तकनीकी

(07/Feb/2018)

भारतीय यांत्रिकी संरचनाएँ

संजीव वर्मा ‘सलिल’

 

भारतीय परिवेश में अभियांत्रिकी संरचनाओं को ‘वास्तु’ कहा गया है। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी प्रत्येक संरचना को अपने आपमें स्वतंत्र और पूर्ण व्यक्ति के रूप में ‘वास्तु पुरुष’ कहा गया है। भारतीय परंपरा प्रति को मातृवत पूज्य मानकर उपयोग करती है, पाश्चात्य पद्धति प्रकृति को निष्प्राण पदार्थ मानकर उसका उपभोग (दोहन-शोषण) कर और फेंक देती हैं। भारतीय यांत्रिक संरचनाओं के दो वर्ग वैदिक-पौराणिक काल की संरचनाओं और आधुनिक संरचनाओं के रूप में किये जा सकते हैं और तब उनको वैश्विक गुणवत्ता, उपयोगिता और दीर्घता के मानकों पर परखा जा सकता है।


शिव की कालजयी अभियांत्रिकी

पौराणिक साहित्य में सबसे अधिक समर्थ अभियंता शिव हैं। शिव नागरिक यांत्रिकी (सिविल इंजीनियरिग), पर्यावरण यांत्रिकी, शल्य यांत्रिकी, शस्त्र यांत्रिकी, चिकित्सा यांत्रिकी, के साथ परमाण्विक यांत्रिकी में भी निष्णात हैं। वे इतने समर्थ यंत्री है कि पदार्थ और प्रकृति के मूल स्वभाव को भी परिवर्तित कर सके, प्रातिक परिवर्तनों के कारण जनगण की सुनिश्चित मृत्यु को भी टाल सके। उन्हें मृत्युंजय और महाकाल विशेषण प्राप्त हुए।
    शिव की अभियांत्रिकी का प्रथम ज्ञात नमूना 6 करोड़ से अधिक वर्ष पूर्व का है जब उन्होंने टैथीज़ महासागर के सूखने से निकली धरा पर मानव सभ्यता के प्रसार हेतु अपरिहार्य मीठे पेय जल प्राप्ति हेतु सर्वोच्च अमरकंटक पर्वत पर दुर्लभ आयुर्वेदिक औषधियों के सघन वन के बीच में अपने निवास स्थान के समीप बांस-कुञ्ज से घिरे सरोवर से प्रबल जलधार निकालकर गुजरात समुद्र तट तक प्रवाहित की जिसे आज सनातन सलिला नर्मदा के नाम से जाना जाता है। यह नर्मदा करोड़ों वर्षों से लेकर अब तक तक मानव सभ्यता केंद्र रही है।  नागलोक और गोंडवाना के नाम से यह अंचल पुरातत्व और इतिहास में विख्यात रहा है। नर्मदा को शिवात्मजा, शिवतनया, शिवसुता, शिवप्रिया, शिव स्वेदोद्भवा, शिवंगिनी आदि नाम इसी सन्दर्भ में दिये गये हैं। अमरकंटक में बांस-वन से निर्गमित होने के कारण वंशलोचनी, तीव्र जलप्रवाह से उत्पन्न कलकल ध्वनि के कारण रेवा, शिलाओं को चूर्ण कर रेत बनाने-बहाने के कारण बालुकावाहिनी, सुंदरता तथा आनंद देने के कारण नर्मदा, अकाल से रक्षा करने के कारण वर्मदा, तीव्र गति से बहने के कारण क्षिप्रा,  मैदान में मंथर गति के कारन मंदाकिनी, काल से बचने के कारण कालिंदी, स्वास्थ्य प्रदान कर हृष्ट-पुष्ट करने के कारण जगजननी जैसे विशेषण नर्मदा को मिले।
