विज्ञान कथा

(04/Apr/2015)

मेकैनिकल ऐज्यूकेटर


हरीश गोयल

मेरी बात कोई सच नहीं मान रहा है। कानून भी नहीं। जज ने कहा कि इसके लिये कानून को बदलना होगा। लेकिन जब तक कानून नहीं बदल जाता तब तक मुझे जेल के सीखचों के पीछे रहना होगा। मेरे चाचा के बेटे सुशान्त का भी इसमें क्या दोष था। उसकी डिग्रियाँ फर्जी कहकर जब्त कर ली गई थीं। आई.ए.एस. की परीक्षा में उसने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। सुशान्त का इन्टरव्यू लिया गया। उसमें भी उसका प्रथम स्थान रहा। वह कलक्टर हो गया था। शीघ्र ही उसे भी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। मेरी नौकरी तो गई ही मैं सींखचों के पीछे बन्द था। सुशान्त को भी जेल की हवा खानी पड़ी। उसकी पत्नी मोक्षदा का हाल बहुत बुरा था। वह तो रो रोकर पागल हो गई थी। मेरी पत्नी स्निग्धा का भी हाल बहुत बुरा था। मेरे चाचा अनिरूद्ध तो मुझसे बहुत खफा हो गये थे। उन्होंने तो मुझसे सम्बन्ध ही तोड़ लिया था। जो इज्जत जो शोहरत हमने कदम फूँक फूँक कर अर्जित की थी, वह पल भर में धूल हो गई। मेरे प्रयोग को आजमाने का इतना बड़ा परिणम निकलेगा मैंने सोचा भी नहीं था। मैं एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक था तथा न्यूरो सर्जन था। केवल मैं जानता था कि मैंने एक हैरतअंगेज कारनामा कर दिखाया था। लेकिन अभी इसे कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं था। सभी ने मेरे प्रयोग को महज एक ट्रिक समझा। मेरा तथा चाचा दोनों का ही परिवार दुखी था। आर्त था। उदासी ने अपना दामन फैला लिया था। मेरी पत्नी स्निग्धा गमगीन रहती थी। मोक्षदा व्यथित रहती। सभी मेरे कारण संत्रस्त थे। इससें मेरा दुखः और बढ़ गया था। दुःख इस बात का था कि मैंने अपने ही चाचा के बेटे पर यह प्रयोग किया। मेरे भाई पर। चाहता तो मैं किसी और पर भी यह प्रयोग कर सकता था। इस दुखद घटना को मैं अपने जीवन में कभी नहीं भुला सकूँगा।
जेल के सीखचों के पीछे मुझे एक-एक बात याद आ रही थी। सुशान्त ने मोक्षदा से प्रेम विवाह किया था। घरवालों के नहीं चाहने पर भी सुशान्त ने यह विवाह किया था। मोक्षदा सुंदर थी। सुशांत उसकी चारूता में बह गया। उसकी चंचलता ने सुशान्त का मन मोह लिया। उसकी शोख अदाओं का वह दीवाना हो गया था। तब वह बी.ए. की पढ़ाई कर रहा था। मोक्षदा भी उसी कॉलेज में पढ़ा करती थी। सुशान्त कभी नहीं पढ़ता था। वह फेल भी हो चुका था। उसके चाचा ने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी। उसे तो उसकी नौकरी की भी आशा नहीं थी। सेकेण्डरी  तथा हायर सैकण्डरी मंे उसका कोई डिविजन नहीं बना । पढ़ाई के मामले में तो वह फिसड्डी रहता था। कॉलेज में केवल मौज मस्ती और शरारतें करता था। ऐसे शरारती लड़के ने पता नहीं मोक्षदा पर क्या जादू कर दिया था। यह ठीक था कि वह सुडौल तथा सुन्दर था। वह केवल खेल में रूचि लेता था। दिन भर क्रिकेट खेलता रहता था। किताबें तो उससे कोसांे दूर थीं। आज भी उसे किताब पढ़ने को कोई शौक नहीं है। मेरे चाचा अनिरूद्ध उसकी आये दिन शरारती हरकतों से बहुत दुखी रहते थे। उसमें सभी बुरी आदतें थी। अच्छी कोई भी आदत नहीं थी। उसके पिता सच बोलते थे तो वह बात बात में झूठ बोलता था। वह थियेटरों में टिकटें ब्लैक करता। आवारा दोस्तों के साथ रहता। वह रईस बाप का बिगड़ैल बेटा था। लड़कियों के साथ फ्लर्ट करता। उनके पीछे लगा रहता।
चाचा ने उसके लिये अच्छी-अच्छी किताबें लाकर रखी लेकिन उसने उनके हाथ नहीं लगाया। उसका पढ़ाई से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। जबकि चाचा स्वयं धार्मिक प्रवृत्ति के थे। किताबें पढ़ने का उन्हें बेहद शौक था। चाची भी धार्मिक प्रवृत्ति की थी। मेरे पिता की मृत्यु के पश्चात उन्होनें ही मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया। मम्मी भी तब साथ ही रहती थी। लेकिन सुशान्त की हरकतें इतनी बढ़ गई थी कि मम्मी और मैं उनके रिवार से अलग रहने लगे। मेरे चाचा ने भी उससे दुखी होकर इसकी इजाजत दे दी थी। मैं होनहार था। पढ़ाई में अव्वल रहता था। पी.एम.टी. में मैंने टॉप किया था। एम.एस.करने के पश्चात मैं न्यूरोसर्जन हो गया था। लेकिन मुझे कम्प्यूटर से बहुत लगाव था। मैं सर्जरी के अलावा अनुसंधान में जुटा रहता था। मैंने स्वयं की एक प्रयोगशाला विकसित कर ली थी। अब मैं न्यूरोसर्जन कम और प्रयोगशाला में अधिक ध्यान देता था। मैं एक अनोखा प्रयोग कर रहा था। न्यूरोसर्जरी में मैं कम उम्र में ही विश्वविख्यात हो चुका था। अतः मैंने काफी धन अर्जित किया था। यह धन मैंने अपनी प्रयोगशला को विकसित करने में लगाया। मैंने माइन्ड और मशीन को संयुक्त करना चाहा। मस्तिष्क कभी भी मशाीन को स्वीकार नहीं करता था। अतः मैंने ऐसी दवा ईजाद की जिससे मस्तिष्क का इम्यून सिस्टम कम हो गया अतः उसने मशीन को स्वीकार करना प्रारम्भ किया। कम्प्यूटर या रोबोटिक मस्तिष्क में भी मैंने महारत हासिल कर ली थी। कई रोबोटिक मस्तिष्क मेरी प्रयोगशाला में देखे जा सकते थे जो बिना किसी शरीर के भी सक्रिय थे। मैंने उनमें रोबोट का शेष शरीर फिट नहीं किया था। मैं प्रारम्भ से ही ‘मेकैनिकल ऐेज्युकेटर’ के स्वप्न को देख करता था। मैं मस्तिष्क में एक ऐसी मशीन को फिट करना चाहता था जिससे कि मस्तिष्क की कोशिकाएँ उद्दीत्ति हो जाये। फिर मस्तिष्क की कोशिकाएँ वहीं कार्य करे जो मशीन चाहती है वास्तव में मैं इस मशीन से मस्तिष्क की स्मृति उद्दीत्ति करना चाहता था। कितना अच्छा होगा कि यदि किसी मशीन के फिट करने पर मस्तिष्क की स्मृति भीतर से उद्दीपित हो जाये। यह आसान कार्य नहीं था। हमारा मस्तिष्क पता नहीं कितनी स्मृति संजोये होता है लेकिन हम उन्हें कालान्तर में भूल जाते हैं। केवल कुछ ही स्मृतियाँ याद रहती हैं। बचपन की स्मृतियाँ तो हमें बहुत कम याद रहती हैं। बचपन की स्मृतियाँ, यानी जब आप तीन चार साल के हो तो क्या आपको याद रहेगी यदि माता-पिता ने बार-बार नहीं दोहराया हो? लेकिन उसका जीता जागता अहसास तुम्हें फिर भी स्मृत नहीं हो पायेगा। केवल माता पिता या अन्य लोगों के शब्दों पर ही तुम्हें विश्वास करना होगा। लेकिन यह नई मशीन तुम्हारी स्मृति में चार चाँद लगा देगी। तुम्हारी बचपन की स्मृति तरोताजा कर देगी या जो भी स्मृति तुम याद करना चाहोगे जो तुम्हारे जीवन में घटी हो, वह चलचित्र की भांति तुम्हारे स्मृति पटल पर आ जायेगी। इसका तुम चल-चित्र की भांति ही एहसास करोगे। लेकिन भीतर से न की बराबर से। 
जब मैं इस प्रयोग में सफल हो गया तो में एक और कदम आगे बढ़ा, मैं अब एक ऐसी मशीन बनाने में जुटा हुआ था। जिसमें मस्तिष्क में कृत्रिम स्मृति डाली जा सकें। मशीन को हटाने पर भी वह स्मृति तरोताजा रहे। उस मशीन का नाम था- ‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर’। यदि मैं किसी व्यक्ति के भीतर नई स्मृतियां डाल पाऊँ तो कितना आनन्द रहेगा। एक छात्र के लिये भी यह कितना उत्साह वर्धक रहेगा। यदि किसी छात्र में मेरी मशीन से कृत्रिम स्मृति डाल दी जाये तो उसे कुछ याद करने की आवश्यक्ता नहीं रहेगी। वह उसका प्रयोग परीक्षा में कर सकेगा। यदि किसी किताब को उसकी स्मृति में फीड कर दिया जायेगा तो वह उसके मस्तिष्क में तरोताजा रहेगी। जो अनुभव एक छात्र पढ़-पढ़ कर कई वर्षों में अर्जित करता है उसे पलभर में ही मिल जायेगा। गणित के सवाल, अंग्रेजी भाषा या अन्य भाषा वह कैसे सीखेगा? छात्र के मस्तिष्क में ये बातें ग्रेडेसन से भरी जायेगी। पहले सरल फिर कठिन। लेकिन कृत्रिम स्मृति एक रील की तरह कार्य करेगी जो उसे सिखाती चली जायेगी। वे उसके अनुभव से तुरंत जुड़ जायेगी। कुछ विषयों जैसे इतिहास, नागरिक शास्त्र, कला के अन्य विषयों में तो गणित की आवश्यकता ही नहीं होती। लेकिन मेरी मशीन से कोई फर्क नहीं पड़ता कि छात्र को कुछ आता है या नहीं।
‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर’ से उसके मस्तिष्क की कोशिकाएं उद्दीपित हो जायेंगी। और उनमें स्मृति डाली जा सकेगी।
मैने सोचा यदि मैने एक ऐसी मशीन बना दी जिससे याद नहीं करना पडेगा तो आने वाले वक्त में परीक्षाओं का कोई महत्व नहीं रह जायेगा। अधिकांश छात्र रटकर उगल देते हैं। कुछ नकलें करते है। यह सब बंद हो जायेगा। फिर ज्ञान का विस्फोट इतनी तेजी से हो रहा है कि अब विश्व का ज्ञान हर दो वर्ष में दुगना होने लगता है। ऐसे में एक व्यक्ति कितना ज्ञान ले पायेगा। अब व्यक्ति अपने विषय से संबंधित सारा ज्ञान पूरी जिंदगी अपने मस्तिष्क में समा नहीं पाता है। अब तो जो कुछ भी प्राप्त करता है वह नहीं के बराबर है। लेकिन मेकैनिकल ऐज्युकेटर से नित नये प्राप्त हो रहे ज्ञान को मस्तिष्क में भरा जा सकता है। उसकी स्मृतियाँ हमेशा तरोताजा रहेंगी। इससे मानवता का विकास इतनी तेजी से होगा। उसे बस अपना मस्तिष्क नया कुछ रचनात्मक करने में ही लगाना होगा।
मैं कई वर्षाें तक प्रयोग करता रहा। आखिर में ‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर’ बनाने में सफल हो गया। मेकैनिकल ऐज्युकेटर, एक अद्भुत मशीन ... शताब्दियों बाद कोई ऐसी मशीन बनी थी। गिनीपिग तथा अन्य जंतुओं पर यह प्रयोग सफलता पूर्वक आजमाने के पश्चात मैंने इसे मनुष्य पर आजमाना चाहा। लेकिन किस पर यह प्रयोग किस पर आजमाऊँ। अचानक मेरे मस्तिष्क में विचार कौंधा। क्यों नहीं में इसे अपने चाचा के लड़के सुशान्त पर यह आजमाऊँ। पढ़ने के मामले में वह हमेशा फिसड्डी रहा है। एक दिन मैंने सुशान्त को अपनी प्रयोगशाला में बुलाया। वह अक्सर मेरी खिल्ली उड़ाया करता था। लेकिन इसके बावजूद मेरे मन में उसके प्रति कोई नफरत नहीं थी। मैं चाहता था कि उसकी मेरे प्रति जलन कम हो। और यह भी की यदि मेरा प्रयोग उस पर सफल हो गया तो उसका जीवन बन जायेगा। 
‘‘हैलो, निरंजन कैसे याद किया मुझे?आज तो कमाल ही हो गया, आज तक तो पूछा नहीं मुझे?’’ सुशान्त मुझे भैया या भाई साहब कहकर संबोधित नहीं करता था।
‘‘हाँ, सुशान्त अब तक की बात अलग है, तुम अपनी ही दुनिया में मस्त रहे।’’
‘‘क्या करता, तुम्हें तो पढ़ने से ही फुरसत नहीं मिलती। दिन रात अपनी प्रयोगशाला में दिमाग खपाते रहते हो। बेचारी भाभी भी तुमसे दुखी हो जाती है।’’
‘‘लेकिन क्या तुम्हें इस बात का तनिक भी दुख नहीं होता कि परीक्षा में तुम्हारे मार्क्स बहुत कम आते है। केवल पास होना ही तो काफी नहीं होता है।’’
‘‘बस, नहीं सुनना चाहता तुम्हारी बकवास क्या मुझे लेक्चर पिलाने के लिये यहाँ बुलाया था?’’ सुशान्त ने आवेश में आते हुए कहा।
‘‘ओह नहीं, इस बार मैं तुम्हें कोई भाषण-वासन नहीं दूँगा। मैंने तुम्हारे भले के लिये यहाँ बुलाया है?’’
