तकनीकी

(16/Mar/2019)

जीन एडिटिंग : जन्म से पहले बीमारी का उपचार 

प्रमोद भार्गव
 
 
 
प्रत्येक नूतन प्राणी पुरातन का नवीनतम संस्करण होता है। इसका अपना नया रंग-रूप और मौलिक विलक्षणताएं होती हैं। बावजूद इनमें कई मनुष्य वंशानुगत बीमारियां लेकर पैदा होते हैं। ऐसी बीमारियों को कोशिका के स्तर पर ही दूर करने के चमत्कार का नाम है, जीन एडिटिंग, यानी, वंशानुगत संशोधन करके पैदा किए गए बच्चे ! चीनी वैज्ञानिक एवं प्राध्यापक हे जियानकुई ने जीन यानी डीएनए कुंडली में बदलाव करके जुड़वां बालिकाओं के जन्मने का दावा किया है। चीन के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्व विद्यालय में प्रोफेसर जियानकुई ने ये बच्चियां नवंबर 2018 के अंतिम सप्ताह में पैदा की हैं। 
वंशाणु परिवर्धन की यह तकनीक ‘क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिनड्रोमिक रिपीट्स’ (सीआरआईएसपीआर) कहलाती है। इस तकनीक के माध्यम से एक जीनोम से आनुवंशिक तत्व निकालकर उसे दूसरे जीनोम में डाला जाता है। डीएनए में यह परिवर्धन कोशिका के स्तर पर ही कर लिया जाता है। इस बदलाव की विशेषता यह है कि यदि संतान के माता-पिता में कोई बीमारी है तो वह इस परिवर्तन से दूर हो जाती है। अपने प्रयोग को इस दृष्टि से सिद्ध करने के लिए जियानकुई ने दावा किया है कि उन्होंने एचआईवी (एड्स) संक्रमित पिता की जीन कुंडली में बदलाव करके ये बच्चियां पैदा की हैं। इस प्रयोग के लिए उनके पास स्वेच्छा से आठ दंपति उपस्थित थे। इनमें पिता तो एड्स पीडि़त थे, किंतु माताएं इस सक्रमित रोग से मुक्त थीं। इस तरह से संतान पैदा करने का उद्देश्य एचआईवी विषाणु से नई संतान को इस वंशानुगत रोग से छुटकारा दिलाना है। इस प्रयोग में जियानकुई कितने सफल हुए हैं, यह तो भविष्य में ज्ञात होगा, क्योंकि प्रयोग फिलहाल शैशव-अवस्था में है। इसीलिए प्रयोग के सामने आते ही दुनियाभर में विवाद भी खड़ा हो गया है।
चीन इससे पहले जीन संशोधन के जरिए चूहे पैदा करने और क्लोन पद्धति से दो बंदरों के निर्माण का दावा भी कर चुका है। इस नाते मानना होगा कि वह कृत्रिम-मानव निर्माण की दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है। कोशिका से एड्स का विषाणु अलग करने के लिए जीन संशोधन के इस प्रयोग में विशिष्ठ तकनीक क्रिस्पर-कैश-9 अपनाई गई है। इस तकनीक को हम आणविक या अणु-कैंची भी कह सकते हैं। डीएनए में प्रवाहित विषाणु या जीवाणु को इसी कैंची से काटकर पृथक किया गया। यह तकनीक कैश-9 नामक एंजाइम के प्रयोग से काम करती है। यह डीएनए के किनारे पर जमा रहता है। इस प्रक्रिया को पूरी करने के लिए आरएनए अणु की भूमिका दिशा-निदेशक के रूप में रहती है। जीन में इस तरह से किए बदलाव से इच्छा के अनुसार बच्चे पैदा करना संभव है। इसीलिए इन्हें ‘डिजाइनर बच्चे’ कहा गया है। इस प्रयोग की सफलता से यह उम्मीद जगी है कि वैज्ञानिक निकट भविष्य में भ्रूण में इतने परिवर्तन करने मंं सक्षम हो जाएंगे कि लाइलाज बीमारियां बच्चे के जन्म से पहले ही समाप्त हो जाएंगी। साथ ही भ्रूण के स्तर पर ही बच्चों में जीन के मार्फत अतिरिक्त बुद्धि डालना भी मुमकिन हो जाएगा। लेकिन ये प्रयोग परिणाम के रूप में कितने सफल रह पाते हैं, यह इन बच्चियों के युवा होने पर ही पता चलेगा।