    जीवनदायी नर्मदा पर अधिकार के लिए भीषण युद्ध हुए। नाग, ऋक्ष, देव, किन्नर, गन्धर्व, वानर, उलूक दनुज, असुर आदि अनेक सभ्यताएं सदियों तक लड़ती रहीं। अन्य कुशल परमाणुयांत्रिकीविद दैत्यराज त्रिपुर ने परमाण्विक ऊर्जा संपन्न 3 नगर ‘त्रिपुरी’ बनाकर नर्मदा पर कब्जा किया तो शिव ने परमाण्विक विस्फोट कर उसे नष्ट कर दिया जिससे निःसृत ऊर्जा ने ज्वालामुखी को जन्म दिया।  लावा के जमने से बनी चट्टानें लौह तत्व की अधिकता के कारण जाना हो गयी। यह स्थल लम्हेटाघाट के नाम से ख्यात है। कालांतर में चट्टानों पर धूल-मिट्टी जमने से पर्वत-पहाडि़याँ और उनके बीच में तालाब बने। जबलपुर से 32 किलोमीटर दूर ऐसी ही एक पहाड़ी पर ज्वालादेवी मंदिर मूलतः ऐसी ही चट्टान को पूजने से बना। जबलपुर के 52 तालाब इसी समय बने थे जो अब नष्टप्राय हैं। टेथीज़ महासागर के पूरी तरह सूख्नने और वर्तमान भूगोल के बेबी माउंटेन कहे जानेवाले हिमालय पर्वत के बनने पर शिव ने मानसरोवर को अपना आवास बनाकर भगीरथ के माध्यम से नयी जलधारा प्रवाहित की जिसे गंगा कहा गया।
महर्षि अगस्त्य के अभियांत्रिकी कार्य
महर्षि अगस्त्य अपने समय के कुशल परमाणु शक्ति विशेषज्ञ थे। विंध्याचल पर्वत की ऊँचाई और दुर्गमता उत्तर से दक्षिण जाने के मार्ग में  बाधक हुई तो महर्षि ने परमाणु शक्ति का प्रयोग कर पर्वत को ध्वस्त कर मार्ग बनाया। साहित्यिक भाषा में इसे मानवीकरण कर पौराणिक गाथा में लिखा गया कि अपनी ऊंचाई पर गर्व कर विंध्याचल सूर्य का पथ अवरुद्ध करने लगा तो सृष्टि में अंधकार छाने लगा। देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से समाधान हेतु प्रार्थना की। महर्षि को देखकर विंध्याचल प्रणाम करने झुका तो महर्षि ने आदेश दिया कि दक्षिण से मेरे लौटने तक ऐसे ही झुके रहना और वह आज तक झुका है।
    दस्युओं द्वारा आतंक फैलाकर समुद्र में छिप जाने की घटनाएँ बढ़ने पर अगस्त्य ने परमाणु शक्ति का प्रयोग कर समुद्र का जल सुखाया और राक्षसों का संहार किया। पौराणिक कथा में कहा गया की अगस्त्य ने चुल्लू में समुद्र का जल पी लिया। राक्षसों से आर्य ऋषियों की रक्षा के लिए अगस्त्य ने नर्मदा के दक्षिण में  अपना आश्रम (परमाणु अस्त्रागार तथा शोधकेन्द्र) स्थापित किया। किसी समय नर्मदा घाटी के एकछत्र सम्राट रहे डायनासौर राजसौरस नर्मदेंसिस  खोज लिए जाने के बाद इस क्षेत्र की प्राचीनता और उक्त कथाएँ अंतर्संबन्धित और  प्रामाणिकता होना असंदिग्ध है।

