विज्ञान कथा

(02/Feb/2015)

बरमूडा का चौथा कोण

सुभाष चंद्र लखेड़ा

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में तथाकथित बरमूडा त्रिकोण यानी बरमूडा ट्राएंगल के मनगढ़ंत किस्से लाखों लोगों को रोमांचित करते रहे। लंबे अरसे तक उस ज़माने में लोग यह मानते रहे कि बरमूडा के समीप समुद्र का एक ऐसा त्रिकोणीय हिस्सा है जिसमें जहाज जब - तब डूबते रहते हैं। खैर, असली बात यह है कि उसके दादा जी के ज़माने में बरमूडा पहुंचने वाले सैलानियों को ऐसे कुछ डूबे जहाजों के अवशेषों की सैर भी कराई जाती थी। यूं जो बहुत सी बातें इस समुद्री त्रिकोण के बारे में फैलाई गई थी, आज उन पर कोई भी यकीन नहीं करता है क्योंकि उनका कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं था।

समुद्री यात्राओं का शौक तो रोहन के खून में है। रोहन से मेरी मित्रता तब हुई जब मैं एक सेमिनार के सिलसिले में सान होज़े, कैलिफ़ोर्निया गया था। बाद में वह न्यूयॉर्क आ गया और हमारी वह जान -पहचान मित्रता में तब्दील हो गई। खैर, बात समुद्री यात्राओं की हो रही है तो मैं यह जानता हूँ कि उसे यह शौक अपने दादा जी और पिता जी से विरासत में मिला हैं। दुनिया के अनेक द्वीपों की समुद्री यात्रा करने के बाद इस बार वह बरमूडा की यात्रा पर निकला है। उसके दादा जी उसे अक्सर बरमूडा के बारे में बताया करते थे। उसके दादा जी ने उस ज़माने में बरमूडा को लेकर एक लेख भी लिखा था। दरअसल, उसके दादा जी ने अपने बचपन में यह सुना था कि बरमूडा जाने वाले जलयानों और वायुयानों को किसी अज्ञात वजह से बरमूडा का समुद्री त्रिभुज अपने अंदर दफ़न कर देता है। इस सच्चाई का अनुभव करने के लिए वे सन् 2012 में खुद सपरिवार बरमूडा गए थे। दरअसल, बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में तथाकथित बरमूडा त्रिकोण यानी बरमूडा ट्राएंगल के मनगढ़ंत किस्से लाखों लोगों को रोमांचित करते रहे। लंबे अरसे तक उस ज़माने में लोग यह मानते रहे कि बरमूडा के समीप समुद्र का एक ऐसा त्रिकोणीय हिस्सा है जिसमें जहाज जब-तब डूबते रहते हैं। खैर, असली बात यह है कि उसके दादा जी के ज़माने में  बरमूडा पहुंचने वाले सैलानियों को ऐसे कुछ डूबे जहाजों के अवशेषों की सैर भी कराई जाती थी । यूं जो बहुत सी बातें इस समुद्री त्रिकोण के बारे में फैलाई गई थी, आज उन पर कोई भी यकीन नहीं करता है क्योंकि उनका कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं था।
अपने दादा जी से ठीक साठ वर्ष बाद यानी सन् 2072 में 56 वर्ष की आयु में रोहन को बरमूडा की समुद्री यात्रा करने का अवसर प्राप्त हुआ। जब वह बरमूडा की यात्रा पर निकला तो मैं सपत्नीक उसे और उसके परिवार को 16 अक्टूबर रविवार के दिन लगभग दोपहर 4  बजे न्यू जर्सी के पोर्ट लिबर्टी पर शुभ यात्रा कहने गया। उसने उस वक्त मुझे बताया कि उसके दादा जी 14 अक्टूबर सन् 2012 में जिस जलयान से गए थे उसका नाम ‘एक्सप्लोरेर ऑफ़ द सीज’ था और वह अब खुद जिस जलयान से यात्रा पर जा रहा है, उसका नाम ‘एक्सप्लोरेर - द बेबी ऑफ़ द सीज’ है। बेबी इसलिए क्योंकि यह जलयान अपनी सभी बिजली संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक ऊर्जा समुद्री जल से ग्रहण करता है। पिछले कुछ वर्षों से लगभग सभी समुद्री जलयानों में बिजली का उत्पादन ‘ओटैक’ यानी ‘ओसन थर्मल एनर्जी कन्वर्शन तकनीक’ से होने लगा था। यद्यपि ‘ओटैक’ तकनीक से बिजली बनाने के प्रयास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से किए जा रहे थे किन्तु इसका इस्तेमाल सन् 2030 से तब व्यापक रूप से होने लगा जब कुछ भारतीय वैज्ञानिकों ने इस तकनीक के लिए इस्तेमाल होने वाले संयंत्र में ऐसे परिवर्तन किये जिनसे इससे पैदा होने वाली बिजली काफी सस्ती पड़ने लगी। यूं ओटैक तकनीक से जुड़े सिद्धांत का ज्ञान तो वैज्ञानिकों को उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में हो गया था लेकिन एक लंबे समय तक इस तकनीक से बिजली का निर्बाध रूप से उत्पादन करने में वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
