विज्ञान कथा

(22/May/2015)

हिरोशिमा के फूल

एदिता मोरिस

उसकी आँखें केवल ओहात्सु पर टिकी हैं। ओहात्सु बाग का छोटा-सा टुकड़ा पार करने के लिए अपने उड़ते हुए लंबे किमोनो में दौड़ी चली जा रही है और वह अपनी जिराफ-सी गरदन फैलाये उसे ताके जा रही है।
‘आप छोटी बहन की बात का बुरा न मानें! उसे ...’ मेरी बात पूरी होने से पहले ही वह पूछ बैठता है, ‘अरे, वह संुदर लड़की आपकी बहन है...! बहुत संुदर है,’ फिर एकाएक उसके गाल लाल हो उठते हैं। मैं हंस पड़ती हूं।
एकाएक मेरे विचारों का सिलसिला टूट गया। अच्छा, छोड़ो... दरअसल, यह अमेरिकी युवक अपना रिजर्व कमरा छोड़कर हमारे यहां चले आने का फैसला कर लेता है। मैंने हल्के से उसे बता जो दिया है कि हमारे पास एक कमरा खाली है। अब येन की आमदनी के ख्याल से मेरा मन हल्का हो रहा है। वह सीटल की एक जहाज कंपनी की तरफ से जापान के व्यावसायिक दौरे पर आया है।
वह अपने बारे में बहुत कुछ बताने के बाद कहता है, ‘सर यहां आपके पास रहने में बहुत मजा आयेगा,’ तभी मेरा हाथ बाल ठीक करने के लिए ऊपर क्या उठता है, दिल् धकक रह जाता है... कि कहीं किमोनो की बांह ऊपर उठ जाने से उसने मेरे दाग तो नहीं देख लिये! तभी खुकिस्मती से कोई मुझे पुकार बैठता है और मैं भाग लेती हूं।
गली के निचले हिस्से से वृद्ध नाकानोसान मुझे आवाज देती है और मैं उसी क्षण उन्हें अमेरिकन युवक की नजर से देखने लगती हूं... कितनी गंदली ओर घुन खाई है यह! हिरोशिमा के विस्फोट से जिंदा बचे सभी लोगों की तरह।
‘देखिए, मैं अपना सूटकेस ‘न्यू हिरोशिमा होटल’ में डाल आया था... तो मैं भागकर ले आऊं। पांच बजे तक लौट आऊंगा।’ वह मुझे आगाह करना चाहता है। उधर नाकानोसान चिल्ला रही है, ‘युका! युका!’
सड़ी मछली के एक ढेर से ठोकर खाकर मैं जैसे-तैसे पानी में गिरते-गिरते बचती हूं और नाकोनासान और बूढ़ी तामुरासान के पास पहुंचती हूं। हम तीनों खाली मैदान की तरफ चल देती हैं। अमेरिकन युवक हैरान होकर हमारी ओर देख रहा है। उसे मैंने बताया ही था कि अपने इन दोनों पड़ोसियों को मैं इस वक्त शौच के लिए खुले मैदान में ले जाती हूं।
‘छोटी बहन, यह अमेरिकन युवक कुछ दिन हमारे यहां ठहरेगा।’ मैंने ओहात्सु को सूचना दी तो वह भीतर ही भीतर भड़क कर रह गयी। फिर मैंने उसे समझाया कि वह विदेशी के साथ् अच्छा व्यवहार करे। रात के खाने के बाद बाग में ले जाकर उसका दिल भी बहलाये, पर वह है कि चट से कह देती है, ‘दीदी, मुझे यह हैरोसान अच्छे नहीं लगते।’
‘... पर तुम्हें इस आदमी से अच्छा सलूक करना है, समझीं!’ ओहात्सु को समझा रही हूं मैं और वह शायद समझ भी गयी है कि यहां उसकी संुदरता को चारे की तरह इस्तेमाल किये जाने की बात हो रही है। अब देर हो चली है। ओहात्सु मेहमान के साथ बैठी हुई है। हर बार जब वह उसका प्याला भरती है तो अपनी कमर झुका फुसफुसाती है, ‘तुम इतनी दुबली हो कि पता नहीं सांस कैसे लेती हो... इस सफेद किमोनो में तुम बिल्कुल एक छोटी-सी रूह नजर आती हो।’ युवक ओहात्सु से कह रहा है। उसे क्या मालूम कि वह किसी भी ऐसी चीज से बेहद खौफ खाती है जो मौत के साथ जुड़ी हो।
