तकनीकी

(23/May/2018)

दुनिया के दो पहलुओं को समझाने वाला वैज्ञानिक 

राग तेलंग
 
हम सभी के ख्याल में एक शाश्वत प्रश्न हमेशा से आता रहा है कि इस धरती पर मनुष्य कैसे आया और असीम ब्रह्माण्ड में हम कहाँ हैं और समय की वास्तविक अवधारणाएं क्या हैं। इन सब जटिल प्रश्नों को सरलतम तरीके से समझाने का हुनर किसी में था तो वह थे स्टीफन हॉकिंग, उनकी लिखी किताब “ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम” इसीलिये बेस्ट सेलर में शुमार हुई। उनका क्वांटम-सापेक्षता सिद्धांत ब्रह्माण्ड की असीम व्यापकता को समझने में काफी मददगार साबित हुआ है। उन्होंने दिलचस्प तरीके से समय की व्याख्या की कि समय का भान दरअसल हमारे अहसासों से जुड़ी बात है, वास्तविक रूप में समय का अलग स्वरूप है ,जिसमें दुनिया का असली और वास्तविक अस्तित्व है और शायद उसे ठीक-ठीक समय कहना भी ठीक नहीं। यानी चीज़ें वास्तव में वैसी नहीं होतीं जैसी हम देखते हैं या महसूस करते हैं। जब हम देख नहीं रहे होते तब दुनिया अलग होती है या वैसी दुनिया जो आपके पीठ पीछे घटती है। कुछ-कुछ वैसी जैसी हम कल्पना करते हैं। यह काल्पनिक दुनिया ही वास्तविक दुनिया है (हमारे सन्दर्भों को छोड़कर)। चकित मत होइए !, है दरअसल ऐसा ही, जी हाँ ! ऐसा ही। यहाँ याद आया कि मैंने अपनी पत्नी अनघाजी के साथ अत्यंत कल्पनाशील निर्देशक रितुपर्णो घोष की एक रोचक और संकेतात्मक बांग्ला फिल्म देखी थी जिसका शीर्षक था ‘‘शोब चरित्रो कोल्पोनिक’’ यानी सारे चरित्र काल्पनिक हैं। अनेक अवार्ड प्राप्त इस प्रयोगधर्मी और साहसिक फिल्म को देखना वैचारिकता के अनेक आयामों को जानना था। खैर! उस मजेदार और दिलचस्प फिल्म का किस्सा फिर कभी। याद करें “श्रोडिन्गर की बिल्ली” वाला क्वांटम विज्ञान का बहुचर्चित प्रयोग। यह सब दरअसल विज्ञान जगत में चल रहे समान्तर ब्रह्माण्ड संबंधी विमर्श का हिस्सा है।
हमारी भारतीय परंपरा और दर्शन में, इस जगत या सब कुछ के बारे में जो माया, इल्यूज़न, मिथ्या या जिसे भ्रम कहा गया है उसके मूल में यही बात है जिसकी वैज्ञानिक व्याख्या स्टीफन हॉकिंग ने की। चीजों-घटनाओं को सरल तरीके से वह भी आसपास के उदाहरणों और अनुभवों के द्वारा दिलचस्प अंदाज़ में वे प्रस्तुत करते रहे , यही खासियत स्टीफन हॉकिंग को महान और विलक्षण बनाती है। सरल-सहज होना और वैसा ही जीवन जीना महान लोगों की विशेषता होती है। लेकिन यह रास्ता सरल नहीं है बहुत कठिनाइयों भरा है,काँटों भरा है। महात्मा गाँधी से लेकर स्टीफन हॉकिंग तक कई ऐसे उदाहरण हैं। ऐसी विभूतियाँ नोबेल से ऊपर होती हैं यह कहने आवश्यकता नहीं।  
जैसा कि हम आप जानते हैं कि सापेक्षता का सामान्य सिद्धांत गुरुत्वाकर्षण से जुड़े विभिन्न आयामों को समझने में मदद करने वाला सिद्धांत है, वह भी बड़े खगोलीय पिंडों के सन्दर्भ में। वहीं दूसरी ओर क्वांटम सिद्धांत परमाणु या उससे छोटे स्तर की संरचनाओं या कहें फंडामेंटल पार्टिकल्स के तौर-तरीकों यानी प्रकृति और व्यवहार को समझने में सहायता करता है। ये दोनों ही सिद्धांत आधुनिक भौतिकी के महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं और लोगों के बीच खासे चर्चित भी। स्टीफन हॉकिंग अपनी किताब “थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग’’ में हमें इसी विषय के करीब ले जाते हैं। बहरहाल स्टीफन हॉकिंग ने “हॉकिंग रेडिएशन थ्योरी” के माध्यम से सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत और क्वांटम सिद्धांत के बीच एक पुल ज़रूर बनाया और इसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। इसी सन्दर्भ में यह जान लेना भी ज़रूरी है कि इन दिनों दुनिया के वैज्ञानिक जगत में ब्रह्माण्ड में मौजूद और अब तक ज्ञात चार मूलभूत बलों या उर्जाओं को किसी एक सिद्धांत के ज़रिये समझने की कोशिशें परवान पर हैं। यानी थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग की खोज की यात्रा जारी है। 
