तकनीकी

(11/Jan/2017)

राफेल डील से बढ़ेगी भारत की सैन्य ताकत

शशांक द्विवेदी

काफी लंबे इंतजार के बाद आखिरकार भारत की फ्रांस के साथ अत्याधुनिक लड़ाकू विमान राफेल डील पक्की हो गई है। देश की वर्तमान सुरक्षा परिस्तिथियों और स्कावड्रन की कमी से जूझ रही भारतीय वायुसेना के लिए ये डील बहुत मायने रखती है। काफी लंबे समय से ये डील लटकी पड़ी थी। भारत फ्रांस से 7ण्878 अरब यूरो (लगभग 59 हजार करोड़ रुपये) में 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदेगा। फिलहाल वायुसेना को 42 स्कावड्रन की जरूरत है। लेकिन वर्तमान में उसके पास 32 स्कावड्रन ही हैं। मिग 21 फाइटर विमान के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी गई है, जिस कारण यह संख्या और कम हो जाएगी। नए राफेल विमान 2019 से बेड़े में शामिल होंगे। ध्यान देने वाली बात यह कि वायुसेना के बेड़े में शामिल 250 मिग विमान जर्जर हो चुके है जबकि पिछले 9 साल में 100 विमान हादसे का शिकार हो चुके है। पाकिस्तान और चीन की चुनौतियों से निपटने के लिए वायुसेना को अगले 10 साल में चार सौ लड़ाकू विमानों की जरुरत है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार वायुसेना में लड़ाकू विमानों की भारी कमी है।
2007 से भारत फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की तैयारी कर रहा है। लेकिन, अभी तक यह फाइनल नहीं हो सका था। 2015 में भारत ने फ्रांस की सरकार से सीधे 36 फाइटर जेट्स खरीदने की योजना बनाई। यूपीए सरकार ने फ्रांस से 126 विमानों को खरीदने का सौदा तैयार किया था। इसमें 36 विमान सीधे दसाल्ट-एवियशन कंपनी से खरीदे जाने थे। बाकी 90 विमान भारत में तैयार होने थे। लेकिन प्रधानमंत्री ने पुराने सौदे को रद्द कर सीधे फ्रांस सरकार से नई डील की। सरकार का दावा है कि वह यूपीए शासन में राफेल को लेकर जो डील हुई थी, उसके मुकाबले अभी की डील में करीब 75 करोड़ यूरो (करीब 5ए601 करोड़ रुपये) की बचत हो रही है। मौजूदा डील में 50 प्रतिशत का ऑफसेट क्लॉज भी है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय कंपनियों को इसमें कम से कम 3 अरब यूरो (करीब 22ए406 करोड़ रुपये) का कारोबार मिलेगा। फ्रांस इस डील का 50 प्रतिशत भारत में फिर से सैन्य उपकरणों में निवेश करेगा। जिससे भारत में हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा। राफेल लड़ाकू विमानों की आपूर्ति 36 महीने में शुरू हो जाएगी और यह अनुबंध किए जाने की तारीख से 66 महीने में पूरी हो जाएगी। पिछले 20 वर्षों में यह लड़ाकू विमानों की खरीद का पहला सौदा होगा। इसमें अत्याधुनिक मिसाइल लगे हुए हैं जिससे भारतीय वायु सेना को मजबूती मिलेगी।
हालांकि इस सौदे को पहले ही अंतिम रूप दे दिया जाता लेकिन कीमतों, आफसेट जैसे मुद्दों को लेकर समय लग गया क्योंकि भारत बेहतर अनुबंध बनाना चाहता था। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद फ्रांस 50 प्रतिशत ऑफसेट उपबंध के लिए सहमत हो गया था। सौदे के तहत इसमें नये दौर की दृश्य से ओझल होने में सक्षम ‘मिटिअर’ मिसाइल और इस्राइली प्रणाली शामिल है। पिछले महीने राफेल सौदे को लेकर फ्रांस से वार्ता करने वाले दल की रिपोर्ट को रक्षा मंत्रालय ने मंजूरी दी और उसके बाद भारतीय वायुसेना को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने के फैसले के तहत मोदी सरकार ने फ्रांस के साथ राफेल लड़ाकू विमान के सौदे की मंजूरी दे दी। अब भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और फ्रांस के रक्षा मंत्री ज्यां जीन यीव्स ली ड्रियान के हस्ताक्षर के बाद यह डील पक्की हो गई है। हाल ही में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी कहा था कि राफेल डील अब ‘निर्णायक अवस्था’ में है। पिछले 20 साल में यह लड़ाकू विमानों की खरीद का पहला सौदा होगा। इसमें अत्याधुनिक मिसाइल लगी हुई हैं जिससे भारतीय वायु सेना को मजबूती मिलेगी। रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने राफेल डील को अच्छा सौदा बताते हुए कहा कि ये सौदा बेहतर शर्तों पर किया गया एक बेहतरीन सौदा है।
क्या खासियत है राफेल विमान की?
राफेल लड़ाकू विमानों को फ्रांस की डसाल्ट एविएशन कंपनी बनाती है। यह एक बहुउपयोगी लड़ाकू विमान है। इसकी लंबाई 15ण्27 मीटर है और इसमें एक या दो पायलट बैठ सकते हैं। राफेल ऊँचे इलाकों में लड़ने में माहिर है। राफेल एक मिनट में 60 हजार फुट की ऊँचाई तक जा सकता है। हालांकि अधिकतम भार उठाकर इसके उड़ने की क्षमता 24500 किलोग्राम है। विमान में ईंधन क्षमता 4700 किलोग्राम है। राफेल की अधिकतम रफ्तार 2200 से 2500 तक किमी प्रतिघंटा है और इसकी रेंज 3700 किलोमीटर है। इसमें 1.30 उउ की एक गन लगी होती है जो एक बार में 125 राउंड गोलियाँ निकाल सकती है। इसके अलावा इसमें घातक एमबीडीए एमआइसीए, एमबीडीए मेटेओर, एमबीडीए अपाचे, स्टोर्म शैडो एससीएएलपी मिसाइलें लगी रहती हैं। इसमें थाले आरबीई-2 रडार और थाले स्पेक्ट्रा वारफेयर सिस्टम लगा होता है। साथ ही इसमें ऑप्ट्रॉनिक सेक्योर फ्रंटल इंफ्रा-रेड सर्च और ट्रैक सिस्टम भी लगा है।
अमेरिका, जर्मनी और रूस चाहते हैं कि भारत उनसे लड़ाकू विमान खरीदे। अमेरिका भारत को एफ-16 और एफ-18, रूस मिग-35, जर्मनी और ब्रिटेन यूरोफाइटर टायफून और स्वीडन ग्रिपन विमान बेचना चाह रहे थे, लेकिन सरकार ने राफेल को खरीदने का फैसला किया है।