रामकालीन अभियांत्रिकी  

रावण द्वारा परमाण्विक शस्त्र विकसित कर देवों तथा मानवों पर अत्याचार किये जाने को सुढ़ दुर्ग के रूप में बनाना यांत्रिकी का अद्भुत नमूना था। रावण की सैन्य यांत्रिकी विद्या और कला अद्वितीय थी।  स्वयंवर के समय राम ने शिव का एक परमाण्वास्त्र जो जनक के पास था पास था, रावण हस्तगत करना चाहता था नष्ट किया। सीताहरण में प्रयुक्त रथ जो भूमार्ग और नभमार्ग पर चल सकता था वाहन यांत्रिकी की मिसाल था। राम-रावण  परमाण्विक युद्ध के समय शस्त्रों से निकले यूरेनियम-थोरियम के कारण सहस्त्रों वर्षों तक लंका दुर्दशा रही जो हिरोशिमा नागासाकी की हुई थी। श्री राम के लिये नल-नील द्वारा लगभग 13 लाख वर्ष पूर्व निर्मित रामेश्वरम सेतु अभियांत्रिकी की अनोखी मिसाल है। सुषेण वैद्य द्वारा बायोमेडिकल इंजीनियरिंग का प्रयोग युद्ध अवधि में प्रतिदिन घायलों का इस तरह उपचार किया गया की वे अगले दिन पुनः युद्ध कर सके।
राम सेतु
लंका पर चढ़ाई हेतु श्री राम ने अत्यल्प काल में सेतु निर्माण कर चमत्कार ही कर दिया था। भारत के दक्षिणी-पूर्वी तट पर रामेश्वरम् और श्रीलंका के तलाई-मन्नार के मध्य राम सेतु समुद्री सतह से न्यूनतम 3 फुट एवं अधिकतम 30 फीट नीचे स्थित है। अमेरिकी अन्तरिक्ष अनुसंधान एजेन्सी नासा के उपग्रह जेमिनी-द्वितीय ने सन् 1966 में इस लुप्त सेतु की प्रथम तस्वीरें पृथ्वी पर भेजी थी। नासा ने इसका नाम ‘एडम्स-ब्रिज’ या ‘आदम-पुल’ रखा। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन  (इसरो) ने 26 अक्टूबर 2003 को इसके चित्रों को सार्वजनिक किया। रामनाथपुरम् जिला गजेटियर 1972 के अनुसार ‘यह सेतु बालू और चूने के पत्थर (लाइमस्टेन) से बना है।’ नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ ओशियन टैक्नालॉजी द्वारा इस सेतु के कुछ स्थलों पर की गयी बोरिंग बतलाती है कि सेतु के 6 मीटर के हिस्से में समुद्री रेतु, कोरल्स; मूंगा आदि केलकेरियस सैण्ड स्टोन और पत्थर आदि निर्माण सामग्री मिले हैं। जिओलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के पूर्व निदेशक डा। बद्रीनारायण का मत है कि रामसेतु में मिले पत्थर समुद्री नहीं, अन्यत्र से लाए गए हैं।
एक सौ योजन के सेतु का निर्माण पाँच दिन में क्रमशः 14ए 20ए 21ए 22ए 23 योजन किया गया। रामनाथपुरम् जिला गजेटियर 1972 के अनुसार ‘‘कुरंगुपडई, वानर सेना द्वारा निर्मित यह सेतु 1480 ई. तक भारत और श्रीलंका का भूस्थलीय सम्पर्क मार्ग था। इसके बाद समुद्र में आये एक भीषण चक्रवात ने इसमें दरारें डाल दीं, पानी पुल के ऊपर से बहने लगा।’
    पाक जलडमरू मध्य व मन्नार की खाड़ी के बीच सीधा रास्ता बनाने के लिए धनुषकोटि के पास राम सेतु की लगभग 12 मीटर ऊपरी सतह को छाँटकर गहराई बढ़ाना व 300 मीटर लंबी नहर प्रस्तावित है जिसकी लागत 2427 करोड़ रूपए अनुमानित है। इससे 36 घण्टों और 450 कि.मी। की बचत तथा प्रतिदिन 9 जहाजों निकलने पर एक वर्ष में लगभग 3285 जहाज निकलने से 2100 हजार करोड़ वार्षिक आय होगी। करोड़ों लोगों की आस्था, पुरातात्विक महत्त्व, पर्यावरण को क्षति आदि पहलुओं को देखते हुए इस संरचना को मूल रूप में लाकर रक्षित किया जाना चाहिए।   

कृष्णकालीन अभियांत्रिकी

लाक्षाग्रह, इंद्रप्रस्थ तथा द्वारिका ष्णकाल की अद्वितीय अभियांत्रिकी  संरचनाएँ हैं। सुदर्शन चक्र, पाञ्चजन्य शंख, गांडीव धनुष आदि शस्त्र निर्माण कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। महाभारत पश्चात अश्वत्थामा द्वारा उत्तरा के गर्भस्थ शिशु पर प्रहार, श्रीष्ण द्वारा सुरक्षापूर्वक शिशु जन्म कराना बायो मेडिकल इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण है। गुजरात में समुद्रतट पर ष्ण द्वारा बसाई गयी द्वारिका नगरी उनकी मृत्यु पश्चात जलमग्न हो गयी। 2005 से भारतीय नौसेना के सहयोग से इसके अन्वेषण का कार्य प्रगति पर है। वैज्ञानिक स्कूबा डाइविंग से इसके रहस्य जानने  में लगे हैं।