जो अदृश्य को देखना जानते हैं, उनके लिए असंभव कुछ नहीं। जी हाँ ! स्टीफन हॉकिंग पृथ्वी पर हुए उन बिरले लोगों में से थे जिनके पास वह दृष्टि थी कि वे चीज़ों और घटनाओं के पार देख सकते थे। उन्होंने बिग बैंग परिघटना को स्पष्ट किया और बताया कि कैसे इससे आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ और कैसे तारे और ग्रह अस्तित्व में आये। ब्लैक होल्स में लोगों की दिलचस्पी के पीछे हॉकिंगका नाम और लेखन ही रहा। ब्लैक होल्स से होने वाले विकिरण या कह लें रेडिएशन और इस रेडिएशन का उसके मास और ताप का आपसी सम्बन्ध स्टीफन हॉकिंग ने ही बताया। उनके द्वारा प्रस्तुत इसी थ्योरी को हॉकिंग रेडिएशन थ्योरी के नाम से भी जाना जाता है, जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। ब्लैक होल के वाष्पीकृत हो सकने और उसके कारण होने वाले कुप्रभावों जैसा दिलचस्प विचार जगाकर हॉकिंग ने दुनिया में लोगों का ध्यान क्वांटम थ्योरी और ब्रह्माण्ड विज्ञान की ओर खींचा। विज्ञान में सतत जिज्ञासा जगाने वाले वे अनोखे विज्ञानी थे। उनकी असाध्य बीमारी के बारे में काफी कुछ लिखा गया है और यह भी कि कैसे डॉक्टरों ने उनके जीवन के इक्कीसवें बरस में ही उनके जीवन की डोर के टूट जाने की घोषणा कर दी थी। स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए मेरी सलाह है कि आपको आपके शरीर की कमी कुछ भी अच्छा करने से नहीं रोक सकती और इसका कभी अफ़सोस भी नहीं करना चाहिए। अपने काम की स्पिरिट, भावना या इच्छा में अपंग होना दुखद है। अदम्य जिजीविषा और उत्कट संघर्ष का माद्दा रहे तो दुनिया एक दिन सलाम करती ही है, असंभव महज एक शब्द भर है। यह पूर्व में हमारे यहाँ अष्टावक्र जैसे मनीषी ने सिद्ध किया और हमारे समय में स्टीफन हॉकिंग ने भी। हॉकिंग का उदाहरण यह समझने के लिए पर्याप्त है कि आखिर मस्तिष्क क्यों शरीर से कई गुना अधिक श्रेष्ठ है। जीवन में विचार प्राथमिकता में रहें और भौतिक शरीर-वस्तुएं बाद में तो जीवन स्वर्ग हो जाए। जरा रूककर यह भी गौर करें कि हॉकिंग ने स्वर्ग के बारे में ही टिप्पणी की थी कि स्वर्ग की कल्पना मौत के अँधेरे से डरने वालों के लिए की गई है ! हॉकिंग के इस कहने में भी गूढ़ अर्थ है कि बीमारी और मौत के डर ने मुझे जीना सिखा दिया। सही भी है जब आप डरना छोड़ देते हैं तभी ठीक वहीं से आप जीना शुरू करते हैं। इस दुनिया को शांति स्थापित करने के लिए युद्ध करने की कोई ज़रुरत नहीं बस शान्ति स्थापित करने में लगे लोगों के काम पूरा होते तक धैर्य रखने की आवश्यकता है। युद्ध शब्द विज्ञान के शब्दकोष में कभी भी नहीं रहा, वह मनुष्यता के विकास और संरक्षण के लिए हमेशा से काम करता रहा है। इस महान वैज्ञानिक को उनके विलक्षण कार्यों के लिए एल्बर्ट आइंस्टीन अवार्ड, वोल्फ प्राइज, फंडामेंटल फिजिक्स प्राइज जैसे विज्ञान के अति सम्मानित अवार्ड्स प्राप्त हुए। आखिर में समापन हॉकिंग के भोलेपन से कहे गए शब्दों का उल्लेख करते हुए करेंगे कि मैं एक ऐसा बच्चा हूँ जो कभी बड़ा नहीं हो पाया। मैं अभी भी “कैसे’’ और “क्यों’’ का सवाल करता हूँ। आइये मनुष्य के भीतर प्रज्ज्वलित जीवन की अखंड ज्योति, निर्द्वन्द्व आशा और हौसले की प्रशस्ति करें और कास्मॉलॉजी के महान विज्ञान विचारक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग जैसे प्रेरक सितारे को याद करें। 
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