जीन एडिटिंग को समझने से पहले मानव-जीनोम को समझना होगा। इनमें जीवन के रहस्य छिपे हुए हैं। इसीलिए इसे जीन कुंडली भी कहा जाता है। मानव-जीनोम तीन अरब रासायनिक रेखाओं का तंतु है। अमेरिका के क्रेग वेंटर एवं फ्रांसिस कोलिंस ने मानव-जीनोम की संरचना को वर्ष 2000 में ही पढ़ लिया था। इसमें डीएनए (डिऑक्सीरिबोन्यूक्लिक एसिड) जो जीवन की आधारभूत संजीवनी है, असंख्य अणुओं की प्रक्रिया को समझा और दुनिया के वैज्ञानिक समूहों के सामने डीएनए की रहस्यमयी सरंचना का प्रगटीकरण किया। इसके पहले यह अवधारणा थी कि मनुष्य की जटिलतम जीवन-सरंचना में एक लाख से अधिक जीन या डीएनए के तंतु गतिशील हैं। यही शरीर की प्रत्येक क्रिया व प्रक्रिया के लिए दिमाग में संकेतों का डंका पीटते हैं। लेकिन इन वैज्ञानिकों ने अपने शोध के निष्कर्ष में दावा किया कि मानव शरीर में केवल तीस हजार जीन हैं। चूहे के शरीर में भी लगभग इतने ही जीन होते हैं। कुछ विशेष जीनों को छोड़ दिया जाए तो मनुष्य और चूहे में एक जैसे जीन होते हैं। इसीलिए मनुष्य की आंतरिक संरचना को समझने के लिए सबसे ज्यादा प्रयोग चूहे पर ही किए गए हैं। इन जीनों के व्यवहार और प्रभाव की पड़ताल जैसे-जैसे गति पकड़ती जाएगी, बीमारियों पर नियंत्रण का सिलसिला कोशिका के स्तर पर ही दूर होता जाएगा। इसीलिए जीन एडिटिंग के जरिए चिकित्सा क्षेत्र में क्रांति आने की संभावनाएं बढ़ रही हैं।
इसी अनुसंधान से यह भी ज्ञात हुआ है कि दुनिया के सभी मनुष्यों में जितने भी वंशानुगत जीन हैं, वे आश्चर्यजनक रूप में 99ण्99 प्रतिशत एक समान हैं। इसीलिए वैज्ञानिक यह दावा करते रहे हैं कि हम-सब एक ही माता-पिता की संतानें हैं। अब वे हिंदू सनातन परंपरा के परिप्रेक्ष्य में मनु-शतरूपा हैं या ईसाई व इस्लामिक परंपरा के हिसाब से आदव व हौवा हैं, यह कहना मुश्किल है ? हाल ही में अमेरिका के वैज्ञानिक मार्क स्टोकल और डेविड थॉलर का पचास लाख पशुओं और मानवों के डीएनए के बार कोड परखने का अध्ययन सामने आया है। इसमें दावा किया गया है कि हम एक ही स्त्री व पुरुष की संतानें हैं। जो एक से दो लाख साल पहले कहीं पृथ्वी पर रहा करते थे। इन्हीं से मानव सभ्यता फली-फूली और फैली। इन वैज्ञानिक द्वय ने अपने शोध की सफलता के लिए मनुष्यों की एक लाख प्रजातियों समेत करीब पचास लाख पशुओं के आनुवांशिक सरंचना के डीएनए और वंशानुओं को खंगाला। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि हर दस में से नौ प्राणियों का जन्म व विकास एक ही माता-पिता से हुआ है। इस अध्ययन में यह भी दावा किया है कि सभी जीवों की 90 प्रतिशत प्रजातियां आज भी अस्तित्व में हैं। इन वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन डॉर्विन के विकासवाद के सिद्धांत से अभिप्रेरित होकर किया। हिंदू धर्म में जो दशावतारों की आवधारणा हैं, वह भी इन्हीं सिद्धांतों व धारणाओं के अनुरूप है। 