‘‘मैं खूब जानता हूँ तुम्हारे भले को। तुम यहीं कहोगे कि इम्तहान की तैयारी करो, मन लगाकर किताबें पढ़ो...तुम्हारे भविष्य का सवाल है..... मेरे भविष्य की ऐसी कम तैसी..... तुम कौन होते हो मेरे भविष्य की परवाह करने वाले?’’ 
सुशान्त ने रोष प्रगट किया, ‘‘देखो, तुम मेरे असली भाई नहीं, पर हो तो मेरे भाई ही, भले ही चाचा के लड़के हो... लेकिन मैंने तुम्हें कभी असली भाई से कम नहीं समझा। तुम्हारा भला चाहने के कारण ही तुम्हें हम थोड़ा भला बुरा कह देते थे। और तुम बुरा मान जाते।’’ 
‘‘नहीं, मुझे नहीं चाहिये भाई होने के नाते आपकी नेक सलाह...... इसे आपके पास ही रखिये। आगे से आप मुझे कभी अपनी प्रयोगशाला में नहीं बुलायेेंगे।’’ सुशान्त ने झल्लाते हुए कहा। सुशान्त बाहर जाने लगा।
‘‘रुको, सुशान्त, मैंने तुम्हें किसी किताब को पढ़ने के लिये नहीं बुलाया है बल्कि एक खास मकसद से बुलाया है।’’ मैंने सुशान्त को रोकते हुए कहा।
‘‘खास मकसद?’’ सुशान्त के झपकते हुए असमंजसपूर्वक पूछा।
‘‘हाँ, देखो सुशान्त, मैंने एक प्रयोग किया है’’ 
‘‘प्रयोग? मुझे क्या लेना देना तुम्हारे प्रयोगों से’’ सुशान्त अकड़पन से बोला।
‘‘लेकिन इस प्रयोग से तुम्हारा बहुत कुछ लेना देना है।’’ 
‘‘मैं समझा नहीं।’’
‘‘मैंने एक प्रयोग करके एक ऐसा उपकरण तैयार किया है जिसके लगाने से तुम्हें पढ़ना नहीं पडेगा।’’
‘‘क्या मतलब है?’’ सुशान्त ने तुनकते हुए कहा। 
‘‘मतलब अभी समझ में आ जायेगा? उसको लगाने के पश्चात तुम्हंे कुछ भी याद करना नहीं पड़ेगा। और तुम्हें परीक्षा में अव्वल आ सकते हो।’’
‘‘कैसे?’’
‘‘इसका चमत्कार तो मशीन के लगाने के पश्चात ही देखना।’’
‘‘कही गड़़़बड़ हो गया तो... मैं पागल भी हो सकता हूँ... नहीं...नहीं...मैं यह मशीन नहीं लगवाऊँगा।’’
‘‘देखो, सुशान्त मुझ पर भरोसा करके देखो..... इससे तुम्हारी जिन्दगी संवर जायेगी।’’ मैंने सुशान्त को भरोसा दिलाया।
‘‘ठीक है। मैं तैयार हूँ।’’ सुशान्त को लगा कि निरंजन भरोसेमंद है।
‘‘आओ मैं तुम्हें भीतर ले चलता हूँ।’’ 
मैं उसे प्रयोगशाला के तहखाने में ले आया जहाँ मैं यह गुप्त प्रयोग कर रहा था। मुझे अपने प्रयोग पर पूरा भरोसा था कि यह सफल होगा।
‘‘सुशान्त, तुम्हें इसे गुप्त रखना होगा।’’
‘‘मैं वादा करता हूँ कि मैं इसे गुप्त रखूँगा।’’
‘‘ठीक है तो मैं तुम पर वह उपकरण लगाने को तैयार हूँ आओ तुम उस सीट पर बैठो।’’ मैंने उसे कुर्सी की ओर इशारा किया।
चारों तरफ प्रयोग के उपकरण रखे हुए थे। मैंने एक उपकरण उठाया, ‘‘यह, देखो यह है एक अद्भुत उपकरण... यह इस सदी का सबसे अद्भुत उपकरण है।’’
‘‘क्या नाम है इसका?’’
‘‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर।’’
‘‘मेकेनिकल ऐज्युकेटर?’’
‘‘आश्चर्य नहीं करो...... मैं इसे अब तुम्हारे मस्तिष्क में लगाता हूँ।’’
मैंने मशीन के इलेक्ट्रोड सुशान्त के मस्तिष्क से लगा दिये।
‘‘मैं तुम्हें ये किताब पढ़ने को देता हूँ। तुम उसे झटपट पढ़ जाओ।’’
‘‘ठीक है।’’
मैंने उसे एक किताब पढ़ने के लिये दी। मैंने उपकरण चालू कर दिया। सुशान्त पुस्तक निरन्तर मन में पढ़ता रहा वह उस समय तक पुस्तक पढ़ता रहा जब तक कि वह समाप्त नहीं हो गई। वह इतिहास की पुस्तक थी। पुस्तक समाप्त होने पर मैंने उपकरण बंद कर दिया। जब तक सुशान्त पुस्तक पढ़ता रहा, मेरे दिल की धड़कन बढ़ती रही। ‘कहीं’ यह प्रयोग असफल हो गया तो? उपकरण को बंद करने पर मेरी उत्तेजना बहुत बढ़ गई थी। प्रयोग की सफलता या असफलता अब सुशान्त की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता था। अगला ही पल उसकी सफलता या असफलता को घोषित कर देगा। मैंने सुशान्त के सिर पर से मेकैनिकल ऐज्युकेटर हटा लिया। मैंने सुशान्त को किताब को स्मरण करने को कहा। यह मेरी उत्तेजना का क्षण था। सुशान्त बिना देखे किताब के प्रत्येक शब्द को स्मरण करके बोलता जा रहा था। वह जो कुछ भी बोल रहा था। कम्प्यूटर स्क्रीन पर भी डिस्प्ले हो रहा था। किताब के समाप्त होने पर मेरे मुख से निकला ‘‘यू.रे.का.’’ मैं अपने प्रयोग में सफल हो गया था। सुशान्त को सब कुछ याद था। मेरी खुशी का पारावार नहीं रहा। मैंने सुशान्त को स्वयं को किताब के वाक्यों को मॉनीटर पर उबरे वाक्यों से शब्दशः मिलान करने को कहा। सुशान्त हैरत में पड़ गया। उसे पूरी किताब याद हो गई थी..... वह भी शब्दशः।
‘‘निरंजन, यह तो कमाल ही हो गया।’’
‘‘हाँ, देखा तुमने मेकैनिकल ऐज्युकेटर का चमत्कार।’’
‘‘हाँ.... आज पहली बार मेरे मन में तुम्हारे प्रति श्रद्धा जागी है।’’ सुशान्त ने मुस्कराते हुए कहा।
‘‘अच्छा अब तुम जाओ, इस चमत्कार के बारे में किसी से नहीं कहना..... कहीं तुम भावावेश में नहीं आ जाओ।’’
‘‘नहीं निरंजन, तुम मेरी और से निश्ंिचत रहो।’’