इतिहास के आईने में राफेल विमान 
फ्रांस में राफेल का मतलब तूफान होता है। राफेल विमान फ्रांस की दासौल्ट कंपनी द्वारा बनाया गया 2 इंजन वाला लड़ाकू विमान है। 1970 में फ्रांसीसी सेना ने अपने पुराने पड़ चुके लड़ाकू विमानों को बदलने की मांग की। जिसके बाद फ्रांस ने 4 यूरोपीय देशों के साथ मिलकर एक बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान की परियोजना पर काम शुरू किया। बाद में साथी देशों से मतभेद होने के बाद फ्रांस ने इस पर अकेले ही काम शुरू कर दिया। हालांकि इस पर काम 1986 में ही शुरू हो गया था, लेकिन शीत युद्ध की समाप्ति के बाद बदले समीकरणों में बजट की कमी और नीतियों में अड़ंगों के चलते ये परियोजना लेट हो गई। 1996 में पहला विमान फ्रांसीसी वायुसेना में शामिल होना था लेकिन ये 2001 में शामिल किया जा सका। यह लड़ाकू विमान तीन संस्करणों में उपलब्ध है। इसमें राफेल सी सिंगल सीट वाला विमान है जबकि राफेल बी दो सीट वाला विमान है। वहीं राफेल एम सिंगल सीट कैरियर बेस्ड संस्करण है। राफेल को फ्रांसीसी वायुसेना और जलसेना में 2001 में शामिल किया गया। बाद में बिक्री के लिए इसका कई देशों में प्रचार भी किया गया, लेकिन खरीदने की हामी सिर्फ भारत और मिश्र ने भरी। राफेल को अफगानिस्तान, लीबिया, माली और इराक में इस्तेमाल किया जा चुका है। इसमें कई अपग्रेडेशन कर 2018 तक इसमें बड़े बदलाव की भी बात कही जा रही है।
राफेल को चुनने की वजह 
राफेल विमानों की क्षमता और सटीकता बेजोड़ है, इसके साथ ही आर्थिक वजहों से भारतीय वायु ने लंबे परीक्षण के बाद राफेल को चुना। वायु सेना के पास एफ-16 और एफ-18, रूस मिग-35, यूरोफाइटर टायफून और ग्रिपन विमान का विकल्प था, लेकिन यूरोफाइटर टायफून सबसे महंगा है और मिग के बारे में अब संदेह होने लगा है। इस कारण भी राफेल को खरीदने का फैसला किया गया है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार राफेल ऊँचे इलाकों में लड़ने में माहिर है और भारत तथा चीन के बीच हिमालय का ऊँचा इलाका है, जहाँ राफेल मददगार साबित होगा। हालांकि यूरोफाइटर टायफून इस मामले में राफेल से आगे है। वायुसेना के मुताबिक उड़ान भरते वक्त राफेल की रफ्तार 1912 किलोमीटर प्रति घंटा है और ये 3700 किलोमीटर तक जा सकता है। जबकि यह हवा से जमीन में मार करने में टायफून से ज्यादा कारगर माना जा रहा है। राफेल खरीदने का एक और कारण यह भी है कि भारतीय वायुसेना राफेल बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी दासौल्ट का मिराज 2000 विमान पहले से इस्तेमाल कर रही है। कारगिल युद्ध में मिराज विमानों ने सफलतापूर्वक कार्य को अंजाम दिया था। कुल मिलाकर राफेल डील भारत के लिए बहुत सकारात्मक है और इससे भारतीय वायुसेना काफी मजबूत स्तिथि में पहुँच जायेगी ।


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