       बहरहाल, मैं खुद किसी प्रत्यक्षदर्शी से बरमूडा के बारे में सुनना चाहता था। एक बड़ा संयोग यह भी था कि उसके दादा जी भी उसकी तरह बरमूडा की समुद्री यात्रा पर रविवार के दिन निकले थे। फर्क यह था कि उस ज़माने में अमेरिका के न्यू जर्सी शहर के  पोर्ट लिबर्टी से रविवार दोपहर 4 बजे रवाना होने वाले जलयान वहां यानी बरमूडा में बुधवार सुबह पहुंचते थे जबकि अब रोहन वहां मंगलवार सुबह पहुंच जायेगा। ऐसा पिछले तीन दशकों में जलयानों के गति बढ़ाने के प्रयासों से संभव हो पाया। पोर्ट लिबर्टी के अहाते में प्रवेश करने से पहले रोहन ने मुझे अपने दादा जी के लेख ‘मेरी बरमूडा यात्रा’ की एक फोटोकॉपी दी। उनका यह लेख तब कैलिफ़ोर्निया से प्रकाशित होने वाली हिंदी की एक मासिक पत्रिका ‘यादें’ में प्रकाशित हुआ था। यह जानकारी उस फोटोकॉपी पर अंकित थी। उस शाम सभी जरूरी कार्यों को निपटाने के बाद मैंने उस लेख को पढ़ा। उसके कुछ जरूरी अंश मैं आप सभी की जानकारी के लिए यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ। अपने लेख में उसके दादा जी ने लिखा था, ‘सत्रह अक्टूबर बुधवार की सुबह  हम बरमूडा पहुंचे  और लगभग ढ़ाई दिन बरमूडा भ्रमण के बाद वहां से हमारे जहाज की  वापसी 19 अक्टूबर को शाम चार बजे हुई। ब्रिटिश उपनिवेश बरमूडा उत्तरी अटलांटिक महासागर में अमेरिका के पूर्व - दक्षिण तट की दिशा में अवस्थित है। अमेरिकी राज्य  नॉर्थ केरोलिना के भूभाग केप हेटेरस से लगभग 1030 किलोमीटर और फ्लोरिडा के मियामी शहर से 1770 किलोमीटर की दूरी पर एक सौ इकासी छोटे-बड़े द्वीपों से बने इस देश की लंबाई सिर्फ 21 मील है और यदि आप  इसके एक सिरे से दूसरे सिरे तक चक्कर लगाने में रूचि रखते हों तो आप इसके एक ही दिन में टैक्सी या स्कूटर पर कई चक्कर लगा सकते हैं और अपने मन को यह समझा सकते हैं कि आपने पूरा बरमूडा देख लिया है। बरमूडा का नक्शा 45 डिग्री के कोण पर रखे उस गिरगिट जैसा दिखता है जिसकी पूँछ ऊपर की तरफ थोड़ी गोलाई लिए मुड़ी हो और सिर वाला भाग कुछ - कुछ छितराया हुआ हो। अगर आपने बरमूडा का नक्शा देख लिया है तो आप यह देख चुके होंगे कि किंग्स वार्फ डॉकयार्ड इसकी  मुड़ी पूंछ के अंतिम सिरे पर है, हैमिल्टन इसके मध्य भाग में है और सैंट जॉर्ज शहर इसके सिर के शीर्ष पर है। बरमूडा में पेय जल का कोई भी ऐसा स्रोत जैसे नदी, झरना, कुआं,  चश्मा या मीठे पानी की झील नहीं है जिसके पानी को पीने और भोजन तैयार करने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सके। यहां के निवासी और व्यवसायी, सभी वर्षा जल संचयन   के द्वारा अपनी जरूरतों को पूरा करते हैं।
बरमूडा का कुल क्षेत्रफल 20ण्6 वर्ग मील है लेकिन यहां बनी हुई पक्की सड़कों की कुल लंबाई 280 मील है जिसमें सार्वजनिक सड़कों की लंबाई 130 मील है और शेष 150 मील निजी सड़कों की लंबाई है। सड़कों की चौड़ाई कम होने की वजह से यहां वाहनों को अधिकतम 35 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलाया जा सकता है। हैमिल्टन और सैंट जॉर्ज जैसी जगहों पर वाहन गति की अधिकतम सीमा 25 किलोमीटर प्रति घंटा है। बरमूडा में सैलानियों को कार चलाने की अनुमती नहीं है। इसलिए यहां किराए पर कारें उपलब्ध नहीं हैं। हाँ, 18 साल से ऊपर आयु के सैलानियों को  किराये पर 50 सीसी पॉवर वाले  स्कूटर आसानी से मिल जाते हैं।  अटलांटिक महासागर में बसा बरमूडा अब मुझे जीवन भर इसलिए याद आता रहेगा कि मैंने पहली बार अपने जीवन में एक ऐसा देश देखा है जिसकी कुल लंबाई 21 मील और अधिकतम चौड़ाई डेढ़ मील है; जहां समुद्र तल से जमीन की सर्वाधिक ऊंचाई 79 मीटर है; जहां प्रति व्यक्ति औसत आय बहुत अधिक है लेकिन महँगाई अमेरिका से तिगुनी है; जहां भूमि की कमी की वजह से एक परिवार को सिर्फ एक कार रखने की अनुमति है और  जहां के निवासी ब्रिटिश राजशाही के अधीन रहना चाहते हैं। दरअसल, इस द्वीप को आबाद करने का श्रेय तो ब्रिटेन को ही है भले ही इसकी खोज स्पेन के नाविकों ने की थी। बरमूडा भले ही ब्रिटिश राज के अधीन है और ब्रिटिश ताज ही यहां गवर्नर नियुक्त करता है, यहां का प्रधानमंत्री बरमूडा का ही नागरिक हो सकता है और यहां भी चुनाव प्रक्रिया द्वारा सरकारें तय होती हैं। भारत की तरह यहां भी आम चुनाव  पांच वर्षीय अवधि के लिए होते हैं। बरमूडा अपने लिए बिजली का उत्पादन खुद करता है लेकिन वहां कोयला, तेल आदि सभी तरह के ईंधन (लकड़ी के अलावा) और खाद्यान्न आयातित किये जाते हैं। भूमि की कमी के कारण कृषि कार्य संभव नहीं है। यहां केले और नींबू वर्गीय फल  और  कई तरह के फूल उगाये जाते हैं। बरमूडा को नौकरी पेशा करने वाले लोगों का देश कहना उपयुक्त होगा। जहां तक बरमूडा त्रिकोण संबंधी तथाकथित रहस्य का प्रश्न है, यह बरमूडा से  जुड़े अटलांटिक महासागर के उस हिस्से से ताल्लुक रखता है जिसके बारे में बीसवीं सदी के पांचवें दशक के अंतिम वर्ष के दौरान यह कहा जाने लगा था कि उस  क्षेत्र के जल और हवाई मार्ग में पहुंचने  वाले यान किन्हीं अबूझ  कारणों की वजह से लापता हो जाते हैं।  