बातों-बातों में ओहात्सु उठकर भीतर भाग आती है और अंधेरे में खड़ी होकर मुझसे आ टकराती है, ‘मुझसे कुछ मत कहो बड़ी बहन!’ वह रूआंसी हो आयी है। जाहिर है, अब मुझे उस परदेसी युवक का ख्याल रखना होगा। वह आशंकित है कि ओहात्सु कहीं उससे नाराज तो नहीं हो गयी... मैं उसे समझा देती हूं।
मैं अपने पति के लिए लंच-बॉक्स लेकर आयी हूं। जब तक फ्यूमियो अपने बॉस से बातचीत पूरी नहीं कर लेता, मुझे इसी तरह बैठे रहना है। फ्यूमियो के साथ मैंने उतना वक्त नहीं बिताया, जितना उसकी प्रतीक्षा में। युद्ध और उसके बाद की नस्लों में लाखों-करोड़ों युवा जापानी पत्नियों की यह नियति है।
बैठे-बैठे मैं सोच रही हूं कि फ्यूमियो जब फौज में लिया गया था तब... फ्यूमियो के बड़े-बड़े फौजी बूट देखकर मुझे कितना अजीब लगता था। तबवह कहता था, ‘फौज बूट को पैरों में फिट नहीं करती, पैरों को ही बूट में फिट होना चाहिए...’ और हम हंसते रहते थे देर तक। नहीं आना चाहिए, नहीं तो नसें उसी तरह फटने को ही आयेंगी जैसा युद्ध के वक्त होता था, जब मेरे पेट में युद्ध के तनाव की वजह से बच्चे ठहरते ही नहीं थे।
काफी देर बाद जब फ्यूमियो को वक्त मिलता है तो मैं उससे बातचीत शुरू करती हूं। इसी बीच अमेरिकी युवक भी आ गया है।
बातचीत और माहौल वह नहीं बन पाया, जो मैं चाहती थी। हम लोग बाहर आ गये और सैर को निकल लिये। हिरोशिमा की बगैर कोलतार की सड़कों पर हम बढ़े चले जा रहे थे।
‘क्या सोच रही हो युका सान? बता दो तो तुम्हें एक पेनी...’ सैम-सान अगली सीट से मुझे देखकर मुस्करा रहा है। मैं भला उसे क्यों बताने लगी कि मैं क्या सोच रही थी!... कि मैं सोच रही थी कि मैं हरे रंग की पश्चिमी पोशाक पहन लेती... पर उसकी बाहें बहुत छोटी हैं... और इसमें मेरी बाहों के दाग साफ नजर आ जायेंगे... कि मैं साच रही थी कि अब मेरी अपने बारे में सोचने की उम्र ही कहां रही?
विदेशी चारों तरह देख रहा है। फिर पूछता है, ‘तोक्यों की तरह यह शहर भी युद्ध के बाद फिर बना है न! तुम लोगों ने कमाल किया है!’
‘हां-हां, सब कुछ नया है... फिर से बना है!’ कुछ हो, मैं उसे यह नहीं बताना चाहती कि पुराना हिरोशिमा भी अभी जीवित है। इसे बहुत कम विदेशी देख पाते हैं। मैं थैले में से एक फटी हुई गाइड-बुक निकालकर पढ़ने लगती हूं, ‘क्या तुम सुन रहे हो सैम-सान!’
शोरगुल कुछ जयादा ही बढ़ा है। मैं और जारे से पढ़ती हूं। ‘6अगस्त, 1945 तक हिरोशिमा तीन सौ साठ साल की आबादी का एक सम्पन्न समुद्री बंदरगाह था, लेकिन उस दिन की सुबह यह महानगर धरती की सतह से अदृश्य हो गया...’