सुशान्त को मैंने अगले दिन फिर प्रयोगशाला में आने के लिये कहा लेकिन इस बार उसे अपने कोर्स की किताबें लाने के लिये कहा। दूसरे दिन सुशान्त सही समय पर प्रयोगशाला आया। इस बार वह काफी प्रसन्न दिखायी पड़ रहा था। वह उत्साह से भरपूर था। वह तनिक उत्तेजित भी था। लगता था मेरे प्रयोग का उस पर गहरा असर हुआ था। मैंने पिछली किताब के प्रश्न उससे किये। मैं यह देखना चाहता था कि वह किताब को तोते की तरह रट कर उगल देता है या फिर बीच-बीच के प्रश्नों का उत्तर भी देता है। इससे उसकी बुद्धि का परीक्षण हो जायेगा। इससे यह पता चल जायेेगा कि पुस्तक को बुद्धि ने ग्रहण किया है। मैं उसे फिर से तहखाने में ले गया। मैंने मेकैनिकल ऐज्युकेटर को उसके सिर से लगाया तथा इलेक्ट्रोडो का मस्तिष्क से संबंध स्थापित किया। मशीन को ऑपरेट करते ही सुशान्त की मस्तिष्क की कोशिकाएं उद्दीपित हो गईं। उसने मेरे प्रश्नों का सही-सही उत्तर दिया। सोचने समझने तथा रचनात्मक प्रश्नों का भी उसने सही उत्तर दिया।
‘‘वैल डन!’’ मैंने उत्तेजित होते हुए कहा। इस सदी की इतनी बड़ी सफलता पर उत्तेजित होना स्वभाविक था।
सुशान्त भी उत्तेजित था।
‘‘क्या मैंने प्रश्नों के सही-सही उत्तर दिये?’’ सुशान्त ने उत्तेजित होते हुए प्रश्न किया। 
‘‘हाँ, तुमने बहुत सोच समझ कर तथा बिलकुल सही उत्तर दिये।’’
‘‘इसका मतलब, किताब को बिना कुछ याद किये ही मस्तिष्क ने ज्यों का त्यों ग्रहण किया।’’
‘‘हाँ, यही नहीं तुम्हारी बुद्धि ने किताब को पूरी तरह से समझा तभी तुम मेरे प्रश्नों का अच्छी तरह उत्तर दे पाये।’’
‘‘आश्चर्य! महान आश्चर्य! बिना कुछ याद किये ही बुद्धि सब कुछ कर लेती है।’’
‘‘हाँ सुशान्त, है न मेरे अविष्कार का?’’
‘‘हाँ इससे भी बड़ा कमाल कि बुद्धि उन्हें तुरंत समझ भी लेती है। हमें उन्हें समझने का प्रयास नहीं करना पड़ता।’’ सुशान्त ने उत्तेजित होते हुए कहा।
‘‘ हाँ, तभी इस अविष्कार का फायदा है।’’ मैंने हर्षित होते हुए कहा। प्रयोग की सफलता से मेरा दिल बाग बाग हो गया था।
‘‘निरंजन, यह तो दुनिया के लिये एक हैरतअंगेज कारनामा है।’’ सुशान्त ने आश्चर्य चकित होते हुए कहा।
‘‘ हाँ, सुशान्त दुनिया ने न तो ऐसा सोचा था न ही ऐसी कल्पना की थी।’’
‘‘क्या मैं गणित के सवाल भी ऐसे ही सीख सकता हूँ। बिना समझे, बिना कुछ याद किये।’’सुशान्त को मेरे प्रयोग पर अब भी विश्वास नहीं हो रहा था।
‘‘ हाँ, क्यों नहीं’’
‘‘पर गणित में तो मैं बहुत फिसड्डी था। मुझे गणित कभी भी समझ में नहीं आयी। सवाल का हल करते तो मुझे मौत आती थी। भगवान जाने कैसे पास हुआ।’’
‘‘अच्छा ठीक है यह करके भी देख लो।’’
‘‘ओ के!’’
‘‘क्या तुम गणित की कोई किताब लाये हो?’’
‘‘ हाँ, मैं इसे भी परखना चाहता था यह रही वह किताब।’’ सुशान्त ने मुझे किताब दिखातें हुए कहा।
‘‘अच्छा अब मैं मेकैनिकल ऐज्युकेटर तुम्हारे मस्तिष्क से लगाता हूँ।’’
‘‘ओके मैं पूरी तरह से तैयार हूँ।’’
मैने मेकैनिकल ऐज्युकेटर को उसके मस्तिष्क से लगाकर ऑपरेट किया। सुशान्त किताब के पृष्ठ खोलता गया तथा उन्हें पढ़ता रहा तथा सवालों के हल लिखता रहा। उसने सवालों को मन से नहीं किया लेकिन जो उद्धाहरण किताब में दे रखे थं उन्होंने ज्यों का त्यों लिखा। लेकिन किताब ने कैसे हल किया था। उसके कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह तो लिखते हुए पृष्ठ पलटता चला जा रहा था। गणित की किताब इस प्रकार उसने एक घंटे में पूरी कर ली। सुशान्त तथा मैं दोनों ही उत्तेजित थे। क्या सुशान्त को गणित के सूत्र याद हो गये? क्या वह उन सूत्रो के आधार पर उद्धाहरणों के अतिरिक्त दूसरे भी सवाल हल कर लेता है? मैने सुशान्त से गणित के कई सूत्रो के बारे में पूछा। उसने ठीक ठीक उत्तर दिये। उसे सभी सूत्र याद थे। फिर मैंने उसे मन से सवाल हल करने को दिये। मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही जब उसने बिना कुछ देखे सवालांे को हल कर दिया। उसने किसी प्रकार की त्रुटि नहीं की। वह उस पुस्तक से संबंधित किसी भी सवाल को फटाफट हल कर लेता था। दोनों ही विस्मित थे। कमाल हो गया। सुशान्त ने कौशल को भी बिना समझे ग्रहण किया। लेकिन मेकैनिकल ऐज्युकेटर का यह चमत्कार था कि बुद्धि ने उसे सोच समझ कर ग्रहण किया। यानि बुद्धि कौशल को भी ग्रहण कर सकती थी। पल भर में।
‘‘आश्चर्य! मुझे गणित आ गई। बिना सूत्र याद किये, बिना समझे और बिना उन्हें हल किये। करामाती है आपका यह उपकरण।’’
निरंजन काफी उत्तेजित था। वह दांतों तले उँगली दबाये बिना नहीं रह सका। मैं इतना अधिक उत्तेजित था कि मैं फूला नहीं समा रहा था, अपने प्रयोग की सफलता पर। सुशान्त ने अब अपनी कोर्स की किताब निकाली। उसकी थर्ड ईयर यानि बी.ए.फाइनल की परीक्षा थी। उसे अर्थशास्त्र की परीक्षा देनी थी। तैयारी उसने कुछ भी नहीं कर रखी थी। टी.डी.सी. प्रथम वर्ष तथा द्वितीय वर्ष में भी उसके केवल पास मार्क्स आये थे। उसके पिता ने उसे बहुत फटकार लगाई थी। लेकिन वे कर कुछ नहीं सकते थे। सुशान्त के आगे उन्होंने हार मान ली। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि उनका यह पुत्र कुपात्र निकलेगा। उनका कोई कहना नहीं मानेगा। वे उसी उद्दण्डता तथा शरारतों पर क्रुद्ध हो कर रह जाते। उन्होंने अपने पुत्र को एक ऊँची पोस्ट पर बैठने का सपना देखा था। लेकिन उनके सारे ख्वाब ढँह गये। अब उन्होंने उसे नियति के हवाले छोड़ दिया। वे उसके व्यवहार से क्षुब्ध तथा दुःखी थे। दूसरे दिन सुशान्त का पेपर था लेकिन अभी तक तो उसने किताब उठाकर नहीं देखी। पूरा साल उसने यो ही आवारागर्दी करते निकाल दिया। लेकिन मुझसे मिलने के पश्चात उसके रुख में परिवर्तन आया। इस प्रयोग की सफलता के पश्चात उसके मन में मेरे प्रति श्रद्धा जाग्रत हुई। वह मेरे प्रति विनम्र तथा सुशील बना।