दरअसल, बरमूडा क्षेत्र में इस तरह से यानों के अचानक से रहस्यमय तरीके से गायब होने की खबर सर्वप्रथम ‘एसोसिएटेड प्रेस’ के हवाले से सितम्बर 16, 1950 में एडवर्ड वान विंकल जोन्स    द्वारा लिखे एक लेख से सामने आयी थी।  इसके दो साल बाद ‘फेट’ मैगज़ीन में जॉर्ज एक्स. सैंड का एक लेख ‘सी मिस्ट्री एट अवर बैक डुअर’ छपा जिसमें बरमूडा के समुद्री आकाश से 5 दिसंबर 1945 के दिन यू.एस. नेवी की प्रशिक्षण - फ्लाइट 19 के उन पांच बमवर्षक विमानों के लापता होने के अलावा ऐसे कई दूसरे वायुयानों और जलयानों के बारे में भी आंकड़े दिए गए थे जो इस क्षेत्र में रहस्यमय ढंग से गायब हुए थे। तत्पश्चात, वर्ष 1964 में न्यूयॉर्क से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘आर्गसी’ में विंसेंट हाएस  गाडिस ( 1913 -1997)नामक कथाकार ने ‘बरमूडा ट्राएंगल’  शीर्षक से एक आवरण कथा लिखी थी। इस किस्से को आगे पढ़ने  से पहले बेहतर होगा कि आप एक ऐसा नक्शा अपने सामने रख लें जिसमें आप एक साथ अमेरिका के फ़्लोरिडा राज्य के मियामी शहर,  बरमूडा द्वीप और कैरेबियन द्वीप पुएर्टाे रीको की राजधानी सेन हुआन को एक साथ देख सकें। अब आप इन तीन स्थानों पर तीन बिन्दु लगायें। अब इन तीन बिन्दुओं से एक त्रिभुज बनायें। अटलांटिक महासागर के जल के ऊपर बने इस काल्पनिक त्रिभुज को ही ‘बरमूडा त्रिभुज’ कहा जाता है और इस त्रिभुज का क्षेत्रफल लगभग 5,00,000 वर्ग  मील है।  बहरहाल, वर्ष 1965 में गाडिस  ने अपने इस लेख को विस्तार देते हुए ‘इनविजिबल हॉरिज़ंस’  शीर्षक से एक पुस्तक छपवाकर तथाकथित ‘बरमूडा ट्राइंगल’ का   एक ऐसे शैतानी त्रिभुज के रूप में वर्णन किया जिसके रहस्य को समझ पाना  इंसानों के लिए नामुमकिन होगा। इसके बाद तो इस विषय पर दुनिया भर में कई लेखकों ने अपनी ‘छपास’ की भूख मिटाई और किसी ने इसे पृथ्वी पर दूसरे ग्रह से आये प्राणियों की खुरापात बताया तो किसी ने इसे सागर के अन्दर मौजूद प्राणियों की करतूत बताया। लेखक कल्पना के घोड़े दौड़ाने लगे। किसी -किसी ने तो इस क्षेत्र में समुद्र की तलहटी में भारी मात्रा में मौजूद ‘गैस हाइड्रेट’ के विखंडन से यकायक विशाल मात्रा में मुक्त होने वाली मीथेन गैस को इन हादसों के लिए जिम्मेदार ठहराया। बरमूडा में आने वाले सैलानियों को तो ऐसे डूबे जहाजों के अन्दर जाने का मौका भी मिल सकता है जो प्रचलित किस्सों के अनुसार  इस जलीय त्रिभुज में अप्रत्याशित दुर्घटनाओं की वजह से डूबे थे।आखिर, क्या सचमुच अटलांटिक महासागर का यह तथाकथित त्रिभुज एक ऐसा अभिशप्त क्षेत्र है जहां ऐसी दुर्घटनाओं का होना लाजिमी है या फिर यह लेखकों द्वारा तिल का ताड़ बनाने का एक ऐसा उदाहरण है जिसका कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है ?    
शुक्र है कि दुनिया के लोगों ने बरमूडा की तरफ जाना जारी रखा और आज सारी दुनिया यह जानती है कि तथाकथित बरमूडा ट्राइंगल महज कुछ लोगों की कल्पना से उपजा शब्द है और हकीकत मैं ऐसे किसी जलीय त्रिभुज का अटलांटिक महासागर में कोई अस्तित्व नहीं है। अमेरिकी तट रक्षक विभाग ( कोस्ट गार्ड ) किसी ऐसे तथाकथित बरमूडा ट्राइंगल की पुष्टि नहीं करता है जिसकी वजह से अमेरिका के इस दक्षिण - पूर्वी समुद्री एरिया में जहाजों और इसके ऊपर से गुजरने वाले विमानों को कोई  अलग तरह का खतरा हो। इस विभाग के अनुसार अतीत में इस क्षेत्र में घटी ऐसी सभी दुर्घटनाओं का संबंध प्रातिक (भौतिक) कारणों अथवा मानवीय त्रुटियों से जुड़ा है। ऐसे कोई प्रमाण या संकेत नहीं मिले हैं जिनके आधार पर इन दुर्घटनाओं को किसी अनहोनी से संबंध नजर आता हो। दरअसल, बरमूडा ट्राएंगल की काल्पनिक अवधारणा को पुष्ट करने संबंधी पुस्तकें छपती रही और किस्सों में रूचि रखने वाले पाठक उन्हें पढ़ते भी रहे। ‘द  डेडली  ट्राएंगल ( गाडिस ),  द हूडू सी ,  (गोडविन  1973),  द डेविल्स ट्राएंगल ( विनेर 1977), द ट्वेलाइट जोन ( अमेरिकन टीवी शो ),  लिम्बो ऑफ़ द लॉस्ट 