उफऽऽऽ ये काम मैं नहीं कर सकती। गाइड बुक कहती है कि आठ-पंद्रह से आठ सोलह के बीच साठ हजार घर जलकर राख हो गये। और एक लाख आदमी झुलस गये या चीथड़े हो गये... एक-एक संख्या के पीछे से दर्द भरे इंसानी चेहरे मुझे घूरते नजर आते हैं... घबराकर मैं पढ़ना ही बंद कर देती हूं, ‘इस शोर में तो सुन पाना भी मुश्किल ही है।’
एक मुसीबत से बची तो दूसरी मुसीबत सामने थी। अब हम ‘एटमबम अजायबघर’ के सामने से निकल रहे हैं। टूरिस्ट अपने कैमरे लटकाये यहां के ध्वंसावेशों और उनकी तस्वीरों का संग्रह देखने को टूटे पड़े हैं। सैम-सान यह भी तो नहीं जानता कि यह किस किस्म का अजायबघर है!
अनायास फ्योमियों की हालत खराब हो गयी है। सैम-आन उसे अस्पताल ले जाना चाहता है पर उसे पता नहीं कि जापान में अस्पताल जाने का मतलब क्या होता है! कहीं फ्यूमियो के बॉस को पता चल गया तो... बड़ी मुश्किल से हम घर की तरफ बढ़ रहे हैं, सैम-सान की आंखें भौचक्क हैं... जैसे कह रही हों कि उन्हें कुछ भरी समझ में नहीं आ रहा। मैं चाहती हूं कि वह न ही समझे तो बेहतर है। अभी तो उसने हमारी दीवार के उस पार देखा ही नहीं... मैं चाहती हूं कि वह हिरोशिमा के बारे में अजाना ही रहे तो अच्छा है।
यह फ्यूकिया स्टोर कितना प्यारा है। मैं अपने किरायेदार के साथ घूम रही हूं। मुस्करा रही हूं... बगैर यह प्रकट किये हुये कि मैं ने इसी दुकान को सारे सामान के साथ गारा होते हुए देखा है... इंसान की हड्डियों को उसके मलबे में मिलते देखा है।
सैम-सान ओहात्सु के लिए ढेर सारा सामान खरीदता है और गरीब जापानी लोग फटी आंखों से देखते रह जाते हैं।
जरा-सी चूक हो जाने से वह भी हो ही गया... जो नहीं होना चाहिए था। माएदा-सान मेरी तीन पड़ोसिनों के साथ हाजिर था। उसी ने सैम-सान को बताया कि अब वे सब शहर के सार्वजनिक हमाम में स्नान नहीं कर सकते। मैं चाहती थी कि बात इधर-उधर हो जाये पर सैमसान भी कम जिद्दी नहीं था। चाय की परवाह न करते हुए उसने चट से पूछा, ‘क्यों नहीं कर सकते?’
