कॅरियर

(16/Jul/2016)

कॅरियर

खगोल विज्ञान

संजय गोस्वामी

विज्ञान के क्षेत्र में जनसामान्य की भागीदारी बढ़ाने और वैज्ञानिक शिक्षा में सुधार द्वारा अधिक कुशल श्रमशक्ति के विकास में मदद मिलती है। खगोल विज्ञान वैज्ञानिक शोध में वैचारिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करता है। इस ज्ञान को मौसम, कम्प्यूटर विज्ञान एवं संचार व्यवस्था जैसे प्रायोगिक विज्ञान के क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है।
खगोल विज्ञान वैज्ञानिक शोध में वैचारिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करता है। इससे अर्जित ज्ञान को मौसम विज्ञान, कम्प्यूटर विज्ञान, एवं संचार व्यवस्था जैसे प्रायोगिक विज्ञान के क्षेत्रों में आसानी से लागू किया जा सकता है। यह करने हेतु जिन उपकरणों की हमें आवश्यकता है वे महंगी भी नहीं है। यदि हम दूरसंवेदी डेटा से तुलना करें तो खगोल विज्ञान संबंधी डाटाबेस सस्ती भी हैं और सहज रूप से उपलब्ध भी हैं। तथापि आंकड़ों की प्रसंस्करण तकनीकें (मसलन, इमेज प्रोसेसिंग) दोनों ही मामलों में एक जैसी है। इनमें दूरबीन, स्पेक्ट्रोस्कोप इत्यादि बनाने के प्रशिक्षण से लेकर मौसम, चंद्र एवं सूर्यग्रहण इत्यादि जैसे खगोलीय अवधारणाओं की व्याख्या की जाती है। उच्च क्षमता वाली दूरबीनों की एक प्रणाली है जिससे गामा-किरणों की जाँच की जाती है। उदाहरण स्वरूप इस क्षेत्र के कुछ किसानों ने भी पर्यटकों के लिए अपने बागानों में शौकिया खगोलविदों के लिये छोटी दूरबीनों की स्थापना की है। खगोल विज्ञान का विकास और प्रसार औद्योगिक और वैज्ञानिक विकास की भी शुरुआत करता है खगोल विज्ञान संस्था द्वारा विज्ञान क्लब चलाना, शैक्षणिक सामग्री का वितरण एवं खगोल विज्ञान तथा भौतिकी के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति का संयोजन करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किये जाते हैं। खगोल विज्ञान को विकास के लिए उत्प्रेरक बनाने में सबसे महत्वपूर्ण है जनसामान्य में विज्ञान के प्रति रुचि का विकास एवं उसमें लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहन देना। विश्व की बहुत सी संस्कृतियों में खगोल विज्ञान का एक लंबा स्थानीय इतिहास रहा है जिससे हमें लोगों के बीच ब्रह्मांड की आधुनिक समझ को पहुँचाने का रास्ता और भी सुगम हो जाता है। लोग खगोल विज्ञान को गोपनीय विज्ञान मानते हैं। खगोल विज्ञान में निवेश न सिर्फ हमें बड़ा आर्थिक लाभ पहुँचा सकता है बल्कि इसके बहुत से सामाजिक लाभ भी संभव हैं। 2009 को अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष घोषित किया गया था। ठीक चार सौ साल पूर्व प्रसिद्ध खगोलशास्त्री गैलिलियो गैलीली ने दूरबीन द्वारा अपनी जिज्ञासु आंखों से अंतरिक्ष की टोह ली थी। खगोल विज्ञान द्वारा शिक्षकों एवं छात्रों को अभ्यास पुस्तिकाओं, पोस्टरों खेल-सामग्री एवं कार्टून आदि का वितरण कर एवं विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन कर हम लोगों के बीच और जागरूकता पैदा कर सकते हैं।