श्रेष्ठ अभियांत्रिकी के ऐतिहासिक उदाहरण
श्रेष्ठ भारतीय संरचनाओं में से कुछ इतनी प्रसिद्ध हुईं कि  उनका रूपांतरण कर निर्माण का श्रेय सुनियोजित प्रयास शासकों द्वारा किया गया। उनमें से कुछ निम्न  निम्न हैंः   

तेजोमहालय (ताजमहल) आगरा

हिन्दू राजा परमार देव द्वारा 1196 में बनवाया गया तेजोमहालय  (शिव के पाँचवे  रूप अग्रेश्वर महादेव नाग नाथेश्वर का उपासना गृह तथा राजा का आवास) भवन यांत्रिकी कला का अद्भुत उदाहरण है जिसे विश्व के सात आश्चर्यों में गिना जाता है।

तेजो महालय के रेखांकन  

108 कमल पुष्पों तथा 108 कलशों से सज्जित संगमरमरी जालियों से सज्जित यह भवन 400 से अधिक कक्ष तथा तहखाने हैं। इसके गुम्बद निर्माण के समय यह व्यवस्था भी की  गयी है कि बूँद-बूँद वर्षा टपकने से शिवलिंग का जलाभिषेक अपने आप होता रहे।

विष्णु स्तम्भ (क़ुतुब मीनार) दिल्ली

युनेस्को द्वारा विश्व घोषित, दक्षिण दिल्ली के विष्णुपद गिरि में राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक प्रख्यात ज्योतिर्विद आचार्य मिहिर की शोध तथा निवासस्थली मिहिरा अवली (महरौली) में दिन-रात के प्रतीक 12 त्रिभुजाकारों-12 कमल पत्रों और 27  नक्षत्रों के प्रतीक 27 पैवेलियनों सहित निर्मित 7 मंजि़ली विश्व की सबसे ऊँची मीनार 72ण्7 मीटर, आधार व्यास 14ण्3 मीटर, शिखर व्यास 2ण्75 मीटर, 379 सीढियाँ, निर्माण काल 1193 ई। पूर्व) विष्णु ध्वज/स्तंभ (क़ुतुब मीनार) भारतीय अभियांत्रिकी संरचनाओं के श्रेष्ठता का उदाहरण है। इस पर सनातन धर्म के देवों, मांगलिक प्रतीकों तथा संस्त उद्धरणों का अंकन है। इन पर मुग़लकाल में समीपस्थ जैन मंदिर तोड़कर उस सामग्री से पत्थर लगाकर आयतें लिखाकर मुग़ल इमारत का रूप देने का प्रयास कुतुबुद्दीन ऐबक व् इलततमिश द्वारा 1199-1368 में किया गया ।   निकट ही चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा विष्णुपद गिरि पर स्थापित और विष्णु भगवान को समर्पित गिरि पर स्थापित और विष्णु भगवान को समर्पित 7 मीटर ऊंचा 6 टन वज़न का ध्रुव/गरुड़स्तंभ (लौह स्तंभ) स्तम्भ चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने बाल्हिक युद्ध में विजय पश्चात बनवाया। इस पर अंकित लेख में सन 1052 के राजा अंनगपाल द्वितीय का उल्लेख है। तोमर नरेश विग्रह ने इसे खड़ा करवाया जिस पर सैकड़ों वर्षों बाद भी जंग नहीं लगी। फॉस्फोरस मिश्रित लोहे से निर्मित यह स्तंभ भारतीय धात्विक यांत्रिकी की श्रेष्ठता का अनुपम उदाहरण है। आई.आई.टी। कानपुर के प्रो। बालासुब्रमण्यम के अनुसार हाइड्रोजन फॉस्फेट हाइड्रेट जंगनिरोधी सतह है का निर्माण करता है।