(स्पेंसर 1969), और द ग्रेवयार्ड ऑफ़ द अटलांटिक (डेविड स्टिक) जैसी कृतियों के लेखक अटलांटिक महासागर के इस हिस्से को  रहस्यमय आवरण में लपेटने की कोशिश करते रहे और दुनिया के दूसरे देशों के कुछ लेखक भी इन कृतियों का संक्षिप्त सार अपनी- अपनी भाषा में अपने पाठकों तक पहुंचाते रहे। इतना ही नहीं, जब  जिसकी मर्जी आयी, वह इस खौफनाक त्रिभुज के क्षेत्रफल को अपनी सुविधानुसार घटाता - बढाता  रहा।  खैर, बरमूडा का यह त्रिभुज भले ही कल्पना की उपज है, इसे लेकर वृत्तचित्र बने और कुछ लोकप्रिय टीवी प्रोग्राम भी बनाये गए। यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ अमेरिका के जियोलाजिकल सर्वे विभाग के प्रतिष्ठित प्रोफ़ेसर बिल डिलन बरमूडा त्रिभुज की कहानी को एक ऐसी परी कथा मानते हैं जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और गैस हाइड्रेट के विशेषज्ञ के रूप में वे इस विचार को बेबुनियाद करार देते हैं कि इस क्षेत्र में मीथेन गैस के भारी रिसाव के कारण दुर्घटनाएं होती हैं। वर्ष 1975 में ‘द बरमूडा ट्राएंगल मिस्ट्री सोल्व्ड’ नाम से एक किताब सामने आयी जिसके लेखक लॉरेंस डेविड कुशे उन दिनों एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए थे। इस पुस्तक में लॉरेंस ने विशुद्ध वैज्ञानिक ढंग से इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि बरमूडा ट्राइंगल  का कोई अस्तित्व है। उनके अनुसार इस क्षेत्र में होने वाली दुर्घटनाओं को कुछ लेखकों ने अतिरंजित करके पेश किया है। कुछ दुर्घटनाएं तो हुई ही नहीं। संक्षेप में लिखा जाए तो लॉरेंस के अनुसार ‘बरमूडा ट्राइंगल की यह खिचड़ी कुछ लेखकों ने जान - बूझकर पकाई थी। इस क्षेत्र में भी किसी काल खंड के दौरान उतनी ही दुर्घटनाएं हुई हैं जितनी दुनिया के दूसरे समुद्री जगहों में होती रही हैं।’
खैर, बरमूडा जाने से पहले ही हम तय कर चुके थे कि हम सब हैमिल्टन और सैंट जॉर्ज जरूर जायेंगे। ऐसा इसलिए कि हैमिल्टन से पहले वर्ष 1815 तक बरमूडा की राजधानी सैंट जॉर्ज थी।  हैमिल्टन जाने के लिए हमने अपने डॉकयार्ड के सामने से यही कोई दिन के 01रू30 बजे के लगभग फेरी सेवा का इस्तेमाल किया। हम लगभग 20 मिनट में हैमिल्टन पहुंच गए। फेरी से उतरने के बाद ही हम लोग हैमिल्टन की जिस स्ट्रीट पर पहुंचे, उसे फ्रंट स्ट्रीट कहते हैं। अब हम यहां से किंग स्ट्रीट होते हुए हैप्पी वैली रोड पहुँच गए। कुछ ही दूर चले थे कि दायीं तरफ फोर्ट हैमिल्टन दिखने लगा। इस फोर्ट के अन्दर पहुंचने के लिए हमें एक लकड़ी के पुल से होकर गुजरना पड़ा। यह फोर्ट सन् 1870 में बनाया गया था। बरमूडा में कुल मिलाकर 90 फोर्ट हैं। किले के अन्दर मौजूद तोपें इस बात की गवाह हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में उसकी रॉयल नेवी और उसकी तोप शक्ति ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी होगी। दरअसल, बरमूडा में अपने तीन दिनों के भ्रमण के दौरान मैंने जितनी तोपें देखीं, उतनी इतने से एरिया में मैंने इससे पहले  कभी नहीं देखीं। वैसे भी जिस समय काल के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार हुआ था, उस समय काल के दौरान वायु सेना तो थी नहीं। दूसरे, बरमूडा पहुंचाई गयी इन तोपों को देखने से उस ज़माने की ब्रिटिश तोप शक्ति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। हमारा जहाज जिस डॉकयार्ड  पर खड़ा है, वहां से बाहर आते ही ये तोपें दिखाई देने लगती हैं। फोर्ट हैमिल्टन में मौजूद सुरंगों से गुजरते हुए आज भी दिल में कुछ घबराहट सी पैदा होनी लगती है। किले में  लगाई हुयी तोपों की नाल का मुंह इतना बड़ा है कि उसमें आदमी का पूरा सिर घुस जाता है। फोर्ट हैमिल्टन से निकल कर हम घूमते हुए चर्च स्ट्रीट पहुंचे जहां बरमूडा का सबसे बड़ा गिरिजाघर है। हम इस गिरिजाघर में काफी देर रहे और उस शान्ति को महसूस कर पाए जो धार्मिक स्थलों पर महसूस होती है। हैमिल्टन में  बरमूडा के सभी बड़े सरकारी भवन हैं। यहां बेहतरीन होटल और दूसरे व्यवसायिक प्रतिष्ठान हैं। हैमिल्टन दुनिया की सबसे कम जनसंख्या वाली राजधानी है। इस शहर की आबादी 14,000 से कम है। खैर, बरमूडा की कुल आबादी 65, 000 है तो उस सन्दर्भ में हम इसे वहां का एक प्रमुख और घनी आबादी वाला क्षेत्र कह सकते हैं। हैमिल्टन पोर्ट पर ष्टिपात करते हुए हमने जहाज पर वापस जाने का  फैसला लिया और इस बार हम फेरी से नहीं अपितु बस से उस जगह लौटे जहां हमारा  जहाज हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। देर रात जहाज के डेक से समुद्र को निहारा तो वह बहुत ही शांत दिख रहा था। उसे शांत देख मुझे मशहूर गजलकार जहीर कुरैशी की ये दो पंक्तियाँ बरबस याद आ गई - ‘आप जिसकी धीरता गंभीरता पर मुग्ध हैं, उस समंदर ने डुबाया है जहाजों को बहुत।’ 