‘‘सुशान्त तुम्हारी परीक्षा कब है?’’ 
‘‘कल ही है।’’
‘‘तो तुमने कुछ पढ़ाई-वढ़ाई की या नहीं?’’
‘‘नहीं, अभी तक तो मैंने किताब भी खोलकर नहीं देखी है।’’
‘‘तो अब क्या इरादा है तुम्हारा?’’
‘‘मैं आपके इस प्रयोग को परीक्षा में आजमाना चाहता हूँ।’’
‘‘ठीक है पर किसी से कहोगे तो नहीं?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘यदि तुमने कहा तो तुम्हारा एग्जाम कैंसिल हो सकता है साथ में मैं भी कटघरे में खड़ा हो सकता हूँ।’’
‘‘नहीं, आप मेरी तरफ से निश्चिन्त रहिये मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगा। आप का यह प्रयोग गुप्त रहेगा।’’
‘‘तब ठीक है तैयार हो जाओ।’’
‘‘ओ.के.’’
मैंने मेकैनिकल ऐज्युकेटर उसके मस्तिष्क से लगा दिया। मशीन के चालू करते ही मस्तिष्क की कोशिकाएं उद्दीपित हो गईं। अर्थशास्त्र की उसने किताब खोल रखी थी। किताब की स्मृति उसके मस्तिष्क में संचित हो रही थी। एक घंटे में पूरी पुस्तक समाप्त हो गई। मैंने मेकैनिकल ऐज्युकेटर उसके मस्तिष्क हटा दिया। उसे पूरी किताब बिना याद किये ही रट गई थी। सुशान्त पिछले पाँच वर्ष के पेपर लाया जो कि युनिवर्सिटी परीक्षाओं में आये थे। उसे आश्चर्य हुआ कि उसने उन्हें तुरंत हल कर दिया। दिमाग पर उसे तनिक भी जोर नहीं देना पड़ा।
‘‘लेकिन मुझे कल ही इस बात पर विश्वास होगा जब मैं पेपर देकर आऊँगा।’’
सुशान्त को फिर भी पक्का विश्वास नहीं जमा था।
‘‘आल राइट! विश यू बेस्ट ऑफ लक!’’
‘‘थंेक्यु गुड बाई!’’
सुशान्त मुस्कराता हुआ तथा हाथ हिलाता हुआ प्रयोगशाला से चला गया। अगले दिन सवेरे सात बजे ही परीक्षा थी। सुशान्त के माता-पिता हैरान थे। वह परीक्षा से पहले तनिक तो पढ़ता ही था लेकिन आज तो वह बिलकुल नहीं पढ़ रहा है। पिता से रहा नहीं गया। उन्होंने उसे फटकारा भी। लेकिन उसके कोई असर नहीं हुआ। पिता ने समझ लिया चिकना घड़ा है इसके क्या असर होगा। कॉलेज वह ठीक समय पर पहुँचा। सात बजनें में अभी दस मिनट शेष थे। उसने बाहर बोर्ड पर रोल नम्बर देखा। कमरा नं. सात में उसका रोल नम्बर था। वह अपने रोल नम्बर की सीट पर बैठ गया। एक पेन और एडमिशन कार्ड के अलावा उसके पास कुछ नहीं था। उत्तर पुस्तिका पर उसने अपना रोल नम्बर लिखा। अब दो मिनट रह गये थंे। सुशान्त के हृदय की धड़कन बढ़ गई। पेपर अब उसके हाथ में ही दिया जाने वाला था। क्या होगा यदि प्रयोग यहाँ असफल हो गया? इस बार तो वह अनुत्तीर्ण ही हो जायेगा। घंटी बजी। यह उत्तेजना का क्षण था। इनविजीलेटर ने पेपर बाँटने चालू किये। जब इनविजीलेटर निकट आया तो सुशान्त को लगा कि उसके हृदय की धड़कन रुक जायेगी। हृदय बहुत तेजी से धड़कनें लगा। यह उत्तेजना का आखिरी क्षण था। इनविजीलेटर ने परचा थमाया। उसने परचा पढ़ा। हँसी उसके चेहरे पर थिर आयी। पेपर बहुत कठिन था। सुशान्त ने रूम में एक नजर दौड़ाई। अधिकांश छात्रों के चेहरे पर हवाईयाँ उड़ी हुई थीं। लेकिन वह उस पेपर को बड़े मजे से करने लगा। ‘‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर’’ के द्वारा फीड की गई स्मृति तरो ताजा रही। उसे सब कुछ याद आ गया।
उसने कोई ऐसा फ्रेंक उपकरण नहीं लगाया था जिससे यह साबित हो सकें की उसने नकल की। वह अपनी बुद्धि का प्रयोग कर इन प्रश्नों को हल करने में लगा हुआ था। उसने आधे घंटे पहले ही वह प्रश्नपत्र हल कर लिया था और आराम से बैठ गया था। उसने सभी प्रश्नों के उत्तर सौ प्रतिशत सही दिये। उसके चेहरे पर प्रसन्नता थिर आयी। अन्य का हाल इस प्रश्न-पत्र में बहुत बुरा था। शायद दस वर्षों में पहली बार इतना कठिन प्रश्न-पत्र आया था। अधिकांश छात्र रूँआसा हो कर बाहर निकलें। सभी छात्र-छात्राएं कह रहे थे किस सिरफिरे ने यह पेपर दिया है।
लेकिन सुशान्त ने उस प्रश्न-पत्र को चुटकियों में हल कर दिया।
परीक्षा समाप्त होने पर वह प्रसन्नचित्त बाहर निकला। उसके धरती पर पाँव नहीं पड़ रहे थे। वह उत्तेजित था। वह शीघ्र प्रयोगशाला पहुँच जाना चाहता था। ताकि उसकी उत्तेजना को मुझसे मिलकर शांत कर सकें।
लेकिन बीच में ही मोक्षदा उसे मिल गई। ‘‘हाय, सुशान्त। कैसा हुआ पेपर? मोक्षदा ने उसे रोकते हुए प्रश्न किया। एक वहीं थी जो उसे रोककर भी बात कर लिया करती थी।’’
‘‘वेरीफाइन! एक्सीलंेट! सुशान्त ने आलहादित होते हुए कहा।’’
‘‘वो तो तुम्हारा चेहरा ही बता रहा है।’’
‘‘रिएॅली?’’
