तकनीकी

(20/Jun/2016)

ग्रीन टेक्नॉलॉजी में दुर्लभ धातुएँ


डॉ. कपूरमल जैन

 

प्रत्येक उत्पाद और उनकी गुणवत्ता अपने निर्माण के लिये कच्चे माल, बिजली, पानी तथा विभिन्न भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं के साथ ही अपनाई जाने वाली प्रौद्योगिकियों पर निर्भर करते हैं। अतः उत्पादों की गुणवत्ता को बनाये रखते हुए पर्यावरण को नुकसान पहुँचाये बगैर निर्माण करने में समर्थ प्रौद्योगिकियों को ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ कहा जाता है। ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ से प्राप्त ऐसे उत्पाद उपयोग के दौरान तथा उपयोग के बाद भी पर्यावरण हितैषी बने रहते हैं।

आज के औद्योगिक दौर में उद्योगों को विद्युत की बहुत आवश्यकता होती है। वर्तमान में विद्युत ऊर्जा पाने के पारम्परिक तरीके ‘जीवाश्म ईंधनों’, ‘बांधों’ और ‘नाभिकीय रिएक्टरों’ पर आधारित हैं। जहाँ ‘जीवाश्म ईंधन’ कार्बन डायआक्साइड के स्रोत हैं, वहीं बांध मीथेन के। ये दोनों ही प्रमुख ग्रीन हाउस गैसें हैं जिनका संबंध ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के साथ पाया गया है। इसके अलावा कई और प्रकार की ग्रीन हाउस गैसें भी है तथा इनके उत्पन्न होने के कई अन्य स्रोत भी हैं। वर्तमान में जिस ‘जलवायु परिवर्तन’ के खतरे को लेकर विश्व के तमाम देश चिंतित हैं, उसका संबंध वायुमंडल में बढ़ रही ‘ग्रीन हाउस गैसों’ से है। इसीलिये हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘दी युनाईटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लायमेट चैंज’ के तत्वावधान में दिसम्बर 2015 में पेरिस में सम्पन्न हुए सम्मेलन में वायुमंडल में ‘कार्बन’ वृद्धि के बड़े स्रोतों को सीमित करने हेतु कई देशों ने भाग लेते हुए एक समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं। लेकिन बावजूद इसके निर्धारित समय-सीमा में इस पर अमल करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इसमें नीति विषयक बदलावों के साथ ही वर्तमान में प्रचलित प्रौद्योगिकियों के स्थान पर ऐसी प्रौद्योगिकियों को अपनाना जरूरी है जिनसे तैयार होने वाले उत्पाद अपने निर्माण, सम्पूर्ण जीवन-काल और उसके बाद अपशिष्ट के रूप में पर्यावरण-हितैषी बने रहें। दूसरे शब्दों में, वे वातावरण को प्रदूषित न करे और वातावरण में कम से कम ‘कार्बन’ (यानि, ग्रीन हाउस गैसें) उंडेलें। ऐसी प्रौद्योगिकियाँ ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ कहलाती हैं। एक दृष्टि से ये वास्तव में ‘क्लीन टेक्नॉलॉजी’ हैं, जिनका उद्देश्य पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य संबंधी जोखिम को न्यूनतम स्तर पर ले जाना है ताकि टिकाऊ विकास की राह लगातार चौड़ी और चौड़ी बनती चली जाए।
प्रत्येक उत्पाद और उनकी गुणवत्ता अपने निर्माण के लिये कच्चे माल, बिजली, पानी तथा विभिन्न भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं के साथ ही अपनाई जाने वाली प्रौद्योगिकियों पर निर्भर करते हैं। अतः उत्पादों की गुणवत्ता को बनाये रखते हुए पर्यावरण को नुकसान पहुँचाये बगैर निर्माण करने में समर्थ प्रौद्योगिकियों को ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ कहा जाता है। ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ से प्राप्त ऐसे उत्पाद उपयोग के दौरान तथा उपयोग के बाद भी पर्यावरण हितैषी बने रहते हैं। आज ग्रीन टेक्नॉलॉजी में नवाचारों की दिशा ही ऐसी है जिससे आसन्न ऊर्जा और पर्यावरण संकट से निजात पायी जा सके। ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ के विकास के दौरान 5 ‘आर’ का ध्यान रखा जाता है। ये हैं रिसाइकलिंग (पुनर्चक्रण), रिन्यूइंग (नवीकरण), रिड्यूसिंग (कमी), रिथिंकिंग (पुनर्विचार) और रिस्पॉसिबिलिटि (जवाबदेही)। ग्रीन टेक्नॉलॉजी में विद्युत की आवश्यकता की पूर्ति के लिये नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों, जैसे सौर (सोलर) और पवन (विण्ड), के उपयोग करने पर विशेष जोर दिया जाता है। इस दौरान औद्योगिक प्रतिष्ठान कम्प्यूटराइजेशन और ऑटोमेशन (स्वचलीकरण) पर भी विशेष ध्यान देते हैं ताकि विद्युत की बचत की जा सके। ‘ग्रीन रास्तों’ पर चलते हुए उत्पाद तैयार करने के लिये आवश्यक कच्चे माल के लिये खनन के उन तरीकों पर भी ध्यान दिया जाता है जो प्रकृति को कम से कम नुकसान पहुँचाये तथा पर्यावरण को कम से कम प्रदूषित करे। प्रयास इस दिशा में भी होते हैं जिससे उत्पादों के निर्माण के लिये कम से कम कच्चे माल की जरूरत पड़े तथा उन्हें ‘रिसाइकलिंग’ के माध्यम से प्राप्त किया जा सके। ऐसा उस जिम्मेदारी की भावना से किया जाता है जिससे प्राकृतिक संसाधन भावी पीढ़ियों के लिये सुरक्षित बचे रह सकें। इसके लिये इस ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ में मजबूती, हल्केपन जैसे आवश्यक गुणों वाले पदार्थों के विकास हेतु शोध पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
‘ग्रीन टैक्नॉलॉजी’ को अपनाने में प्रमुख बाधा इनका महंगा होना है क्योंकि इनको विकसित करने के लिये आवश्यक कच्चा माल सुगमता से नहीं मिलता है। अतः आज हमें सस्ती एवं ‘पर्यावरण हितैषी’ ऐसी ग्रीन टेक्नॉलॉजी की जरूरत हैं जो कम से कम कार्बन के बजट में अधिक से अधिक दक्ष साबित हों।
यह सच है कि आज विकास की गति को रोका अथवा कम नहीं किया जा सकता। इसीलिये इसे टिकाऊ एवं हितकारी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिये बिना धरती को और अधिक गरम किये हर नागरिक तक प्रौद्योगिकियों का लाभ ‘ग्रीन प्रौद्योगिकियों’ के माध्यम से पहँुचाना जरूरी है ताकि लोगों के जीवन स्तर में सुधार की दिशा अवरूद्ध न हो। इसीलिए आज ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ से मानव कल्याणकारी कोई भी क्षेत्र छूटा नहीं है। इसके अंतर्गत विद्युत ऊर्जा प्राप्ति के लिये पारम्परिक स्रोतों की दक्षता में वृद्धि, कार्बन बचाने वाले सौर तथा पवन जैसे गैर-पारम्परिक स्रोतों के विकास, विभिन्न कार्यों के सम्पादन के लिये ऊर्जा बचाने वाली दक्ष और वजन में हल्की मशीनों के निर्माण, भवन निर्माण के लिये पर्यावरण हितैषी सामग्री के उपयोग और डिजाइन पर जोर, विकास के मार्ग पर चलते रहने के लिये वैकल्पिक नये पदार्थों पर शोध, आवागमन और दूरसंचार के पर्यावरण हितैषी तथा उपभोक्ताओं की मांग और पॉकेट को ध्यान में रखते हुए सस्ते साधनों की पूर्ति हेतु नवाचार आदि शामिल हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक हर उन रास्तों की तलाश कर रहे हैं जो ‘ग्रीन’ (पर्यावरण हितैषी) हों तथा टेक्नॉलॉजिस्ट उन नवाचारी तरीकों को खोज रहे हैं जो पर्यावरण पर कम से कम दबाव डालते हुए बढ़ती आबादी की मांग की पूर्ति करने में समर्थ हो सके। 

    ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ से मानव कल्याणकारी कोई भी क्षेत्र छूटा नहीं है। इसके अंतर्गत विद्युत ऊर्जा प्राप्ति के लिये पारम्परिक स्रोतों की दक्षता में वृद्धि, कार्बन बचाने वाले सौर तथा पवन जैसे गैर-पारम्परिक स्रोतों के विकास, विभिन्न कार्यों के सम्पादन के लिये ऊर्जा बचाने वाली दक्ष और वजन में हल्की मशीनों के निर्माण, भवन निर्माण के लिये पर्यावरण हितेषी सामग्री के उपयोग और डिजाइन पर जोर, विकास के मार्ग पर चलते रहने के लिये वैकल्पिक नये पदार्थों पर शोध, आवागमन और दूरसंचार के पर्यावरण हितेषी तथा उपभोक्ताओं की मांग और पॉकेट को ध्यान में रखते हुए सस्ते साधनों की पूर्ति हेतु नवाचार आदि शामिल हैं। 

 

‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ के विकास के लिये हुए शोध के दौरान वैज्ञानिकों का ध्यान दुर्लभ धातुओं पर तब आकर्षित हुआ जब ‘ग्लोबल वार्मिंग’ और ‘जलवायु परिवर्तन’ का खतरा मंडराने लगा और ‘टिकाऊ विकास’ की दिशा में प्रचलित प्रौद्योगिकियाँ दम तोड़ने लगी। ‘टिकाऊ विकास’ के लियेे विशेष प्रकार के गुणों से सुसज्जित उन पदार्थों की जरूरत महसूस की जाने लगी जो प्रचलित पदार्थों का ‘पर्यावरण हितैषी’ विकल्प बन सके। इस उद्देश्य को पाने के लिये वैज्ञानिकों का ध्यान ‘आवर्त सारिणी’ पर गया। ‘मिश्र धातुओं’ के गुणों से वैज्ञानिक-जगत परिचित था ही। वैज्ञानिक जानते थे कि किस तरह कुछ तत्वों की अत्यल्प मात्रा की मिलावट धातुओं के गुणों में आमूलचूल परिवर्तन कर देती है। इससे प्रेरित हो कर उनका ध्यान उन ‘दुर्लभ धातुओं’ के अनुप्रयोग पर गया जो अब तक प्रयोग के लिये ध्यान से वंचित रही थीं। जब इनको लेकर प्रयोग किये गये तब वैज्ञानिक उनमें उभरे नये गुणों को देख कर अचंभित रह गये। इन पदार्थों के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में ‘प्रभावी कमी’ की संभावना ने आशा की किरण जगा दी। इस तरह ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने का बेहतर तरीका सामने आ गया। इसके बाद इन दुर्लभ धातुओं का उपयोग कर विभिन्न कार्यों के लिये कई नये-नये पदार्थ तैयार किये जाने लगे जिनके यथोचित तकनीकी अनुप्रयोगों ने कई क्षेत्रों में गुणवत्ता, उच्च ऊर्जा-दक्षता और बेहतर परफार्मेंस देने वाली प्रौद्योगिकियों को विकसित करने के लिये वैकल्पिक रास्ते सुझा दिये।