जंतर मंतर

सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा 1724 में दिल्ली जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में निर्मित जंतर मंतर प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है। यहाँ सम्राट यंत्र सूर्य की सहायता से समय और ग्रहों की स्थिति, मिस्र यंत्र वर्ष से सबसे छोटे ओर सबसे बड़े दिन, राम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र से खगोलीय पिंडों की गति जानी जा सकती है। इनके अतिरिक्त दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, जयपुर, चित्तौरगढ़, गोलकुंडा आदि के किले अपनी मजबूती, उपयोगिता और श्रेष्ठता की मिसाल हैं।

आधुनिक अभियांत्रिकी संरचनाएँ

भारतीय अभियांत्रिकी  संरचनाओं को शकों-हूणों और मुगलों के आक्रमणों के कारण पडी। मुगलों ने पुराने निर्माणों को बेरहमी से तोडा और  किये। अंग्रेजों ने भारत को एक इकाई बनाने के साथ अपनी प्रशासनिक पकड़ बनाने के लिये किये। स्वतंत्रता के पश्चात  सर मोक्षगुंडम विश्वेस्वरैया, डॉ। चन्द्रशेखर वेंकट रमण, डॉ। मेघनाद साहा आदि ने विविध परियोजनाओं को मूर्त किया। भाखरानागल, हीराकुड, नागार्जुन सागर, बरगी, सरदार सरोवर, टिहरी आदि जल परियोजनाओं ने कृषि उत्पादन से भारतीय अभियांत्रिकी को गति दी।
जबलपुर, कानपुर, तिरुचिरापल्ली, शाहजहाँपुर, इटारसी आदि में सीमा सुरक्षा बल हेतु अस्त्र-शास्त्र और सैन्य वाहन गुणवत्ता और मितव्ययिता के साथ बनाने में भारतीय संयंत्र किसी विदेशी संस्थान से पीछे नहीं हैं।
परमाणु ऊर्जा संयंत्र निर्माण, परिचालन और दुर्घटना नियंत्रण में भारत के प्रतिष्ठानों ने विदेशी प्रतिष्ठानों की तुलना में बेहतर काम किया है।  कम सञ्चालन व्यय, अधिक रोजगार और उत्पादन के साथ कम दुर्घटनाओं ने परमाणु वैज्ञानिकों को प्रतिशत दिलाई है जिसका श्रेय डॉ। होमी जहांगीर भाभा को जाता है।
भारत की अंतरिक्ष परियोजनाएं और उपग्रह टेक्नॉलॉजी दुनिया में श्रेष्ठता, मितव्ययिता और सटीकता के लिए ख्यात हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद भारत ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं और खुद को प्रमाणित किया है। डॉ। विक्रम साराभाई का योगदान विस्मृत नहीं किया जा सकता।
भारत के अभियंता पूरी दुनिया में अपनी लगन, परिश्रम और योग्यता के लिए जाने जाते हैं ।  देश में प्रशासनिक सेवाओं की तुलना में वेतन, पदोन्नति, सुविधाएँ और सामाजिक प्रतिष्ठा अत्यल्प होने के बावजूद भारतीय अभियांत्रिकी परियोजनाओं ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं।
    अग्निपुरुष डॉ। कलाम के नेतृत्व में भारतीय मिसाइल अभियांत्रिकी ने  विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त की है। चंद्र, मंगल तथा सूर्य तक शोध हेतु यान प्रक्षेपित करने में भारतीय वैज्ञानिकों व अभियंताओं ने अपनी दक्षता का परिचय दिया है। मेट्रो ट्रैन, दक्षिण रेल, वैष्णव देवी रेल परियोजना हो या बुलेट ट्रैन की भावी  योजना, राष्ट्रीय राजमार्ग चतुर्भुज हो या नदियों को जोड़ने की योजना भारतीय अभियंताओं ने हर चुनौती को स्वीकारा है। विश्व के किसी भी देश की तुलना में भारतीय संरचनाएँ और परियोजनाएं श्रेष्ठ सिद्ध हुई हैं।

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