ देर में आएं। आते ही आपसे मिलेंगे। आपके स्वास्थ्य में हुए सुधार को देखकर उन्हें बहुत खुशी होगी। आप दवा लीजिए।’ उन्होंने नन्हीं कणिका-सी गोली प्रोफेसर आस्टिन के मुख में गिरा दी।
थोड़ी देर बाद प्रोफेर कल्पनालोक में विचरण करने लगे। उनकी आंखों में शून्य में भटकता हुए देखकर डॉ. नेल्सन दबे पांव बाहर निकल आए.... उधर प्रोफेसर आस्टिन के लिए एक अभूतपूर्व अनुभव शुरू हो गया था। वे रंगों के रंगीन संसार में पहुंच चुके थे, जहां वे रंगों की मधुर आवाजें सुन सकते थे और कमरे में फूटते शब्दों व संगीत को अपनी आंखों से देख सकते थे। स्वयं को अपने ही शरीर के खोल में से बाहर बहकर एक नए सफर पर जाते हुए देख सकते थे- ‘जहां समय की सीमा नहीं थी और स्वयं को, अपने परिवार और परिचितों को तथा अपनी दिमागी दुनिया को भूलकर कॉस्मिक अनुभूतियों के अद्भुत संसार में खो सकते थे। डॉ. अस्मिोव धीरे से कक्ष में आए और उन्हें खोया व डूबा हुआ देखकर वापस लौट गए। वे संतुष्ट थे कि कम-से-कम दस घंटे से पहले प्रोफेसर का सामान्य अवस्था में लौटना संभव नहीं है।’
उधर हिम-जैविकीविद बदलती परिस्थिति पर गंभीरता पूर्वक विचार कर रहे थे। पूर्णतः स्वस्थ होने तक प्रोफेसर को एल.एस.डी तथा ‘मूड पिल्स’ पर ही भरवाना था। वास्तविकता से उन्हें बहुत ही चतुरतापूर्वक धीरे-धीरे परिचित करना था। तब तक उन्हें पत्रकारों से भी दूर रखने का निश्चय किया गया, ताकि वास्तविकता के बारे में वे कोई प्रश्न पूछ सकें।
पांच माह बाद प्रोफेसर आस्टिन जब स्वस्थ होकर अंतर्राष्ट्रीय हिमजैविकी संस्थान से छूटने लायक हो गए तब एक और नई समस्या पैदा हो गई वे छूट कर जाएं कहां? अब वे 55 वर्षीय स्वस्थ पुरुष थे और भविष्य उनके सामने पड़ा था, जो उन्हें सामान्य जीवन जीते हुए बिताना था। अपनी अधिकांश संपत्ति वे 45 वर्ष पूर्व ही संस्थान को दान कर चुके थे और संस्थान ने उनके हिमीकरण में उसका पूरा उपयोग कर लिया था। अब भावी जीवन में कैसे जिएं?
संस्थान की ओर से महानिदेशक डॉ.नेल्सन ने एक गोपनीय पत्र कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय को लिखा कि क्या सेवा करते हुए गंभीर रोगग्रस्त हो जाने और फिर इलाज के बाद किसी कर्मचारी को वापस लिया जा सकता है? यदि हां, तो 45 वर्ष बाद साहित्य के प्रोफेसर आस्टिन को अपने पद पर पुनः सेवा प्रारंभ करने की अनुमति दी जा सकती है?