खगोल-विज्ञान: खगोल-विज्ञान वह विज्ञान है, जो पृथ्वी के वातावरण से परे अंतरिक्ष से संबंधित है। यह ब्रह्मांड में उपस्थित खगोलीय पिंडों की गति, प्रकृति और संघटन का षास्त्र है। साथ ही इनके इतिहास और संभावित विकास हेतु प्रतिपादित नियमों का अध्ययन भी है। यह एस्ट्रोलॉजी या ज्योतिष विज्ञान जिसमें सूर्य, चंद्र और विभिन्न ग्रहों द्वारा व्यक्ति के चरित्र, व्यक्तित्व एवं भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है, से पूरी तरह से अलग षास्त्र है। अत्याधुनिक तकनीक एवं गैजेट्स के प्रयोग ने हालांकि खगोल-विज्ञान को एक विषिष्ट विधा बना दिया है, परंतु वास्तव में यह बहुत ही पुरानी विधा है। प्राचीन काल से ही मानव ग्रहों एवं अंतरिक्ष पिंडों का अध्ययन करता रहा है, जिनमें आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, गैलीलिया और आइजक न्यूटन जैसे महान गणितज्ञों एवं खगोलषास्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान है। खगोल-विज्ञान में अंतरिक्ष पिडांे के बारे में जानकारी संग्रह करने के बाद उपलब्ध आंकड़ों से तुलना कर निष्कर्ष निकाला जाता है तथा पुराने सिद्धांतो को संषोधित कर नए नियम प्रतिपादित किए जाते हैं। 
आसमान में लाखों जगमगाते एवं टिमटिमाते तारांें को निहारना दिमाग को सुकून से भर देता है। इन्हें देखने पर मन मंे यही आता है कि अगली रात में पुनः आने का वायदा कर जगमगाते हुए ये सितारे आखिर कहाँ से आते हैं और कहाँ गायब हो जाते हैं? हालांकि, इसी तरह के कई अन्य सवालों जैसे उल्कावृष्टि, ग्रहों की गति एवं इन पर जीवन जैसे रहस्यों से ओत-प्रोत बातें सोचकर व्यक्ति खामोष रहा जाता है। खगोल विज्ञान वह है, जो इन सभी रहस्यों, सवालों एवं गुत्थियों को सुलझाता है। अगर आप ब्रह्मांड के रहस्यों से दो-चार होकर अंतरिक्ष को छूना चाहते हैं तो यह कॅरियर आपके लिए बेहतर है। प्रतिभावान एस्ट्रोनॉट के कारण आज यह करियर युवाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। 
खगोल-विज्ञान के प्रकार: खगोल-विज्ञान में वैज्ञानिक तरीकों से तारे, ग्रह, धूमकेतु आदि के बारे में अध्ययन किया जाता है। साथ ही पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर किस तरह की गतिविधियां हो रही है, यह भी जानने की कोषिष की जाती है। इसकी कई ब्रांचेज है इससे खगोल-विज्ञान में एम एससी कोर्स कर सकते हैं।
एस्ट्रोकेमिस्ट्री: इसमें केमिकल कॉम्पोजिषन के बारे में अध्ययन किया जाता है। साथ ही विषेषज्ञ स्पेस में पाए जाने वाले रासायनिक तत्व के बारे में गहन अध्ययन कर जानकारियाँ एकत्र करते है। खगोल-विज्ञान में उड़ान, वायुगतिकी के सिद्धांत, विमान संरचना, प्रणोदन, हवाई जहाज, इलेक्ट्रॉनिक्स, मैट्रोलोजी, साथ ही उड़ान योग्यता नियमों और एयर ट्रैफिक कंट्रोल जैसे विषयों का अध्ययन करना आवश्यक है।
एस्ट्रोमैटेरोलॉजी: खगोल-विज्ञान के इस हिस्से में खगोलीय चीजों की स्थिति और गति के बारे में जानकारी जुटाई जाती है। साथ ही, यह भी जानने की कोषिष की जाती है कि खगोलीय चीजों का पृथ्वी के वायुमंडल पर किस तरह का प्रभाव पड़ता है। यदि आप वायुमंडल पर पड़ने वाले खगोलीय प्रभाव को ठीक से समझ गये और इस विद्या का ठीक से समझ गये और इस विद्या का डीप अध्ययन कर लिया तो आपकी डिमांड का ग्राफ बढ़ जाएगा। 
एस्ट्रोफिजिक्स: इसके अंतर्गत खगोलीय चीजों की फिजिकल प्रॉपटी के बारे मंे अध्ययन किया जाता है। खगोलीय फिजिकल प्रॉपर्टी को समझना इतना आसान नहीं होता, जितना लोग समझते हैं। इसे समझने में अध्ययन कर रहे स्टूडेंटस को सालों गुजर जाते हैं। 