‘अपने चकत्तों के कारण।’ मेरा मित्र माएदा-सान भोलेपन में जवाब देता है, विस्फोट से पैदा हुए चकत्तें के कारण। तुम्हें नहीं मालूम शायद।
... कि तुम एक एटमबम से आहत आदमी से बातचीत कर रहे हो! हम लोग, यानी हम पांच लोग, एटमबम से बच रहे एक लाख व्यक्तियों में से सिर्फ पांच हैं... हममें से कई बुरी तरह जल गये। जख्म कितने हुए यह तो खैर भूल ही जाओ!... यही कारण है कि स्वस्थ शरीर वाले हिरोशिमावायिों को, जो युद्ध के बाद यहां पहुंचे हैं, हमारे शरीर पर बने तमाम तरह के दाग और जख्मों को देखकर उबकाई आती है।
मैं स्थिति संभालने की गरज से चाय वहीं ले जाती हूं और इशारे से माएदा-सान को चुप भी कराती हूं पर वह है कि चुप होने नहीं देता। घास पर घुटने टिकाये बैठी महिला की और इशारा कर, वह फिर बताना शुरू कर देता है, ‘यह हरादा सान, एटम बम के शिकार लोगों का एक सही उदाहरण है। इसने मुझसे कहा था कि आप इसके बदसूरत चेहरे को इेखकर कहीं डर न जायें! वह महसूस करती है कि उसका चेहरा बहुत सपाट है।’
सैम-सान का चेहरा पीला पड़ गया है। माएदा-सान बोलता जा रहा है, ‘मेरे दोस्त, मुद्दत हो गयी हरादा-साल को दिल खोलकर हंसे हुए।’
यदि सैम-सान जापानी होता तो यही जताता जैसे कुछ हुआ ही न हो। हिरोशिमा के बाहरी खोल के भीतर की पहली ही झलक ने उसे बुरी तरह विचलित कर दिया है। मेहमानों के जाने के बाद वह बाग में चक्कर काटे जा रहा है।
मैं अंदर चली जाती हूं। मैं समझ रही हूं कि इस वक्त एकांत चाहता है।
‘फूलों के कीड़े! ओह, मैं कोई ऐसी दुनिया चाहती हूं, जिसमें ये कीड़े न हों।’  ओहात्सु अपनी फलों की क्यारी में घुटने के बल बैठकर एक सफेद पैंजी से कीड़ा निकालती है और फूल के विकृत चेहरे को चिंतित नजरों से देखती रहती है।
छोटी बहन के साथ फूल की क्यारी में घुटने टेककर बैठना मुझे अच्छा लगता है, पर मैं चाहती हूं कि ओहात्सु जो कुछ भी किया करे, उसमें इतनी ज्यादा भावुकता नह भरे। वह मुझसे पूछती है, ‘बड़ी बहन, मैं तुमसे प्यार के बारे में कुछ पूछना चाहती हूं! क्या तुम इस पर यकीन करती हो?
‘ओह!’ मुझे धीमे से हंसी आ जाती है। पहली नजर के जिस प्यार का उसने जिक्र किया था, में समझ जाती हूं कि वह हैरी-सान को लेकर ही होगा... ओहात्सु के लिए एक अमेरिकी पति... शायद वह उस आदमी की बांहों में चैन की नींद सो सके, जिसके लिए मुसीबतें अजनबी हैं। मैं झूठ बोल देती हूं ‘हां, बिल्कुल!’
‘तो तुम मुझे मेरी इच्छा से विवाह कर लेने दोगी?’
‘हां-हां, बिल्कुल!’
बात आयी-गयी हो गयी और फिर जब बूढ़ी नागा-सान ओहात्सु के विवाह की बात लेकर आयी तो ओहात्सु घर से ही गायब हो ली। जैसे-तैसे यह पता लग पाया कि नागा-सान ओहात्सु का विवाह एक सम्मानित प्रौढ़ से करवाना चाहती है, ‘हां-हां, मेरी लड़की! हमें सच्चाई का सामना करना चाहिए। तुम्हारी युवा बहन की आज मांग है लेकिन कल?’...
किस प्रकार के बच्चे ओहात्सु पैदा करेगी? आजकल हिरोशिमा में तुम्हारे जैसे एटमबम से बचे लोगों की बहुत चर्चा है कि उनके अजीब तरह के बच्चे होंगे... मेरे कहने का मतलब है कि हमें जल्दी करनी चाहिए। तुम जानती हो कि एटम से बची लड़की को कोई भी परिवार अपनी बहू बनाना नहीं चाहता। फिर भी यह आदमी...
हम एक-दूसरे की तरह बनावटी ढंग से मुस्कराती हैं। वह जानती है कि उसने मैदान पार लिया है। वह मुझे अशांत छोड़कर चली गयी है।
लंबी सर्दी के बाद, खिले चेरी के वृक्ष के नीचे बैठना अच्छा लगता है। हम सब पिकनिक के मूड में बैठे गये हैं। मैं सबके बीच हूं।
बातचीत और हो-हल्ले के बीच कब समय निकल गया, कुछ पता ही न चल सका। ओहात्सु मुझे उठाती है, ‘वहां... वहां, वह है!’ वह चीखती है।
‘कौन, माएदा-सान?’