नियमानुसार यह संभव तो नहीं था, लेकिन विश्वविद्यालय ने अपने भूतपूर्व प्रोफेसर और आज की विश्वविख्यात विभूति प्रोफेसर आस्टिन को विशेष चिकित्सा अवकाश का लाभ देकर सेवा में वापस लेने का निश्चय किया।
अब स्वस्थ, प्रसन्न प्रोफेसर आस्टिन को सावधानीपूर्वक वास्तविकताओं से परिचित कराना था। यों अब तक अनेक बहाने बनाए  जा चुके थे और उनके परिवार के बारे में न जाने कितनी तरह की बातें हिम-जैविकीविद उनसे कह चुके थे। लड़के जीवनभर  अदालत में संपत्ति के लिए लड़ते रहे थे और पोते-पोतियों की उनमें कोई रुचि नहीं थी। सच्चाइयों का अहसास कराने के लिए ‘मूड पिल्स’ तथा एल.एस.डी. के कल्पना लोक से लौटने पर उन्हें अतीत से मिलती-जुलती घटनाओं वाली  टेलीविजन फिल्में दिखाना शुरू कर दिया गया। उनके मस्तिष्क पर इन फिल्मों के प्रभाव का सतर्कतापूर्वक अध्ययन भी किया जा रहा था। शुरू में साधारण घटनाएं दिखाई गई जिनमें परिवारों के बिखरने की कहानियां थीं। फिर सयाने होते ही मां-बाप से बिल्कुल अलग रहकर मुक्त-स्वच्छंद जीवन जीने वाले युवक-युवतियों के जीवन भर पर आधारित फिल्में थीं। शुरू-शुरू में मां-बाप से मुंह मोड़कर मौज बनाने वाले युवकों और युवतियों की कहानियों से उनका दिल डूबने लगता, मस्तिष्क-तरंगें तनाव का संकेत देतीं, लेकिन धीरे-धीरे वे इन घटनाओं के अभ्यस्त हो गए।
उसके बाद दुर्घटनाएं दिखाई गई- प्राकृतिक भी और युद्ध व दंगों पर आधारित भी, जिनमें परिवारों के बिछड़ जाने या सगे-संबंधियों के मारे जाने संबंधी फिल्म शामिल की गई। कॉर्डियोग्राम, इलेक्ट्रोइनसिकेलोग्राम, रक्तदाब, सांस आदि शुरू में असामान्य होती, लेकिन धीरे-धीरे बदली हुई परिस्थितियों के प्रति सहज होते जा रहे थे और हिम-जैविकीविदों के लिए यह उत्साहजनक लक्षण था। वास्तविकता का आघात न सह पाने की स्थिति में उनके मस्तिष्क से अतीत की स्मृतियों को मिटा डालने के अलावा और कोई रास्ता शेष न रहता। वह स्थिति बहुत दुःखद होती क्योंकि अच्छी-बुरी पुरानी स्मृतियों के संसार के बदले उन्हें 55 वर्ष की इस उम्र में एक शिशु की तरह नया जीवन शुरू करना पड़ता। उम्र में वे आधी सदी पार कर चुके होते और अनुभवों का जन्म शुरू होता।
धीरे-धीरे वे दर्दनाक दृश्यों को भी आसानी से सहने लगे। वे कठोर हृदय बनने में समर्थ हो रहे थे और भावनओं पर नियंत्रण करने की काफी अच्छी क्षमता उनमें विकसित हो गई थी। उन्हें परिस्थितियों के अनुसार ढालने में हिम-जैविकीविदों और चिकित्सकों को काफी सफलता मिलती जा रही थी। उनकी मनःस्थिति और शारीरिक क्षमता के अनुसार सुरक्षित मात्रा में एल.एस.डी. व मूड पिल्स देकर भी स्थिति लगातार सुधारी जा रही थी। भविष्य-विज्ञान की फंतासियों पर आधारित फिल्में भी अब वे आराम से देख सकते थे और कई कथाचित्रों के अधेड़ नायकों की भांति वे भी दुख के थपेड़ों को झेलकर, अकेले अपने पैरों पर खड़े होकर कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ने का साहस सहेज चुके थे। फिर धीरे-धीरे हलकी कानाफूसियों के रूप में अपने अतीत की कहानी भी उन्होंने सुनी, खोद-खोदकर असलियत का पता लगा और मूड पिल्स व एल.एस.डी. के मायावी संसार में उनको लेकर बह लिए।