कल रात सोते समय तो मैं यह सोच रहा था कि अगर मौसम अनुकूल रहा तो आज यानी 18 अक्टूबर के दिन  सुबह ‘ॉर्सशू बे बीच’ पर जाकर समुद्र स्नान करेंगे और उसके बाद वापस आकर दोपहर बाद फेरी से सैंट जॉर्ज जायेंगे और वहां उन सब प्रमुख स्थानों को देखने की कोशिश करेंगे जिनका बरमूडा के इतिहास में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। बालकनी में पहुंच कर देखा तो मौसम एकदम भ्रमण के अनुकूल नजर आया। सुबह का रूटीन पूरा करने के बाद हम पांच लोग जहाज से निकल कर उस बस स्टैण्ड की तरफ चले जहां से हमें ‘ॉर्सशू बे बीच’ के लिए बस मिलनी थी । यह बरमूडा का सर्वाधिक प्रसिद्ध बीच है। बीच से वापस आने के बाद हम दोपहर बाद सैंट जॉर्ज के लिए चल पड़े। बरमूडा के इस नगर में पहुंचने के लिए हमने किंग्स वार्फ डॉकयार्ड  से फेरी ली। शुरूआत में  न्यू लंदन कहे जाने वाले इस शहर की नींव वर्ष 1612 में पड़ी। सैंट जॉर्ज की सिर्फ बरमूडा के इतिहास में ही नहीं, अमेरिका के इतिहास में भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सैंट जॉर्ज के लोगों का कहना है कि पिछले 100 वर्षों में दुनिया की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है लेकिन अगर दुनिया में कोई ऐसा नगर या शहर है जो लगभग जस का तस बना हुआ है, तो वह सैंट जॉर्ज है। यहां के निवासी अपने गौरवशाली अतीत के उस आकर्षण से बंधे हुए हैं जिसकी कहानी अद्भुत, रोमांचक और बेमिसाल है। वर्ष 1609 में 2 जून के दिन लंदन की वर्जिनिया कंपनी का नौ जहाजों का एक बेड़ा इंग्लैंड के प्लायमाउथ बंदरगाह से जेम्सटाउन, वर्जिनिया (अमेरिका) के लिए रवाना हुआ। इस बेड़े के ध्वजपोत ‘द सी वेंचर’ को एडमिरल सर जॉर्ज सोमर्स, कमांड कर रहे थे। बहरहाल, एक भयंकर समुद्री तूफ़ान की वजह से उनका जहाज वर्जिनिया के बजाय बरमूडा के तट पर जा पहुंचा और वहां जल सतह के भीतर  मौजूद  चट्टानों से टकराने की वजह से क्षतिग्रस्त हो गया। खैर, जहाज का क्रू और दूसरे लोग  सही सलामत बच गए और वे इस द्वीप की जमीन पर 28 जुलाई, 1609 के दिन एक कुत्ते के साथ उतरने में कामयाब रहे। वे इस जहाज से जमीन के जिस हिस्से पर पहुंचे, उसे ही बाद में ‘सैंट जॉर्ज’ नाम दिया गया और वहीं से बरमूडा के बसाव का श्रीगणेश हुआ। इस जहाज में 150 लोग थे। सर सोमर्स ने अपने क्रू और अन्य दूसरे लोगों की मदद से अगले नौ महीनों के दौरान दो नए जहाज बनाये।  इस दौरान उनके दल के जिन सदस्यों की मृत्यु हुई, उन्हें बरमूडा में ही दफना दिया गया था। फिर वर्ष 1610 में 10 मई के दिन ‘डेलीवरांस  और पेशेंस’, नामक इन  दो जहाजों से वे नए साजोसामान के साथ वर्जिनिया (अमेरिका ) के लिए रवाना हुए। उन्होंने बरमूडा द्वीप पर ब्रिटिश अधिकार का दावा मजबूत करने के लिए अपने दो लोग पीछे छोड़ दिए थे। कहानी तो लंबी है किंतु संक्षेप में समय की कमी को देखते हुए इतना बताना ठीक रहेगा कि कुछ समय बाद जब सर सोमर्स वर्जिनिया से अपने जहाज पेशेंस के द्वारा बरमूडा लौटे तो वे बीमार हुए। फलस्वरूप, वे अपनी योजना के अनुसार फिर से वापस जेम्सटाउन नहीं जा पाए। कुछ ही दिनों बाद 9 नवंबर 1610 के दिन 56 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया। उनकी वसीयत के अनुसार उनका दिल बरमूडा में दफनाया गया और उनका शेष शरीर इंग्लैंड भेजा गया। तत्पश्चात, 11 जुलाई, 1612 में बुधवार के दिन यहां इंग्लैंड से प्लो नमक जहाज  से 50 ऐसे लोग पहुंचे जो इस नए द्वीप में बसने आये थे। इन लोगों को यह देखकर खुशी हुई कि वहां पहले से रह रहे तीन लोग स्वस्थ थे और उन्होंने ने वहां कृषि कार्य भी शुरू कर दिया था। इन लोगों के आगमन के बाद वर्ष 1612 में सैंट जॉर्ज की स्थापना हुई।