‘नहीं-नहीं, मेरी मित्र... जिसके बारे में मैंने तुम्हें कल बताया था। वह रहा हिरू, जो गहरे हरे रंग का किमोनो पहने खड़ा है। फिर वह मुझो बताती है कि उसका युवा-प्रेमी एक कलाकार है। माएदा-सान का एक शिष्य। कलाकृतियां कम बिक पाने के कारण वह अखबारों में फोटोग्राफी करता है।’
‘तो क्या हुए? मैं पूछती हूं!’
वह कहती है, ‘वह मुझसे विवाह करना चाहता है।’
‘वह कुछ कहे और मैं जवाब दूं, इससे पहले ही वह युवक हमारी ओर बढ़ा चला आ रहा था। मैं कुछ विचार करती, इससे पहले ही ओहात्सु ने मेरा परिचय करा दिया, ‘ये हैं, हिरू शिमिजु!’ और मैं मुस्कराकर रह जाती हूं। जब तक मेरा परिवार और सैम-जान भी वहीं आ पहुंचते हैं। मुझे ओहात्सु के प्रेमी से उन सबका परिचय करवान में खारी झिझक महसूस होती है। मैं देख रही हूं कि परिचय कराने के तुरंत बाद ही मेरे किरायेदार का चेहरा लटक गया है।’
पार्टी है। सभी लोग मस्त हैं। तभी फ्यूमियो अनायास कलाबाजी खाता हुआ जमीन पर लेट जाता है। मेरे सिवाय सभी हंस रहे हैं। मैं उसके करीब घुटनों पर गिर जाती हूं।
‘मैं उठ नहीं सकता ... मगर तुम उन सबको नहीं बताना ... उनकी शाम खराब हो जायेगी।’
मैं समझ जाती हूं, वह वही बीमारी है।
संयोग का हमारी जिन्दगी में कितना बड़ा स्थान है! मैं सोच रही हूं। अगर फ्यमियो छः अगस्त सन 1945 के रोज फौज से छुट्टी लेकर हिरोशिमा न आया होता तो वह निश्चित रूप से यहां न होता और अगर यहां न होता वह, तो उन ढेर-की-ढेर लाशों में एक-एक लाष उठाकर मुझे न ढूंढता और न ही रेडिएशन की बीमारी से ग्रस्त होता... पर अब क्या होगा!
अब वह अस्पताल में है। मैं सेब लेना चाहती हूं। महँगे सेब... मैं असल में कुछ खरीद नहीं सिर्फ देख रही हूं। सेल्स गर्ल से झूठ बोलना पड़ता है, पर जैसे ही उसे पता लगा कि मेरा पति रेडिएशन की बीमारी वाले सेक्शन में है... उसने तुरंत मुझे सेब थमा दिया, ‘ले लो, यह तुम्हारा है। मेरा पूरा परिवार एटमबम से जल गया था... मुझे क्षमा कर देना!’ मुझे लगा जैसे उसने अपनी उंगलियां बढ़ाकर मेरे दिल को छू लिया हो।
सैम-सान बुरी तरह झुंझलाया नजर आता है। उभी उसे पता चला कि फ्यूमियो से नहीं मिलने देना चाहती। उस आजाद परिंदे को भी कहीं हिरोशिमा की त्रासदी देखने को मिल गयी तो वह कहीं का न रहेगा, तुम घर चलकर मेरा इंतजार क्यों नहीं करते! फ्यूमियो के पास जाने की इजाजत किसी को नहीं है! पर तभी डॉ. दोमोतो आकर  उसे सगर्व अपना विभाग देखने का आग्रह करता है। यह तो वही हो गया जो नहीं होना चाहिए था।