और एक दिन प्रोफेसर आस्टिन को हिमजैविकी संस्थान से छुट्टी मिल गई। जहां जाते, लोगों की भीड़ घेर लेती। लोगों के लिए वे एक अजूबा बनकर रह गए, जबकि उन्हें अपने चारों ओर की दुनिया अद्भुत, लेकिन अजनबी लगती। उनके चारों ओर अकल्पनीय चीजें थीं। विज्ञान और तकनीकी खोजों ने लोगों का रहन-सहन ही नहीं, व्यवहार भी बदल दिया था। उन्हें लगा, लोग खुदगर्ज हो गए हैं और अपने सुख के लिए कुछ भी कर गुजरने को तत्पर रहते हैं। साथी मनुष्यों के लिए उनके मन में जैसे कोई विशेष लगाव शेष नहीं रहा था।
अगले दिन प्रोफेसर आस्टिन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय पहुंचे। वहां भी उन्हें विश्वविद्यालय भवन के अतिरिक्त सब कुुछ बदला हुआ नजर आया। वे  सूरतें, वे चेहरे जिन्हें वे जानते थे- कहीं नहीं थे। लोगों के बोलने और व्यवहार में अंतर आ गया था। बहरहाल, उन्होंने सेवा शुरू कर दी। आधुनिक साहित्य के अध्येता और चिंतक को जब प्राचीन साहित्य का अध्यापन कार्य सौंपा गया तब पहले वे रोष में भड़के, फिर चौंके और उसके बाद पाठ्यक्रम में कम्प्यूटरी कविताओं और मशीनी गद्यों-निबंधों को देखकर चुपचाप कार्य संभाल लिया। अब वे दिन भर भावनाओं एवं अनुभूतियों की नींव पर टिका प्राचीन साहित्य पढ़ाते और रातों को अतीत की यादों से लड़ते हुए चमत्कारी दवाओं के काल्पनिक लोक में खो जाते। वे अब इन दबावों के बुरी तरह आदी हो चुके थे और अब इनके बिना उनके लिए जीना संभवन नहीं था। परिवार की याद उन्हें बुरी तरह कचोटती और वे इससे बचने के लिए मादक दवाइयों या फिर नींद की गोलियों की शरण में चले जाते।
समाचार पत्रों और रेडियो-टेलीविजन पर एक बारगी बेहद चर्चित हो जाने के बाद इस प्रयोग के रोमांच का ज्वार अब काफी उतर चुका था। उन्हें देखने के लिए तमाशबीनों की भीड़ अब कम लगती थी। लेकिन अपने नए संसार में वे भीतर-भीतर बुरी तरह छटपटाने लगे थे।
कई बार उन्हें लगता कि उनका महत्व केवल एक ‘ऐतिहासिक वस्तु’ के बराबर है। वे एक ‘एंटीक’ हैं।
कभी लगता जैसे केवल दूसरों की उत्सुकता के लिए ही जी रहे हों। अपने लिए जीने का कोई विशेष अर्थ वे नहीं समझ पा रहे थे। सोचते, जिएं तो आखिर किसके लिए जिएं? न पारिवारिक सदस्य हैं, न संगी-साथी। कोई भी उन्हें आत्मीय आस्टिन के रूप में नहीं जानता। जो भी जानता हैं क्रायोकैप्स्यूल से साढ़े चार दशक बाद जागे हुए अद्भुत प्राणी के रूप में जानता है। वे जैसे आदमी की दुनिया में चिड़ियाघर का प्राणी होकर रह गए थे। उन्हें हर समय लगता जैसे उन्हें अतीत