एस्ट्रोजिओलॉजी: इसके तहत ग्रहों की संरचना और कॉम्पोजिषन के बारे स्टडी की जाती है। इस क्षेत्र के विषेषज्ञ आप तभी बन सकेंगे जब ग्रहों की तह में जाकर गहन अध्ययन करेंगे। एकाग्रचित होकर की गयी सिस्टोमेटिक पढ़ाई ही ग्रहों के फार्मूलों के करीब ले जाएगी। इसे समझने के लिए सोलर सिस्टम, प्लेनेट, स्टार, सेटेलाइट आदि का डीप अध्ययन जरूरी है। 
एस्ट्रोबायोलॉजी: पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर भी जीवन है? इस बात की पड़ताल एस्ट्रोबायोलॉजी के अंतर्गत किया जाता है। एस्ट्रोबायोलॉजी के जानकार ही वायुमंडल के बाहर जीवन होने के रहस्य से पर्दा उठा सकते हैं, इसके पीछे छुपी होती है। 
षैक्षणिक योग्यता- बारहवीं की परीक्षा भौतिक विज्ञान, गणित और रसायन विज्ञान से 60 प्रतिशत अंकों से पास करने के पश्चात आप इस कोर्स के लिए आवेदन कर सकते हैं। यदि आप भी अंतरिक्ष का रहस्यमय और रोमांचक दुनिया मे कदम रखना चाहते हैं, तो खगोल-विज्ञान का कोर्स कर सकते हैं। फिजिक्स या मैथमेटिक्स से स्नातक पास स्टूडेंट्स थ्यारेटिकल खगोल - विज्ञान के कोर्स में एंट्री ले सकते है। इंस्ट्रमेंटेषन/एक्सपेरिमेंटल में प्रवेष के लिए बीई (बैचलर ऑफ इलेक्ट्रॉनिक/ इलेक्ट्रिकल/इलक्ट्रिकल कम्युनिकेषन) की डिग्री जरूरी है। यदि आप पीएचडी कोर्स (फिजिक्स, थ्योरेटिकल वा ऑब्जर्वेषनल खगोल-विज्ञान, एटमॉस्फेरिक ऐंड स्पेस साइंस आदि) में प्रवेष लेना चाहते है तो ज्वाइंट एंटेंªस स्क्रीनिंग टेस्ट (जेईएसटी) से गुजरना होगा। इस एग्जाम में बैठने के लिए फिजिक्स में मास्टर डिग्री या फिर एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में 4 साल का इंजीनियरिंग ;ठम्ध्ठजमबीद्ध बैचलर डिग्री जरूरी है या फिर भारतीय वैमानिकी सोसाइटी द्वारा आयोजित परीक्षा को पूरा कर सकते हैं। एयरोस्पेस इंजीनियर को नए विमान डिजाइन और अंतरिक्ष यान, हेतु अंतरिक्ष में रॉकेटों भेजने और मिसाइलों के रख-रखाव पर भी ध्यान देना पड़ता है यह एस्ट्रोनॉटिकल इंजीनियरिंग से संबंधित क्षेत्र है एस्ट्रोनॉटिकल इंजीनियरिंग, वैमानिकी और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की ही शाखाएं हैं।
सैलरी: जूनियर रिसर्चर को 15 हजार एवं सीनियर रिसर्च को 25 हजार रूपये मिलते हैं। हॉस्टल में रहने-खाने, चिकित्सा तथा ट्रैवल की सुविधा संस्थान द्वारा दी जाती है। षोध पूरा करने के पष्चात विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों में वैज्ञानिक एवं एस्ट्रोनामर या एस्ट्रोनाट के पद पर उच्च वेतनामान के साथ अन्य उत्कृष्ट सुविधाएं भी मिलती है। अच्छी नौकरी पाने के लिए आपको अपनी डिग्री को पूरा करने की आवश्यकता होगी। स्नातक होने के बाद, आप एम.टेक. कर सकते है या खगोल-विज्ञान में पीएच.डी कर सकते हैं। अनुसंधान संगठनों, खगोलीय लेबोरेटरी में प्रति माह करीब 50ए000-70ए000ध्- रुपये अर्जित करेंगे अनुभव के बाद, आप आसानी से एक महीने में 1ए50ए000 .3ए00ए000 रुपये बना सकते है। इसके अलावा आपको सरकारी कर्मचारियों के लिए सभी आरक्षित अतिरिक्त लाभ मिलता है। यदि रिसर्च के क्षेत्र मे कुछ वर्षों का अनुभव हासिल कर लें, तो टीओईएफएल परीक्षा स्कोर प्रस्तुत करने पर अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में अध्ययन कर अमेरिका की नासा (नेषनल एरोनॉटिक्स स्पेस एडमिनिस्ट्रेषन) में वैज्ञानिक बनने का अवसर प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर विभिन्न देषों में आयोजित सेमिनार एवं गोष्ठियों में हिस्सा लेने का भी अवसर प्राप्त होता है। 

goswamisanjay80@yahoo.in