‘इस बेड के आदमी के बीस ऑपरेशन हो चुके हैं।’ दोमोत सैम सान को बताता है, ‘यह लगड़ा एटम का युवा शिकार है। इसका एक तिहाई जिस्म विस्फोट के निशानों से भरा पड़ा है।’ फिर जब वह जापानी में बोलने लगता है तो सैम चाहता है कि मैं उसका अनुवाद कर दूं। मैं उसे समझाती हूं ‘डाक्टर बता रहे हैं कि एटम क रोगी अंदर और बाहर दोनों तरफ चोटें झेलते रहते हैं। बम के निशान तो एकबारगी मिट भी सकते हैं... पर चोट के भीतरी आघात का कोई इलाज नहीं... यह जो लड़का लेटा है, इसकी आंखों के पपोटे बम के विस्फोट से जड़ हो गये हैं... चौदह साल से यह खुली आंखों से सो रहा है। इसके दोनों कानों के ढकने भी गायब है। मंुह तो तुम खुद ही देख रहे हो!’ मैं अच्छी तरह देख पा रही हूं कि हमारा किरायेदास हताशा में डूब ओर उतरा रहा है।
मैं रात को किमोनो उतारकर युकाता पहने दबे पैरों फर्श पार करती हूं ताकि मेरा मुटल्ला लड़का जाग जाये! रसोईघर में जाकर एक प्याला गरम चाय बना लूं ताकि मेरा अकेला शरीर गर्मी पा सके... शरीर, जिसका साथी अब नहीं रह गया है।
यामागुची-सान सुबह-सुबह आ धमका है, ‘मैं तुम्हारे पति से मिलना चाहता हूं।’
हे भगवान अब इससे क्या कहूं, ‘मेरे पति ओसाका गये हैं... मैं साफ झूठ बोल जाती हूं। मैं उसका परिचय अपने अमेरिकी किरायेदार से करवाती हूं।’
सैम-सान मुझसे कुछ पूछना चाह रहा है और बहुत सोच-विचार के बाद मेरी जबान खुल पाती है कि हम लोग जो एटम के शिकार है... समाज से किस तरह बहिष्कृत हैं! हमारे जख्मों को देखकर लोग किस तरह वितृष्णा से भर उठते हैं।
सैम मेरा हाथ थाम लेता है। उसे क्या पता कि यह बांह जख्मों से भरी है और जख्म युकाता के भीतर छिपे हैं।
सेम, बार-बार मेरी बेटी मिचिको के अकेलेपन में खोये रहने पर भी चर्चा करना चाह रहा था। और सोच रही थी कि जो कुछ अकेले में मिचिको देखती है वह कोई और देख ही कैसे सकता है!
ओहात्सु की पार्टी में जब सैम को उस जाति के बारे में विस्तार से सूचना मिलती है कि रेडियेशन ग्रस्त लोगों की एक जाति ही बन गयी है तो वह भाव-विह्नल हो उठता है... उसे लगता है कि उसे डाक्टर ही होना चाहिए था। वह निहायत संवेदनशील है और जीवन क प्रति खास तरह का अनुराग रखता है।
पार्टी में सैम अन्यमनस्क ही रहा। फिर  एकाएक उसने मुझे अपनी बांहों के घेरे में लेकर सटा लिया... और मेरे भीतर एक लहर दौड़ गयी।
धीरे-धीर सैम ज्यादा ही जुड़ता चला जा रहा है। एक रोज वह फ्यूमियो को देखने पहुंचा तो बोला, ‘युका, मैं फ्यूमियो से दो शब्द कह सकता हूं?’ फिर मेरे कान में आकर फुसफुसाया, ‘तुम्हें एतराज तो नहीं!’
‘देखो, मुझे बात कहनी नहीं आती....’ वह शुरू करता है, ‘लेकिन मैं तुम्हें धन्यवाद करना चाहता हूं फ्यूमियो... तुम्हें मालूम है, तुम्हारे ही जरिए मैंने हिरोशिमा का अर्थ जाना है। यह वह चीज है, जिसे ज्यादा लोग नहीं जानते... मैं कुछेक लोगों को बताऊंगा...’