बहरहाल, जीन में अधिकतम परिवर्तन नर प्रजातियों में होते हैं, इसीलिए नरों को बदलाव का वाहक माना गया है, इसीलिए वही आनुवांशिक बीमारियों के भी वाहक होते हैं। जीन विज्ञान में आनुवंशिक संरचना का उत्तरोत्तर ज्ञान में वृद्धि होते जाने से यह समझ भी विकसित हुई है कि ढाई करोड़ साल पहले कैसे हम वनमानुष से मानव में तब्दील हुए? शरीर में देखने, सुनने, सूंघने और स्वाद जानने की जो इंद्रियां हैं, उनके रहस्यों तथा वे कैसे क्रियाशील रहकर शारीरिक प्रक्रिया में अपना दायित्व निभाती हैं, यह भी पता चलता है। इनकी प्रक्रिया की समझ विकसित हो जाने से ही वंशानुगत बीमारियों को आरंभिक अवस्था में ही दूर करने की चिकित्सा पद्धतियां विकसित हो रही हैं। जीन एडिटिंग की प्रगति के साथ हजारों रोगजन्य विकृतियों को दूर करने का मार्ग प्रशस्त होगा। ऐसा माना जाता है कि शरीर में 15 हजार बीमारियां पैदा होती हैं। परंतु इनमें से अभी चिकित्सा विज्ञान पांच हजार बीमारियों को ही जान पाया है। इनमें से भी ज्यादातर की उपचार प्रणालियां एंटिबायोटिक दवाओं पर केंद्रित हैं। 
एचआईवी, एड्स से इतर जीन आधारित तीस बीमारियों का अब तक पता चल चुका है। इनमें स्तन कैंसर, वंशानुगत अंधापन और मिर्गी जैसी बीमारियां शामिल हैं। अमेरिका और दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने 2017 में छपी ‘सांइस‘ पत्रिका में हृदय की धमानियों में चर्बी बढ़ाने वाली जीन की खोज कर उसे जीन एडिटिंग के जरिए दूर करने का दावा किया है। इसे भी वंशाणु परिर्धन प्रौद्यौगिकी कैश-9 से ही पृथक किया गया है। वंशानुगत बीमारी के रूप में जो कैंसर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आता है, उसे भी भविष्य में कोशिका के स्तर पर ही ठीक कर दिया जाएगा। व्यक्ति की वंशानुगत सरंचना से यदि यह पता चल जाए कि फलां व्यक्ति को मधुमेह या सीजोफे्रनिया जैसी मानसिक बीमारियां हो सकती हैं, तो जीन में बदलाव कर इन्हें जड़-मूल में समाप्त करने की उम्मीद बढ़ जाएगी। लेकिन दमा, रक्तचाप और हड्डी के जोड़ों के दर्द व उनमें तरल द्रव्यता की कमी को किसी जीन का कारण नहीं माना जाता है, इसलिए इन रोगों का इलाज नामुमकिन ही रहेगा। शराब व अन्य नशीलें पदार्थों की लत को भी जीन-थैरेपी से दूर करने का दावा किया जा रहा है। 
इस प्रयोग के सामने आते ही इससे नैतिकता और प्रकृति की सरंचना में अनैतिक छेड़छाड़ के प्रश्न भी उठ खड़े हुए हैं। भारत में ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि अल्ट्रासोनोग्राफी जैसी तकनीक के भारत में आने के बाद पुरुष के अनुपात में स्त्रियों की संख्या घटी है। इस असमानता ने हमारे यहाँ बलात्कार जैसी मानसिक विकृति को बढ़ाया है। जिस तरह से लड़का पैदा करने की चाहत हमारे सामाजिक मनोविज्ञान में श्रेष्ठ मानी जाती है, उसी तर्ज पर गोरे रंग-रूप और गठीले शरीर व ऊंची कद-काठी की इच्छा भी प्रत्येक माता-पिता अपनी पैदा होने वाली संतान में करता है। जीन परिवर्तन से कुशाग्र बुद्धि के बच्चे भी पैदा करने के दावे किए जा रहे हैं। यानी जो व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न हैं, भविष्य में उनके बच्चे ही कुशाग्र बुद्धि के होंगे? ये ऐसी कुछ शंकाएं हैं, जो विषमता को बढ़ाने वाली होंगी। फिर भी मानव-प्रजातियों को रोग-मुक्त करने या श्रेष्ठम रूप में ढालने के जो भी उपाय वंशाणु परिवर्धन से सामने जा सकते हैं, उन्हें सामने आना चाहिए। भारत में भी इस दृष्टि से डीएनए संरचना विधेयक लंबित है। यह विधेयक संसद के दोनों सत्रों से पारित हो जाता है, तो जीन या डीएनए बैंक का रास्ता खुल जाएगा, जिनमें प्रत्येक व्यक्ति की जीन आधारित कुंडली का संग्रह किया जाएगा।
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