‘‘यस, दो दिन से तुम दिखाई नहीं पड़े।’’
‘‘पहले यह बताओं कि तुम्हारा पेपर कैसा हुआ। कोई खास अच्छा नहीं पेपर बहुत कठिन था। खैर, तुम्हारे क्या फरक पड़ता है पेपर कठिन हो या सरल।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘कौनसा तुम पढ़ते या याद करते हो?’’ तुम्हारे लिये तो सब प्रश्न-पत्र एकसार।
‘‘लेकिन इस बार देख लेना मेरा डिवीजन नहीं आया तो?’’
‘‘इस बार कौन से तुम्हारे सुर्खाब के पर लग गये। अभी तो पाँच पेपर बाकी है।’’
‘‘मैं दावे के साथ कहता हूँ कि पाँचों पेपर भी सही जायेंगे।’’
‘‘तुम्हें इतना आत्म विश्वास है?’’
‘‘हाँ मैं इस बार प्रोफेसरों के ख्यालात बदल दूँगा।’’ वो मेरे परिणाम से दंग रह जायेंगे।
‘‘क्यों शेखी बघारते हो। ऑवर कॉन्फीडेंट!’’ मोक्षदा हँस पड़ी।
‘‘तुम देखना मोक्षदा! अच्छा मोक्षदा मैं चलूँ।’’
मोक्षदा को अलविदा कह कर सुशान्त प्रयोगशाला की और तेजी से डग भरने लगा।
मोक्षदा ने कभी सुशान्त को इतना प्रफुल्लित नहीं देखा था। नित्य तो वह उसके पास कुछ समय के लिये बतियानें को रुक जाता था। लेकिन आज तो वह जरा जल्दी में था। उसे पढ़ाई की फिक्र कब से होने लगी? वह असमंजस में थी।
सुशान्त सीधा एक पुस्तक विक्रेेता के पास पहुँचा उसने तुरंत उससे अगले दिन की परीक्षा की किताब खरीदी।
वह सीधा प्रयोगशाला पहुँचा। मैं उसका बेसब्री से इन्तजार कर रहा था। उसका चेहरा ही दिखा रहा था कि वह कितना उत्फुल्ल था।
‘‘सुशान्त कैसा रहा पेपर?’’
‘‘एक्सीलेन्ट!आज तो मजा आ गया।’’
‘‘क्या तुमने सभी प्रश्नों को हल कर लिया?’’
‘‘हाँ बहुत अच्छी तरह से।’’
‘‘क्या तुम्हें सब कुछ याद आ गया?’’
‘‘हाँ, निरंजन, आज मैं बहुत खुश हूँ, मुझे सब याद आ गया। आपका प्रयोग सफल रहा।’’
‘‘तुम्हें उत्तर देते वक्त कैसा लगा?’’
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ नहीं कर रहा थ, बुद्धि अपने आप कार्य कर रही थी।
‘‘नहीं नहीं बुद्धि कोई तुमसे अलग थोडे़ ही है।’’
‘‘मेरे दिमाग में विचार किसी नहीं की धारा की तरह स्वाभाविक रूप से बह रहे थे ’’
‘‘तो आखिर मेरी वर्षों की साधना सफल हो गई।’’
‘‘हाँ, निरंजन, करामाती उपकरण है आपका मेकैनिकल ऐज्यूकेटर।’’
कुछ भी याद नहीं करना पड़ता।
कल किसका पेपर है?
‘‘कल नागरिक शास्त्र का पेपर है।’’
‘‘यह तुम्हारे हाथ में कौनसी पुस्तक है?’’