से पकड़कर एक नई अजनबी दुनिया में पटक दिया गया हो, जहां उनका अपना कोई नहीं है। अतीत रह-रहकर उनके मस्तिष्क में कौंधता। कभी पत्नी की तस्वीर सामने आती तो कभी बच्चे उछलते-कूदने लगते। पत्नी और दोनों पुत्रों की याद को तो उन्हें मृत मानकर मन-मस्तिष्क से क्षण भर पोंछ भी लेते, लेकिन बिटिया कैरोल किसी तरह न भूली जाती। सोचते, उसका क्या हुआ होगा? रह-रहकर कैरोल उनकी कल्पना में कूद पड़ती और वे सोचने लगते कि कैरोल क्या आज भी जीवित होगी? वे बस इतना ही तो जान सके थे उसके बारे में किसी सहपाठी के साथ भारत चली गई थी वह। क्या जिस तरह तमाम युवक-युवतियां नितांत स्वच्छंद जीवन जीने के लिए उनके समय में हिप्पी बनकर पूर्व की ओर निकल जाते थे- वैसे ही कैरोल भी भटकी होगी? ऐसे तमाम प्रश्नों के तनाव को झेलने के लिए वे फिर ‘मूड पिल्स’ की शरण में चले जाते।
इस बार सात माह बाद लौटी गंगा मां अपने एकांतवास से। अब वे अपना अधिकांश समय एकांतवास में ही व्यतीत करती हैं। अपने जीवन के पिछले 34 वर्ष दुःखी लोगों की सेवा में समर्पित करने के बाद अब विगत 4 वर्षों से वे बिल्कुल निर्जन एवं दुर्गम क्षेत्र में स्थित अपनी ‘शांति कुटीर’ में एकांतवास करने लगी हैं। एकांत के क्षणों में कभी-कभी उनका अतीत उनकी आंखों के आगे जैसे साकार हो उठता है .....
आज से चौंतीस वर्ष पूर्व जब वे इस आश्रम में पहुंची थी, तो जीवन से पूरी तरह ऊब चुकी थीं। न जाने कौन-सी शक्ति उन्हें यहां हिमालय की पहाड़ियों तक खींच लाई थी। अपने जिस साथी के साथ भौतिक सुखों से ऊबकर आध्यात्मिक शांति और सुखी जीवन जीने की ललक लेकर वे मिस कैरोल के रूप में पहली बार भटकते-भटकते, कई देशों की खाक छानते गोवा तट पर पहुंची थीं, वह शीघ्र ही स्वच्छंदता प्रेमी नशेड़ियों-गंजेड़ियों के गिरोह में शामिल हो गया था। हिप्पियों का वह दल दर-दर भटकता, शहरों, तीर्थों की सैर करता रहा- कभी बनारस और कभी हरिद्वार। एल.एस.डी., चरस और हेरोइन के नशे में डूब कर शांति की खोज का वह ढोंग उन्हें उस दल से दूर करता चला गया। वे निपट एकाकी, भटकती-भटकती हरिद्वार तक पहुंचीथीं और हर तरफ से ऊबकर गंगा की गोद में समाने से पहले ही गौरी मां की बांहों ने उन्हें थाम लिया था। दुःखी और जिंदगी से थके-हारे लोगों की सेवा के लिए समर्पित मां गौरी से उनकी यह पहली भेंट थी। गौरी मां उन्हें अपने आश्रम में ले आईं हरिद्वार से बहुत दूर पिथौरागढ़ की इस पहाड़ी पर। आश्रम में दुःखी और बेसहारा महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाता था।
जीवन से बुरी तरह ऊबी और हारी हुई कैरोल ने अपने करुण कहानी गौरा मां को सुनाई थी। और, मां ने उसे गले लगा लिया था। धीरे-धीरे उन्हें पता चला कि गौरवर्णी गौरी मां भी कभी मानसिक शांति की टोह में सुदूर जर्मनी से यहां आकर बस गईं थी। इससे अधिक ने तो वे कुछ बताती थीं और न कोई जानता ही था। कहा करतीं- तपस्विनियों का भी भला कोई अतीत होता है। एक घर से आकर वे सारी वसुघा को ही अपना घर बना लेती हैं। इसीलिए युवा कैरोल से भी उन्होंने पिछली स्मृतियों को भुलाकर बिल्कुल नया जीवन प्रारंभ करने को कहा।