विकास की मांग को ध्यान रखते हुए वैज्ञानिकों को रासायनिक तत्वों के नये-नये गुण नजर आने लगे हैं। इन गुणों के प्रकट होने से ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ के विकास में ‘आवर्त सारिणी’ के कई रासायनिक तत्वों ने अपनी नई भूमिका प्रस्तुत की है। इनमें ‘दुर्लभ धातुएं’ प्रमुख हैं। ‘दुर्लभ धातुओं’ में ‘रेअर अर्थ’ भी शामिल हैं। इनमें से अधिकतर भारी धातुएं हैं जो प्लेटिनम, सोने और सीसे के समान हैं। इनकी संख्या 15 है। इनमें ग्रीन टेक्नॉलॉजी की दृष्टि से महŸवपूर्ण स्केंडियम तथा इट्रियम नामक दो हल्की धातुएं भी शामिल हैं। वास्तव में देखा जाये तो आज ये धातुएं दुर्लभ नहीं हैं। लेकिन खोज के समय इन्हें सचमुच ही ‘दुर्लभ’ समझा गया था। अतः इन्हें और इन्हीं के समान कुछ और धातुओं को ‘रेअर अर्थ’ नाम से वर्गीकृत किया गया था। यह नाम आज भी प्रचलन में है। हालांकि वर्तमान सर्वे बताते हैं कि सोने या प्लेटिनम जैसी धातुओं की तुलना में ये कई गुना अधिक मात्रा में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हैं तथा उपयोग हेतु खनन की जा रही हैं। ये ज्वालामुखीय चट्टानों के कटाव (मतवेपवद) तथा अपक्षय से मिलने वाले पदार्थ के साथ निकलती हैं ठीक उसी तरह जिस तरह कछार की मिट्टी में सोना मिलता है। ये लोहे, ताम्बे और सोने की खदानों के बाइप्रॉडक्ट (उपोत्पाद) के रूप में भी मिलती हैं। अतः आज के परिप्रेक्ष्य में इन्हें ‘दुर्लभ’ नहीं कहा जा सकता है। 
‘ग्रीन टैक्नॉलॉजी’ के विकास में लगभग 50 तरह की धातुएं प्रमुख रूप से उपयोग में लाई जाती हैं। सन् 1960 में कम्प्यूटर में प्रयुक्त होने वाली ‘इन्टेल’ की ‘माइक्रोचिप’ सिर्फ 15 तत्वों पर निर्भर थी। आज ग्रीन टेक्नॉलॉजी को अपनाते हुए वह 60 पर निर्भर है जिनमें रेअरअर्थ के साथ इन्डियम और गेलियम भी शामिल हैं। इनमें से कई धातुएं तो ऐसी हैं जिनके बारे में सामान्यजन तो जानते तक नहीं हैं। इनके नाम भी अजीब हैं। उदाहरण के लिये इट्रियम, लेंथेनम, सिरियम, प्रेज़िऔडिमियम, निओडिमियम, प्रोमिथियम, सेमेरियम, यूरोपियम, गोडोलिनियम, टर्बियम, डायस्प्रोजियम, होल्मियम, इर्बियम, थूलियम, इटरबीयम, ल्यूटेटियम आदि कुछ ऐसे ही नाम हैं। आज इन्हें ‘टेक्नॉलॉजीकल परफार्मेंस इम्प्रूवर’ के नाम से जाना जाता है। इनका प्रयोग वहाँ सर्वाधिक महŸवपूर्ण होता है, जहाँ बड़े पैमाने पर ऐसी मशीनों का निर्माण होता हो जो अत्यधिक ऊर्जा की खपत करती हों तथा जिनमें प्रयुक्त घटकों के आकार, भार और मजबूती अत्यंत विचारणीय होते हैं। बिना इन धातुओं से बने चुम्बकों के उपयोग से ‘एअर-कंडीशनर’ जैसी मशीनें अधिक विद्युत खपत करती हैं। अधिक विद्युत खपत का होना यानि अधिक कार्बन डाईआक्साईड का उत्सर्जन होना। इसे कम करने के लिये वैज्ञानिकों ने मशीनों को ही ‘ग्रीन’ बनाने पर जोर दिया। इन्हें ‘ग्रीन’ बनाने के लिये उपर्युक्त वर्णित धातुओं का यथोचित उपयोग विशिष्ट