मैं अनुवाद करते हुए फ्यूमियो को समझाती हूं तो वह सैम से आंखें मिलाता है। एकाएक फ्यूमियो के चेहरे में चमक आ जाती है और सैम के चेहरे पर लहू दौड़ जाता है। मुझे लगता है कि कुछ क्षणों के लिए पूरा ब्रह्मांड ठहर गया है।
समय के साथ-साथ हम और करीब आ गये हैं, मैंने सैमको मां के न रहने का वृत्तांत भी बताया। जो दृश्य मुझे बहुत साफ-साफ याद थे, उसे स्मृतियों के आधार पर दिखाने की कोशिश थी... मामा-सान और ओहात्सु के साथ हमारे कपड़े विस्फोट से चिथड़े-चिथड़े होकर उड़ गये थे। हम करीब-करीब निर्वस्त्र ही थीं। आग के गोले हवा में उड़ गये थे... सड़कों का कोलतार उबल-पिघल गया था। कितने कुत्ते जिंदा भुन गये थे। 
मुझे याद है, वे कितना आर्त्तनाद कर रहे थे! मामा भी पानी में कूदने से पहले जरूर चीखी होगी!
मैं बोलती ही जाती अगर वह मुझे चुप ही न कर देता, ‘बस करो, अब मुझमें सुनने का माद्दा नहीं रहा।’
मैं उसे टोकती हूं, ‘तुम्हे ताकत ढूंढनी पड़ेगी, क्योंकि तुम अब इसके बीच हो, हम सबके साथ-साथ!’ किओसोको पहुंचकर जैसे ही ओहात्सु की नजर हिरू के चेहरे पर पड़ती है, मैं उस मछली को उसकी आंख में प्रतिबिंबित देखती हूं। वहां ‘रेडियेट’ हुए मछली तैरती नजर आती है, जिसके दो मोटे सिर हैं और चार दुखभरी आंखे... वह, जिसकी तस्वीर हमने डॉ. दोमोतो के दफ्तर में देखी थी। मैं देखती हूं कि बहन के शरीर में कंपकंपी हो आयी है। क्या अचानक उसे अपने शरीर से नफरत होने लगी है। क्या उस निरंकुश बम ने हमेशा के लिए लहू और हड्डियों को दूषित कर दिया है ... ओहात्सु की खूबसूरत कोख को भी!
‘मैं तोक्यो जा रही हूं। ढंूढने की कोशिश न करना। हिरू मुझसे शादी के लिए जिद कर रहा है, अपने मां-बाप की इच्छा के विरुद्ध। मैं शादी नहीं कर सकती। हर युवक को स्वस्थ संतान पैदा करने का अधिकार है। हो सकता है, मेरे बच्चे उस मछली की तरह ही हों... ओहात्सु खत लिखकर छोड़ गयी थी।
‘युका, क्या बात है? सैम सामने खड़ा था। उसे जवाब नहीं मिला, पर वह समझ रहा था कि हिरोशिमा के आत्महत्या वाले तरीके से ही वह गायब हुई है। छह बजे जब मैं यहां से गयी थी, फ्यमियो के बेड पर कोई परदा न था। अब परदा लगा हुआ है, उसका अर्थ मैं समझ रही हूं।
फ्यूमियो फुसफुसा रहा है... वह मुझसे बहुत कुछ कहना चाहता है... और मैं सभी कुछ समझ रही हूं। वह कह रहा है- ‘तुम मेरे लिए सब कुछ रही हो... तुम अपने प्यार का उपयोग किये बिना रह जाओगी... तुम्हें पता है कि तुमने अपना सारा प्यार मेरे साथ बांध रखा है। मैं तुमसे यही कहना चाहता हूं कि तुम उसे बांट देना, उन्मुक्त भाव से...’ ‘फ्यूमियोऽऽऽ’ मैं फुसफुसाती हंू... जानती हूं कि अब वह मेरी आवाज नहीं सुन रहा है...

(एदिता मोरिस के उपन्यास का संक्षिप्त रूप। षुकदेव प्रसाद द्वारा संपादित ‘विष्व प्रसिद्ध विज्ञान कथाएं’ से साभार।)