गंगा की भेंट मानकर उन्होंने कैरोल का नाम गंगा रख दिया। इस बार वह एंकांतवास से आश्रम में लौटीं तो वह समाचार सुनने को मिला, जिसने विश्वभर में तहलका मचा दिया था। पैतालिस वर्ष बाद पुनर्जीवित कर देने का वह सनसनीखेज समाचार।
आश्रम को शिष्याओं ने समाचार पत्र दिखाए तो प्रोफेसर आस्टिन की कहानी ने उनके भीतर भावनाओं का तूफान खड़ा कर दिया। वे अपने कक्ष में जाकर ध्यान में बैठ गई। विचारों की उथल-पुथल धीरे-धीरे शांत हो गई और वे संयत होकर इस बारे में गंभीरतापूर्वक सोचने लगीं। उनके भीतर कैरोल जीवित हो उठी। पिता के हिमीकरण की घटना उनकी स्मृति में साफ उभरने लगी। तब भला किसे विश्वास था कि यह सब संभव हो जाएगा। पिता के पुनर्जीवन के लिए उन्होंने ईश्वर को नमन किया और फिर इस चिंता में डूब गई कि उन्हें कैरोल के रूप में वापस लौटना चाहिए या नहीं?
यद्यपि अपने अतीत को पीछे छोड़ने के लिए उन्हें मन की कठिन साधना करनी पड़ी थी, लेकिन अब पिता के सामने उन्हें क्या कैरोल के रूप में नहीं जाना चाहिए? इन्हीं विचारों में खो गई गंगा मां।
सोचती रहीं वह कि पुनः जीवित होने पर कैसा लगा होगा उन्हें? उन्हें अपने घर-परिवार और साथियों की याद आई होगी? सहसा जी उठने पर उनके सामने उनकी दुनिया भी जी उठी होगी, लेकिन जब उन्हें पता लगा होगा कि उन्हें पहचानने वाला कोई भी नहीं है तो उनकी क्या दशा हुई होगी?
गंगा मां ने तो पिता को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जो बिल्कुल असहाय है। जिसे उसका सब कुछ समाप्त हो जाने के बाद जगा दिया गया है। ऐसे व्यक्ति की मनोदशा का विचार करके गंगा मां सिहर उठीं। उन्होंने निश्चय किया कि वे पिता से मिलेंगी। उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के पते पर संदेश भेजने का संकल्प किया और ध्यान से उठ गई।
केबल पाने से जैसे प्रोफेसर आस्टिन को जीने का आधार मिल गया। पहले तो अविश्वास से शून्य में ताकते रह गए, लेकिन फिर खुशी से चीख उठे।
वे अब कैरोल की प्रतीक्षा करने लगे।
कुछ दिनों बाद कैरोल उर्फ मां पहुंच गई। उन्हें देखते ही प्रोफेसर चकित रह गए। उन्हें आघात लगा। कैरोल को सीने से लगा लेने को आतुर प्रोफेसर आस्टिन की बाहें जैसे निर्जीव होकर लटक गई। वे एकटक गंगा मां के झुर्रियों भरे शांत चेहरे को ताकते रह गए। सफेद साड़ी में उस श्वेतकेशी सड़सठ वर्षीय वृद्धा को कैरोल के लिए वे तैयार न हो सके। पुत्री को पा लेने का सारा उत्साह जैसे ठंडा हो गया। उम्र में अपने से बड़ी गंगा मां को गंगा मां ही स्वीकार करना उन्हें उचित होगा। अल्हड़ कैरोल कल्पना में ही कैद हो गई।