गुण-धारक पदार्थों के विकास हेतु किया जाने लगा है। इस तरह ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की समस्या से निपटने के लिये ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ में हमारा प्रवेश एक शुभ संकेत साबित हुआ। इस टेक्नॉलॉजी से हम ऐसी बड़ी से बड़ी विण्ड टरबाइन, सोलर पैनल, शक्तिशाली चुम्बक और छोटी से छोटी कम्प्यूटर चिप बना सकते हैं जो ऊर्जा-दक्ष और पर्यावरण हितैषी होती है। अतः इन दुर्लभ धातुओं पर आधारित ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’को अपनाना आज की जरूरत है। ऐसा करने पर ही हम टिकाऊ विकास का लक्ष्य हासिल करने में सफल हो सकते हैं। जब इन धातुओं की अत्यल्प मात्रा का साधारण धातुओं के साथ योग कराया जाता है तो ये इनमें कई असाधारण और मूल्यवान गुण पैदा हो जाते हैं। ‘फॉस्फर्स’ में इट्रियम तथा अन्य दूसरी दुर्लभ धातुओं को मिलाने पर जो नये फॉस्फर्स तैयार होते हैं उन्हें सी.एफ.एल. और एल.ई.डी. बल्बों में प्रयुक्त करने से नयनाभिराम रंगों की उŸपŸिा होती है। गैलियम, इंडियम और टेलूरियम का उपयोग ‘थिन-फिल्म फोटोवोल्टाइक पैनल’ बनाने में किया जाता है। नियोबियम एक ऐसी धातु है जो स्टील को मजबूती प्रदान करती है। इससे हल्के और ईंधन-दक्ष वाहनों के निर्माण में मदद मिलती है। इसके प्रचलन में आने से वर्तमान में वाहन निर्माण के लिये प्रयुक्त होने वाले ‘स्टील’ की मात्रा में निश्चित-कमी होने लगी है। जैसे-जैसे स्टील की मांग और कम होने लगेगी, वैसे-वैसे स्टील का उत्पादन भी कम होने लगेगा तथा इन उद्योगों के कारण पर्यावरण में घुलने वाला कार्बन भी कम हो सकेगा। यह ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक ताप) को रोकने की दिशा में एक बड़ा कारगर कदम साबित होगा। ज्ञातव्य हो कि वर्तमान में इन स्टील उद्योगों से करीब 2.5 गीगाटन कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जित होती है।
वर्तमान में हर उस टेक्नॉलॉजी को ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ में बदलने की दिशा में कार्य चल रहा है जो ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में अपना योगदान दे सकते हों। वैज्ञानिकों के विचार क्षेत्र से ऊर्जा, संचार, यातायात सहित कोई क्षेत्र छूटा नहीं है। आज ऊर्जा-दक्ष इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स, शक्तिशाली चुम्बक, विण्ड टरबाइन, सोलर पेनल, एअरक्राफ्ट और हाइब्रिड कारों के लिये ‘स्मार्ट-पदार्थ’ चाहिये। इन पदार्थों को तैयार करने में दुर्लभ धातुओं का उपयोग होता है। अतः ये धातुएं अत्यंत महŸवपूर्ण धातुएं बन कर सामने आई हैं।