बहरहाल, फेरी से उतरने के बाद हम लोग सर्वप्रथम हम उस जगह पहुंचे जहां सर सोमर्स की प्रतिमा स्थापित की गयी है। इस प्रतिमा को वर्ष 1946 में बरमूडा में जन्मे प्रख्यात मूर्तिकार डेस्मंड फाउंटेन ने बनाया और इसका अनावरण वर्ष 1984 में राजकुमारी मार्गरेट ने बरमूडा उपनिवेश की 375 वीं वर्षगांठ समारोहों के अवसर पर किया था। दरअसल, 200 वर्षों तक बरमूडा की राजधानी रहने वाले सैंट जॉर्ज में हर तरफ सर सोमर्स से जुड़े ऐसे स्मृति चिह्न देखने में आते हैं। वहां से हम लोग ‘किंगश्स स्क्वायर’ होते हुए सैंट पीटर चर्च पहुंचे। इस चर्च की आधारशिला यूं तो वर्ष 1620 में रखी गयी थी लेकिन इस के स्वरुप में बीतते समय के साथ कई बदलाव आये और आज इसकी गिनती इंग्लैंड के बाहर सर्वाधिक लम्बे समय से निरंतर उपयोग में लाये जाने वाले चर्च के रूप में की जाती है।  सैंट पीटर चर्च से हम टहलते हुए ‘ड्यूक ऑफ़ यॉर्क स्ट्रीट’ से होते हुए सोमरश्स गार्डन पहुंचे। यह गार्डन थके हुए तन और मन को  विश्रांति देने के लिए एक सही स्थान है और यह उन्हीं सर जॉर्ज सोमर्स की यादगार का प्रतीक है जिनका उल्लेख जब भी बरमूडा पर चर्चा होगी, करना ही पड़ेगा। दरअसल, ऐसा कहा जाता है कि सर सोमर्स चाहते थे कि मृत्यु के बाद उनके शरीर को बरमूडा में ही दफनाया जाए लेकिन उनके भतीजे मैथ्यू सोमर्स ने उनकी अंतिम इच्छा का आंशिक रूप से सम्मान करते हुए उनके दिल को यहीं बरमूडा में दफ़ना दिया था और शेष शरीर को वापस इंग्लैंड भेज दिया था। वह जगह जहां सर सोमर्स का दिल दफ़नाया गया था, इस गार्डन के दक्षिण-पश्चिम भाग में है। वर्ष 1920 में इस स्थान पर सर सोमर्स की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए एक पाषाण स्तंभ बनाया गया और प्रिन्स ऑफ़ वेल्स ने इस गार्डन का  विधिवत उद्घाटन किया। वर्ष 1920 में किंग जॉर्ज पंचम के सबसे बड़े पुत्र प्रिंस एडवर्ड ‘प्रिन्स ऑफ़ वेल्स’ थे। बाद में इस बगीचे  के मध्य भाग में एक खूबसूरत फव्वारा बनाया गया। इस बगीचे में एक चंद्राकार( मून गेट ) द्वार भी है। बरमूडा में नवविवाहित जोड़ों का इस द्वार से गुजरना शुभ माना जाता है। फिर हम चले फोर्ट सैंट कैथरीन की तरफ जो सैंट जॉर्ज द्वीप के उत्तर-पूर्व शीर्ष पर है। बीते ज़माने में सैन्य कार्यों के लिए उपयोग में लाये जाने वाले इस फोर्ट को अब एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है। इस किले को वर्ष 1612 में सर्वप्रथम लकड़ी से बनाया गया। वर्ष 1614 में  इसको पत्थरों के किले में तब्दील कर दिया गया। ब्रिटिश सेना सैंट जॉर्ज आइलैंड को कितना महत्त्वपूर्ण मानती रही, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस द्वीप के चारों तरफ अनेक किले बनाकर इस भू-भाग को शत्रुओं के लिए अभेद्य बना दिया था। उल्लेखनीय है कि इन सभी किलों पर सामने समुद्र की तरफ गोला दागने के लिए विशालकाय तोपें लगाई गयी थीं जो आज भी अपनी मौजूदगी से दर्शकों को बीते समय का अहसास कराती हैं। ये सभी फोर्ट ऊंचे टीलों पर बनाए गए ताकि समुद्र की तरफ से आते हुए दुश्मन को देखने में आसानी हो और उस पर यहां लगाई गयी तोपों से आसानी से प्रहार किये जा सकें। बर्न्ट पॉइंट फोर्ट, फेरी आइलैंड फोर्ट, मार्टेल्लो टावर फोर्ट, फोर्ट जॉर्ज फोर्ट विलियम, फोर्ट सैंट कैथरीन, अलेक्जेंड्रा बैटरी फोर्ट,गेट्स फोर्ट, कन्निनग्हम फोर्ट, फोर्ट पोप्पल और फोर्ट सैंट डेविड’स बैटरी ने इस द्वीप को अतीत में सुरक्षा दी और वर्तमान में सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बना दिया है। जहां तक फोर्ट सैंट कैथरीन का सवाल है, इस फोर्ट का पांच बार पुनर्निर्माण किया गया। ऐसा अंतिम बार उन्नीसवीं सदी में तब किया गया जब पश्चिमी गोलार्द्ध में बरमूडा रॉयल नेवी के लिए एक मुख्य ठिकाना था। बाद में इसके समीप और पीछे की तरफ बने फोर्ट अल्बर्ट और फोर्ट विक्टोरिया ने इसकी सामरिक उपयोगिता को क्षीण कर दिया। यूं फोर्ट अल्बर्ट और फोर्ट विक्टोरिया का निर्माण मुख्य रूप से  बरमूडा के पश्चिमी छोर पर बने रॉयल नेवल  डॉकयार्ड की रक्षा के लिए किया गया था। फिलवक्त, वर्ष 2008 से इन दोनों किलों को सुरक्षा कारणों से दूर से ही देखा जा सकता है। खैर, फोर्ट सैंट कैथरीन की ऐतिहासिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए  यूनेस्को ने वर्ष 2000 में सैंट जॉर्ज और इसके किलों और कुछ इमारतों को ‘वर्ल्ड हेरिटेज साईट’ की विष्व सूची में शामिल कर दिया था। यदि आप फोर्ट सैंट कैथरीन के पास समुद्र की तरफ मुंह करके खड़े हों तो अपने दायें हाथ की तरफ दृष्टिपात कर आप  ‘गेट्स बे’ को देख सकते हैं। इसी तरह बाईं तरफ आपको ‘अकिलीज बे’ और ऐतिहासिक ‘टोबेको बे’  दिखती हैं। चौदह अगस्त 1775 की रात को बरमूडा के ऐसे लोगों ने जो उस दौरान चल रहे अमेरिका की आजादी के संघर्ष से सहानुभूति रखते थे, सैंट जॉर्ज के ब्रिटिश बारूद भण्डार से बहुत बड़ी मात्रा  में बारूद की चोरी कर  इसी ‘टोबेको बे’ में खड़े अमेरिकी जहाजों तक पहुंचाया था। बड़ा कठिन है उन सब बातों का सिलसिलेवार ब्यौरा देना जो पिछले चार सौ वर्षों के दौरान अटलांटिक  महासागर के निरंतर थपेड़े खाते हुए इस द्वीप पर घटित हुई हैं। 