लेकिन गंगा मां को देखते-देखते एक अजीब शांति का अहसाह उन्हें जरूर हुआ। शुभ्र साड़ी और रुद्राक्ष की माला पहने गंगा मां उन्हें किसी देवी की तरह लग रही थीं। उनके चेहरे पर अपार शांति थी। उन्हें देखकर लग रहा था, जैसे उस पवित्र मूर्ति में कहीं कोई हलचल, कोई उद्विग्नता नहीं है। प्रोफेसर आसिटन को लगा- काश! उनके भीतर आलोड़ित होती जिज्ञासाएं और भावनाएं भी शांत जल की तरह स्थिर हो पातीं। गंगा मां की भांति वे भी शांति प्राप्त कर पाते।
‘क्या सोच रहे आप?’ गंगा मां ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘सोच तो रहा था कैरोल के बारे में?’ जब से मुझे केबल ग्राम मिला, मेरी कल्पना में केवल कैरोल ही उछल-कूद रही थी और मैं.... मैं कितने उत्साह से उसका इंतजार कर रहा था। मैं भूल गया था- और यह मेरी मजबूरी है कि मैं बार-बार भूल जाता हूं यह जो समय है वह मेरा नहीं है। मैं उसी कैरोल का सपना देख रहा था क्योंकि मैंने वैसा ही उसे देखा था। आपका देखकर, मैं आपके चेहरे में अपनी कैरोल का चेहरा नहीं खोज पा रहा हूं। नहीं, आप कैरोल नहीं हैं.... आप कौन हैं?
‘हां, मैं कैरोल नहीं। सचमुच नहीं। में गंगा मां हूं। कैरोल तो आज से चौंतीस वर्ष पहले भारत की पवित्र नदी गंगा में समा गई थी और तब गंगा मां अर्थात् मैं अस्तित्व में आई। यों समझ लो, मेरा भी पुनर्जन्म हुआ है, लेकिन इस तरह कि अतीत, वर्तमान और भविष्य किसी भी समय-सीमा के साथ मेरा अस्तित्व नहीं बंधा है। विशाल ब्रह्मांड आज मेरा घर है और एक कैरोल के बजाय अब मैं संपूर्ण सृष्टि का एक अंश हूं। ब्रह्मांड की नियंत्रक शक्ति के सान्निध्य के लिए उसकी सृष्टि में ही खो जाना आवश्यक है। इसका एक सरल तरीका प्रकृति के निकट हो जाना है। इस लिए आज मैं प्रकृति के साथ हूं। जो आनंद और शांति भौतिक सुखों में कभी भी नहीं मिल सकती, वह दुःखी और पीड़ितों की सेवा में सहज ही मिल जाती है।.... मैं अब समझ रही हूं कि आपको इस स्थिति में सहारा न दिया गया तो आप न जाने क्या कर बैठें। जाने के लिए आप कोई आधार, पता कहीं खोज भी पाएं या नहीं। यही सब सोचकर मैंने निर्णय किया कि जिस तरह जीवन से पूरी तरह विश्वास उठ जाने के बाद मुझे जीवन में अटूट आस्था हो गई, उसी तरह आपको भी भौतिक संसार के सुखों से परे ले जाने की कोशिश करूं।’
‘असल में सच पूछिए तो जहाँ ज्ञात ज्ञान खत्म होता है, वहां से अज्ञात ज्ञान शुरू होता है.... भौतिक से मानसिक संसार में प्रवेश प्रारंभ होता है। इसलिए आओ, इस भौतिक सुखों के संसार से निकलकर मेरे साथ चलो। ईश्वर तुम्हें सुख और शांति देगा....’ कहते-कहते गंगा मां ने अपना हाथ पिता आस्टिन के सिर पर आशीर्वाद की मुद्रा में रख दिया। प्रोफेसर आस्टिन को लगा, अब उन्हें सचमुच जीना चाहिए।

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