‘‘यह नागरिक शास्त्र की ही पुस्तक है। इसे मैंने अभी बाजार से खरीदी है।’’
‘‘तभी नई दिखाई पड़ रही है।’’
‘‘अब तुम पुस्तक खोलकर बैठ जाओ।’’
सुशान्त पहले की तरह ही प्रयोगशाला के तहखाने में रखी विशिष्ट प्रकार की कुर्सी पर बैठ गया। मैंने उसी प्रकार से उसके मस्तिष्क पर मेकैनिकल ऐज्यूकेटर लगाा दिया। उसकी मस्तिष्क की कोशिकाएँ उद्दीपित हो गईं। उसकी बुद्धि ने पूरी किताब को तेजी से ग्रहण कर लिया।
किताब पूरी होने पर मैंने मेकैनिकल ऐज्यूकेटर को उसके मस्तिष्क से परसे हटा दिया।
दूसरे दिन भी सुशान्त की स्मृति तरोताजा रही। उसका पेपर बहुत बढ़िया हुआ।
इस प्रकार उसने अन्य प्रश्न-पत्रों के भी उत्तर दिये।
परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थीं। मोक्षदा से उसका फिर से हमेशा की तरह मिलना प्रारम्भ हो गया।
परीक्षा के पश्चात सुशान्त का मुझसे मिलना बंद हो गया। मैं उसका परीक्षा परिणाम देखने के लिये उत्सुक था।
परीक्षा समाप्त होने के ठीक एक माह पश्चात् परिणाम आया। इन्टरनेट पर मैंने भी उसका रिजल्ट मालूम किया। मैं उत्तेजित था। उधर सुशान्त की भी यही स्थिति थी। वह घर पर ही था। उसके पिता तो हताश हो चुके थे। अतः उनकी उसके रिजल्ट में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी। माँ भी सोचती थी कि उसका क्या रिजल्ट आना है। पास मार्क्स या फेल। हताशा उसके चेहरे पर भी स्पष्ट झलक रही थी।
इन्टरनेट पर शाम को ठीक पाँच बजे परीक्षा परिणाम प्रसारित हुआ। सुशान्त तथा मैं दोनों ही उत्तेजित थे।
सुशान्त का फर्स्ट डिविजन आया। इन्टरनेट पर पिं्रटर से मार्क्स-शीट भी निकल आई थी। सुशान्त ने पाया कि उसके तृतीय वर्ष में प्रत्येक विषय में 98 प्रतिशत से अधिक अंक थे।
सुशान्त तथा मेरी बाँछें खिल गई। सुशान्त दौड़ा-दौड़ा मेरी प्रयोगशाला में आया।
‘‘निरंजन मैं प्रथम श्रेणी में पास हुआ।’’
बधाई हो सुशान्त अकसेप्ट माई हार्टिएस्ट कन्ग्रेच्यूलेशॅन।
‘‘थैक्यू, निरंजन, मेरे पास शब्द नहीं है खुशी व्यक्त करने के लिये।’’
‘‘नाट मैंशन,यह तो होना ही था।’’
निरंजन यदि मेरे पिछले मार्क्स यानी प्रथम व द्वितीय बी.ए.के नहीं जुड़ते तो मेरी प्रथम पॉजीशन आती।
‘‘हाँ सुशान्त, लेकिन प्रथम श्रेणी भी आना तुम्हारे जैसे छात्र के लिये एक बड़ी उपलब्धि है।’’
‘‘हाँ, निरंजन अगली बार मैं प्रथम स्थान अवश्य प्राप्त करूँगा।’’
‘‘हाँ अब मुझे पक्का भरोसा हो गया है।’’
‘‘ हाँ, आपका प्रयोग सफल रहा। ’’
दोनों के चेहरे खिले हुए थे। वे अपनी खुशी दबा नहीं पा रहे थे। ये तो वे दोंनो ही जानते थे कि उन्होंने क्या किया। दोनों ही प्रफुल्लित थे। अन्य छाखें को आश्चर्य हो रहा था कि एक फिसड्डी लड़का एक दम से इतने मार्क्स कैसे ला सकता है। कभी किसी ने उसे मेहनत करते नहीं देखा। उसके मां-बाप को भी बहुत आश्चर्य हो रहा था। उनका बेटा एकदम से होनहार कैसे हो गया?क्या वह किसी मित्र के पास जाकर पढ़ता था? नहीं, उन्होंने किसी ने उसे अपने दोस्त के साथ पढ़ते हुए नहीं देखा। वह तो मनमौजी था। दोस्तों के साथ केवल इधर-उधर घूमता रहता था। केवल गप्पे हाँकता था। मोक्षदा को भी उसकी अच्छी श्रेणी आने पर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। लेकिन उसे आश्चर्य भी हुआ। क्या सुशान्त मेहनत करने लगा है? अभी तक उसे मेकैनिकल ऐज्युकेटर के बारे में कुछ पता नहीं था। उसके प्रथम आने से वह उसे और गहरा चाहने लगी थी।
सुशान्त का इसके पश्चात मोक्षदा से विवाह हो गया।
मैंने उसे फिर आई.ए.एस. की परीक्षा में बैठने की सलाह दी। लोगों को आश्चर्य हुआ कि सुशान्त आई.ए.एस. की परीक्षा दे रहा है। अब लोगों को यह विश्वास होने लगा कि सुशान्त अवश्य रात्रि में गहरा अध्ययन करता होगा। लेकिन नह ही उसके मां-बाप और न ही मोक्षदा ने उसे किताब खोलते हुए देखा। लेकिन उसके फर्स्ट आने से लोग अवश्य उसे बुद्धिमान मानने लगे थे।
आई.ए.एस. की परीक्षा निकट थी। सुशान्त ने अभी पुस्तक खोलकर भी नहीं देखी थी। उसने फैसला किया कि वह किताबें परीक्षा के एक दिन पहले खरीदेगा।
परीक्षा प्रारम्भ होने एक दिन पहले मैंने सुशान्त के मस्तिष्क का संबंध ‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर’ से कर दिया उसका सामान्य ज्ञान एवं अंग्रेजी का पेपर बहुत अच्छा हुआ। सामान्य ज्ञान में तो उसे सौ प्रतिशत अंक प्राप्त करने की आशा थी। प्रत्येक परीक्षा से पहले सुशान्त मस्तिष्क का सम्बन्ध ‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर’ से कर दिया जाता। इससे उसकी मस्तिष्क की कोशिकाएँ उद्दीपित हो जातीं। मस्तिष्क की स्मृति किताब को किसी कम्प्यूटर की भांति ग्रहण करती। लेकिन तनिक फर्क यह था कि वह अपनी स्वयं की बुद्धि का भी प्रयोग कर सकता था।
प्रत्येक प्रश्न हल करने के पश्चात सुशान्त बल्लियों उछलता। मैं भी फूला न समाता। यह एक कमाल ही था। कि पढ़ने के लिये उसे याद कुछ नहीं करना पड़ता था। मान लीजिये मेरे प्रयोग के पश्चात मेकैनिकल ऐज्युकेटर बाजार में आ गया तो क्या होगा?कोई छात्र पढ़ाई नहीं करेगा। पढ़ाई की आवश्यक्ता ही नहीं समझेगा। इससे आने वाले दिनों में ‘परीक्षा’ नाम की चीज ही गायब हो जायेगी। पुस्तक नाम की चीज ही संसार से विदा ले लेगी। मॉनीटर यानि कम्प्युटर के परदे से ही छात्र सीधे ज्ञान को ग्रहण कर सकेगा। लेकिन उस ज्ञान को ‘जज’ करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। इससे दुनिया पूरी तरह परिवर्तित हो जायेगी। संस्था, स्कूल, कॉलेज, युनिवर्सिटी नाम के शब्द सदा के लिए विदा ले लेंगे। ज्ञान की प्राप्ति करनी होगी अब केवल कुछ रचनात्मक करने के लिये। अब केवल अनुसंधान का महत्व होगा। केवल अविष्कार करने होंगे। मानव प्रगति के लिये। मस्तिष्क इतना अधिक जटिल है कि यदि इसका पूरी तरह से इस्तेमाल किया जाये तो मानव-प्रगति की अनन्त संभावनाएं हैं। और वो वक्त दूर नहीं होगा जब हम इस पूरे ब्रह्मण्ड में यदि अन्य सभ्यताएँ हुई तो सबसे बुद्धिमान प्राणी कहलायेंगे। कितना ऊँचा स्वप्न देखा था मैंने। मेरी यह सफलता इस सपने को साकार कर देगी। आई.ए.एस. की परीक्षा का परिणाम निकला। सुशान्त ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। सबसे हैरत अंगेज बात यह थी कि उसके अधिकांश विषयों में शत प्रतिशत अंक आये परीक्षक भी दांतों तले ऊँगुली दबाने लगे।