‘सार-सार को गहि’ का पालन करते हुए हम लोग फिर टोबेको बे बीच के शीतल जल में टहलने के लिए इस फोर्ट से नीचे उतरे। यहां कुछ चुनिंदा सैलानी लहरों के साथ अठखेलियां कर रहे थे और मुंह में ष्वास नली तथा आँखों पर विशेष तरह के चश्मे चढ़ाकर  जल के भीतर तैरती मछलियों को देखने के लिए जब तब लंबे समय के लिए गोते लगा रहे थे।
सुबह सो कर उठे तो मन में सबसे पहले यह बात आयी कि आज 19 अक्टूबर है। बरमूडा में हमारा यह अंतिम दिन है और 4 बजे हमें वापस लौटना है। तय हुआ कि अब हम अपने डॉकयार्ड के पास चलते हैं और उन ऐतिहासिक स्थानों को देखते हैं जो इसके समीप हैं। अमेरिका की आजादी की लड़ाई में पराजित होने के बाद ब्रिटेन अमेरिका के पूर्वी तटों पर मौजूद अपने सभी बंदरगाह खो चुका था। फलस्वरूप,अटलांटिक महासागर में अपनी मौजूदगी बनाये रखने के लिए उन्होंने वर्ष 1809 में इस रॉयल नेवल डॉकयार्ड का निर्माण कार्य शुरू किया था। इस डॉकयार्ड को बनाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने इंग्लैंड से भारी संख्या में लाये कैदियों और इस द्वीप पर मौजूद गुलामों का इस्तेमाल किया। इसके निर्माण के दौरान इस द्वीप पर फैले ‘पीत ज्वर’ के कारण यहां कार्यरत सैकड़ों श्रमिक काल के गाल में समा गए लेकिन हम जैसे सैलानियों के लिए यह डॉकयार्ड बना गए। ब्रिटेन इसका इस्तेमाल वर्ष 1812 से लेकर द्वितीय विष्व युद्ध तक एक सैनिक बंदरगाह के रूप में करता रहा। लेकिन धीरे - धीरे ब्रिटेन यह समझने लगा था कि इस डॉकयार्ड का अब उसके लिए कोई विशेष सैनिक महत्त्व नहीं रह गया है। इसकी एक प्रमुख वजह अमेरिका और ब्रिटेन के बीच बढ़ती हुई मित्रता भी रही। वर्ष 1951 तक ब्रिटेन ने यहां से अपना बहुत सा सैन्य साजो-सामान समेट लिया था। ब्रिटिश और नाटो सैन्य बलों को सहायता पहुंचाने के लिए कुछ सीमित सुविधाएं बनी रहीं। वर्ष 1995 से इस डॉकयार्ड को सैन्य कार्यों के लिए पूर्णतया बंद कर दिया गया। तत्पश्चात, धीरे - धीरे इस डॉक यार्ड पर सैलानियों द्वारा इस्तेमाल किये आने वाले जहाज आने लगे। वर्ष 2009 में किंग्स व्हार्फ़ के बाजू में ‘हेरिटेज व्हार्फ़’ नामक एक और घाट बनाया गया। फलस्वरूप, अब यहां दो बड़े ‘क्रूज शिप’ साथ-साथ लंगर डाल सकते हैं। तत्पश्चात, हम इसके समीप मौजूद ‘स्नोर्केल पार्क’ में गए । इस पार्क के अन्दर प्रवेश करने के लिए वहां बैठी एक प्रौढ़ा महिला को लोग 5 डॉलर का नोट थमाते जा रहे थे, हमने भी वही किया। हम कुछ देर बाद उस जगह पहुंचे जिसे सनोर्केल पार्क कहा जाता है। यशोदा और नवोदित को स्नोर्केलिंग का बहुत शौक है, वे इस बीच पर उस जगह तक गए जहां वे जल के अन्दर तैरती रंग-बिरंगी मछलियों को देख सकते थे। मैं और पत्नी एक दूसरी जगह पर समुद्री जल में स्नान करने लगे। हरिबोधिनी आरामकुर्सी पर धूप सेकती रही और बीच-बीच में हमारी तस्वीरें खींचती रही। न जाने क्यों, यूं तो मुझे बीच पर जाने में कभी कोई विशेष रूचि रही है किन्तु एक बार यदि मैं लहरों के साथ खेलने लगा तो फिर मुझे जल्दी से बाहर आना पसंद नहीं। बाद में यशोदा ने बताया कि उन दोनों ने वहां बहुत ही खूबसूरत मछलियां देखीं। जब यहां से बाहर आये तो सोचा कि नेशनल म्यूजियम, बरमूडा में समय गुजारा जाए। हरिबोधिनी का कहना था कि  ‘डॉलफिन क्वेस्ट’ में जाकर शेष समय डॉल्फिनों के साथ गुजरा जाए और अगर हम चाहें तो हम वहां डॉल्फिनों के साथ तैर भी सकते हैं। लेकिन मेरा विचार था कि डॉल्फिनों को तो हम अपनी ‘सान डिएगो’ यात्रा के दौरान ‘सी वर्ल्ड’ में काफी करीब से देख चुके हैं, यहां तक की उनकी कलाबाजियों का आनंद भी उठा चुके हैं और उन्हें हाथों से भी सहला चुके हैं; क्यों न हम इस काम्प्लेक्स में मौजूद आर्ट्स सेंटर और क्राफ्ट मार्केट्स में जाकर स्थानीय कलाकारों के हस्तकौशल को देखें। उधर गए और अभी कुछ ढंग से देख पाते कि  हरिबोधिनी बोली, ‘पापा, तीन बजने वाले हैं, अब हमें जहाज की तरफ चलना चाहिए।’ हम सभी भारी मन से जहाज की तरफ लौट रहे थे क्योंकि इस काम्प्लेक्स में अभी ऐसा बहुत कुछ था जिसे देख लेते तो दिल को और अधिक खुशी होती। जहाज में घुसते समय मुझे अनायास डॉ. रमा द्विवेदी की ये पंक्तियाँ याद आ गयीं-‘ख्वाहिशों का सिलसिला भी क्या अजब होता है यार, ये पनपते हैं वहीं कुछ भी न सूझे जहां आर-पार।’ जहाज पर पहुंचकर हम सीधे डेक 11 पर पहुंचे क्योंकि भूख लगी थी और समय कुछ अधिक हो चुका था। आज वहां भीड़ थी क्योंकि अधिकांश सैलानी हमारी तरह इस दौरान बरमूडा की जमीं से जहाज पर वापस आ रहे थे। ठीक वैसा ही माहौल जैसा उस दिन था जब हम पोर्ट ऑफ़ लिबर्टी से यहां के लिए रवाना हो रहे थे। फ़र्क इतना था कि उस दिन हमारे दिलोदिमाग में बरमूडा को देखने की चाह थी, उस बरमूडा को जिसके तथाकथित त्रिकोण को ‘शैतानी त्रिकोण’ कहकर एक नहीं अनेक लेखकों ने अपनी छपास की भूख मिटाई; उस बरमूडा को जिसने विगत 400 वर्षों तक ब्रिटिश नेवी को अटलांटिक महासागर के इस क्षेत्र में एक सुरक्षित डॉकयार्ड मुहैय्या किया; उस बरमूडा को जिसके लिए मार्क मार्क ट्वेन ने कहा था, ‘यदि तुम स्वर्ग जाना चाहते हो तो जाओ, मैं तो बरमूडा जाऊंगा।’ ; और उस बरमूडा द्वीप समूह को जिसे सर्वप्रथम वर्ष 1505 में स्पेनिश समुद्री कप्तान जुअन डे बेरमुदेज़ ने अपनी हिस्पनिओला से स्पेन वापसी की समुद्री यात्रा के दौरान खोजा था। दरअसल, उन्हीं के नाम से इस द्वीप समूह को बरमूडा नाम दिया गया। ऐसा कहा जाता है कि इस द्वीप समूह पर अपनी दूसरी समुद्री यात्रा के दौरान बेरमुदेज़ ने यहां दर्जन से ऊपर जंगली सुअर छोड़े थे ताकि यदि कभी कोई जहाज किसी वजह से इस द्वीप में आ फंसे तो उसमें मौजूद लोग अपने खाने का इंतजाम कर सकें। लगभग एक सदी बाद जब एक भयंकर तूफ़ान की वजह से यहां सर जॉर्ज सोमेर्स और उनके कार्मिकों को उतरना पड़ा तो तब तक इस द्वीप पर इन सुअरों के संख्या में भारी इज़ाफा हो चुका था और इन सुअरों का मांस ही उनका प्रमुख आहार रहा।’ बहरहाल, रोहन के दादा जी के इस लेख से मुझे यह जानने में मदद मिली कि आज से साठ वर्ष पहले का बरमूडा कैसा था। अब मुझे रोहन की वापसी का इन्तजार था ताकि वह बरमूडा से जुड़ी उन बातों को बताए जो इधर इंटरनेट पर पिछले कुछ वर्षों से निरंतर छप रही हैं और जिन्हे पढ़कर ऐसा लगता है कि बरमूडा के अस्तित्व पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न लग चुका है। इक्कीसवीं शताब्दी के शुरूआती वर्षों में कुछ मौसम विज्ञानियों ने यह अनुमान लगाया था कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वर्तमान सदी के अंत तक बरमूडा द्वीप समूह के कुछ  द्वीप समुद्री  जल में समा जाएंगे। परेशानी की बात यह थी कि ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर जो कदम उठाये जाने थे, वैसा किसी भी देश ने नहीं किया और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से सागरों के जल स्तरों में अप्रत्याशित तेजी से वृद्धि होती जा रही थी। फलस्वरूप, दुनिया के कई देशों में सागरों की समीप वाली उनकी भूमि के हिस्से पानी में डूबते जा रहे थे। बरमूडा भी इन देशों में शामिल था। 
आखिर, 23 अक्टूबर, 2072 के दिन रोहन की वापसी हुई और वह पोर्ट लिबर्टी से सीधे हमारे निवास स्थान लीडिया ड्राइव, गुटैनबर्ग आया। जरूरी कार्यों से निवृत होने के बाद रोहन ने हमें जो कुछ बताया, उसे सुनकर हमें अपनी यानी मनुष्यों की नासमझी पर बहुत दुःख हुआ। रोहन ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणामों की वजह से बरमूडा का एयरपोर्ट कुछ वर्ष पहले अटलांटिक महासागर के जल में डूब चुका है। सबसे अधिक दुःख रोहन को इस बात का था कि आयातित खाद्य सामग्री के महंगा होने से बरमूडा से लोग पलायन कर रहे थे। उसे निजी तौर पर इस बात का दुःख था कि वह उस हैमिल्टन शहर को नहीं देख पाया जिसकी सड़कों पर कभी उसके दादा जी ने अपने परिवार के कुछ सदस्यों  के साथ  चहलकदमी की थी। अटलांटिक महासागर के जल स्तर में होने वाली वृद्धि ने उसे भी अपने में समेट लिया था। रोहन की बातें सुनकर मुझे लगा कि भले ही तथाकथित बरमूडा त्रिकोण की कहानी लेखकों ने कभी कल्पना के आधार पर गढ़ी थी लेकिन मानव पिछले दो सौ वर्षों के दौरान जिस प्रकार से अनाप-शनाप ढंग से ग्रीन हाउस गैसों से अपने वायुमंडल को प्रदूषित करता रहा हैं,उसकी वजह से प्रति अब जो कहानी लिख रही है, वह कम भयावह नहीं है। रोहन ने यह भी बताया कि कभी एक सौ इकासी छोटे-बड़े द्वीपों से बने बरमूडा के पास अब सिर्फ इकासी द्वीप बचे हैं। हम सब जानते हैं क़ि बरमूडा का यह चौथा कोण इंसान ने खुद बनाया है। 


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