साक्षात्कार में भी उसके उत्तरों को सुनकर पी.एस.सी. के सदस्य तथा एक्सपर्ट हतप्रभ रह गये। ऐसा होनहार विद्यार्थी इससे पहले न तो किसी ने देखा न ही सुना। उन्होंने उसे इतने अच्छे अंक दिये कि उसने आई.ए.एस. में टॉप किया। इस सफलता से न ही केवल सुशान्त बल्कि मेरे दोनो के ही मन में कमल खिल उठे। मैं अपनी प्रयोग की सफलता पर मुदित था तो वह बिना कुछ याद किये, बिना कुछ पढ़े आई.ए.एस. की परीक्षा के टॉप करने पर उल्लासित था। लोगो की सुशान्त को बधाईयां मिल रही थीं। लेकिन मंद ही मंद हम दोनों मुस्करा रहे थे। हम किसी से कुछ नहीं कह रहे थे कि क्या हुआ। लोग सुशान्त की मुक्त कंठ से पं्रशसा कर रहे थे। लोग तारिफ के पुल बांध रहे थें कि अनिरूद्ध का बेटा होनहार निकल गया। लेकिन अनिरूद्ध अभी तक समझ नहीं पाये कि जिस बेटे को उन्होेंने कभी पढ़ते नहीं देखा वह होनहार कैसे हो गया। सुशान्त अजमेर में ही कलॅक्टर की पोस्ट पर नियुक्त हुआ।
सभी प्रसन्न थे। सुशान्त के व्यवहार में भी परिवर्तन हो चुका था। वह उद्दंडता छोड़ चुका था। वह विनम्र तथा सौम्य प्रकृति का हो चुका था। किसी ने सच ही कहा कि विद्या ददाति विनये। सुशान्त के व्यवाहर में सभी पुलकित थें। कुछ दिनों तक सब कुछ ठीकठाक चलता रहा। मैं इस प्रयोग को दुनियां के समक्ष रखनें की तैयारी कर रहा था। तभी अचानक एक ऐसी घटना हो गयी कि मेरे सारे सपने चूर-चूर हो गये। ‘‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर’’ की बात लीक हो गई। लोग मेकैनिकल ऐज्युकेटर की धारणा को तो नहीं समझ पाये लेकिन उन्होंने इसे परीक्षा में नकल करने का साधारण-सा उपकरण समझा। एक ‘ट्रिक’ समझी। मैं स्वयं समझ नहीं पाया कि बात आखिर लीक कैसे हुई? क्या सुशान्त के मुख से कभी कुछ जोश ही जोश में निकल गया? व्यक्ति के मुख से हर्षतिरेेक में भी कई बार राज खुल जाता है। क्या उसने मोक्षदा के आगे तो राज नहीं खोल दिया। कई बार व्यक्ति देखो किसी से कहना नहीं। कहकर छुटकारा पा लेता है और राज उगल देता है। लेकिन मोक्षदा उसकी पत्नीं है, यदि उसे पता भी चल गया तो क्या वह पति का राज दूसरो के आगे खोल देगी? हाँ, वो ऐसा कर सकती है यदि उसकी आत्मा ने गंवारा नहीं किया तो। 
सुशान्त नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। कलक्टर की पोस्ट उसके हाथ से छिन गई। उसकी अर्जित डिग्रीयां भी अमान्य कर दी गई। मेरी प्रयोगशाला के आगे भीड़ जमा हो गई थी। लोग चिल्ला रहे थे। अपना क्रोध मुझ पर उगल रहे थे। पुलिस ने मुझे अपनी हिरासत में ले लिया था। लोगो ने मेरे प्रयोग महज एक चाल समझा। नकल कराने की मशीन का प्रयोग करता। मॉब मेन्टैलिटी यानि सामूहिक मनोवृत्ति कुछ और ही होती है। वह सही या गलत नहीं देखती है। मैं दुःखी था, क्षुब्ध था। किसी के आगे अपनी सफाई पेश नहीं कर पा रहा था। इतना बदनाम हो चुका था कि कोई मेरी बात को सुनने को तैयार नहीं था। न ही सुशान्त की कोई बात मान रहा था। दोनों जेल की सलाखों की पीछे बंद थे। किसी ने रात्रि में मेरी प्रयोगशाला को जला दिया। कोई मेरे प्रयोग को समझ नहीं पाया। ‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर’ की धारणा को। यह तो एक ऐसी धारणा थी कि इससे संसार में क्रंाति आ जाती। पूरा विश्व बदल जाता। 
काश! मैं इस प्रयोग को विश्व के सम्मुख पहले रख पाता। यह तो अच्छा था कि प्रयोगशाला के धू-धू जलते वक्त कोई व्यक्ति वहाँ मौजूद नहीं था। लोगो को केवल यही बताया गया कि शॉर्ट सर्किट हो गया। मैं दुःखी था। क्षुब्ध था। सलाखों के पीछे मेरी आँखों से अश्रु बह रहे थे। मैं सोचता हूँ सुशान्त का भी यही हाल हो रहा होगा। मोक्षदा ने तो रो रो कर अपना हाल बेहाल कर लिया होगा। सुशान्त और मुझ पर मुकदमा चलाया गया। न्यायालय में जब मुझे पेश किया जाता तो भीड़ एकत्रित हो जाती। न्यायालय जिरह सुनने के लिये खचाखच भरा रहता था। प्रयोगशाला में मेरे प्रयोग से संबन्धित आवश्यक कागजात भी राख हो गये थे। घर पर रखें हुए रफ कागजातों पर ही मुझे भरोसा था। संकट की इस घड़ी में मैंने हार नहीं मानी तथा धैर्य नहीं खोया। उच्च न्यायालय ने फैसला मेरे विरूद्ध दिया। मैने सर्वोच्य न्यायालय में अपील दायर की। इसे स्वीकार कर लिया गया। मैंने फैसला कर लिया मैं अंतिम सांस तक इस मुकदमे को लडूंगा। कानून के बदलने तक। कानून तब तक नहीं बदलेगा। जब तक की विश्व समुदाय या विश्व के वैज्ञानिक मेरे प्रयोग को मान्यता नहीं देंगे। मुझे इसके लिये फिर से प्रयोग करना होगा। मुझे फिर से वह मशीन तैयार करनी होगी। जेल से छुटने के पश्चात मुझे यहीं करना होगा। लेकिन इस बार पूरी दुनिया को विश्वास में लेते हुए। मुझे जल्दी ही जमानत पर छोड़ दिया जायेगा। मुझे पूर्ण विश्वास है जिस दिन मैंने फिर से ‘मेकैनिकल ऐज्युकेटर’ निर्मित कर लिया, परीक्षा नाम की चीज समाप्त हो जायेगी। दुनिया में क्रंाति आ जायेगी। पूरी दुनिया बदल जायेगी। मेरा यह सपना अवश्य साकार होगा।

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