लिथियम में ऐसे पदार्थों को बनाने अतुलनीय क्षमता है जो विद्युत को कम से कम जगह और भार में अधिक से अधिक मात्रा में भंडारित कर सकते हैं। स्ट्रेटेजिक महŸव के पदार्थों में एंटीमनी, बैरिलियम, कोबाल्ट, फ्लोरस्पार, गैलियम, जर्मेनियम, ग्रेफाइट, इंडियम, मैग्नेशियम, नियोबियम, प्लेटिनम समूह की धातुएं, रेअर अर्थ तत्व, टेंटेलम और टंगस्टन शामिल हैं।


इन धातुओं को प्राप्त करने में बहुत सारी केमिस्ट्री तथा नवाचारी तकनीकें लगती हैं। कुछ ऐसी भी खदानें हैं जहाँ से इन्हें खनन द्वारा प्राप्त किया जाता है, वहाँ रेडियोधर्मी  थोरियम होता है। ऐसी खदानों से खनन के समय अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। जरा सी भी लापरवाही वहाँ काम कर रहे श्रमिकों के स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती है। इसीलिये पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुँचाये, इन्हें शुद्ध रूप में प्राप्त करना बहुत श्रमसाध्य और महंगा साबित होता है। लेकिन ग्रीन टेक्नॉलॉजी के विकास में इनके महत्त्व को देखते हुए इन्हें प्राप्त करने की तकनीक में लगातार नवाचार किया जा रहा है। उन नवाचारों पर ध्यान दिया जा रहा है जो समाज को स्वीकार्य हों तथा प्रकृति के साथ हमारे संतुलन को बिगड़ने नहीं देते हों। कुछ बेशकीमती धातुओं में लिथियम भी शामिल है। लिथियम में ऐसे पदार्थों को बनाने अतुलनीय क्षमता है जो विद्युत को कम से कम जगह और भार में अधिक से अधिक मात्रा में भंडारित कर सकते हैं। स्ट्रेटेजिक महŸव के पदार्थों में एंटीमनी, बैरिलियम, कोबाल्ट, फ्लोरस्पार, गैलियम, जर्मेनियम, ग्रेफाइट, इंडियम, मैग्नेशियम, नियोबियम, प्लेटिनम समूह की धातुएं, रेअर अर्थ तत्व, टेंटेलम और टंगस्टन शामिल हैं। इन धातुओं की खपत की दर 7.6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही है। इसका मतलब हुआ कि यह प्रति दशक के हिसाब से दुगुनी होगी।
‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ से उत्पादों को प्राप्त करने के लिये अन्य उद्योगों की तुलना में ‘इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों’ में दुर्लभ धातुओं की कम मात्रा में जरूरत पड़ती है। एक इलेक्ट्रॉनिक गजट में कुछ ग्राम दुर्लभ धातुओं की आवश्यकता होती है, जबकि कार जैसे वाहनों में यह मात्रा कुछ किलोग्राम तथा विण्ड टर्बाइन में यह क्विंटल तक पहुँच जाती है। हाइब्रिड कार में प्रयुक्त चुम्बक और बैटरी के इलेक्ट्रोड में करीब 2 किलोग्राम रेअर-अर्थ धातुओं का उपयोग होता है। सोलर पेनल की ही बात करें तो पतले और सस्ते पेनल बनाने के लिये टेलुरियम आवश्यक होता है। यह अर्थक्रस्ट (धरती के सबसे बाहरी ठोस आवरण) का मात्र 0ण्0000001 प्रतिशत ही है। यह इसे सोने की तुलना में लगभग तीन गुना दुर्लभ बनाता है। उच्च कार्य निष्पादन के लिये आवश्यक बैटरी तथा ऊष्मारोधी ग्लास और सिरामिक, एअरक्राफ्ट के लिये मजबूत और हल्की मिश्रधातु के निर्माण आदि में लिथियम का उपयोग होता है। यह धातु दक्षिण अमरीका के पश्चिमी भाग में फैली एण्डिस पर्वतमाला के क्षेत्र में मिलती है। यही कारण है कि चिली और अर्जेंटिना इसके प्रमुख उत्पादक देश हैं। एक ऑकलन के अनुसार विश्व में इसका भंडार करीब 230 लाख टन के बराबर ही है। ‘फ्यूल सेल’ के लिये प्लेटिनम का प्रयोग होता है। इसका अधिकांश उत्पादन दक्षिण अफ्रीका में होता है। टर्बियम और यूरोपियम का उपयोग प्रतिदीप्त (फ्लोरेसंट) बल्ब के निर्माण में होता है। वैसे आज एल.ई.डी. बल्ब का प्रचलन बढ़ रहा है जिससे इस क्षेत्र में इन धातुओं की जरूरत कम पड़ने लगी है। नियोडिमियम का उपयोग शक्तिशाली और हल्के चुम्बक के निर्माण में किया जाता है जो विद्युत इंजन चलाने में प्रयुक्त होते हैं। पवन ऊर्जा के दोहन के लिये भी इनका उपयोग होता है। ‘डायरेक्ट ड्राइव टर्बाइन’का निर्माण हुआ है जिनका आज प्रचलन बढ़ा है। इनके प्रचलन में आने से पवन ऊर्जा से विद्युत प्राप्त करने की लागत कम हुई है तथा तकनीक की विश्वसनीयता बढ़ी है। स्मार्ट फोन में प्रयुक्त ‘इयरबड्स’ (कान में लगाने वाले स्पीकर्स) में भी हल्के चुम्बक प्रयुक्त होते हैं। सौर तथा पवन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के प्रचलन में आने से जीवाश्म आधारित थर्मल पॉवर प्लांट्स की संख्या में कमी आई है। इसतरह ग्रीन टेक्नॉलॉजी को अपना कर ग्लोबल वार्मिंग के आसन्न संकट से निजात पाई जा रही है।
अब लोगों में पर्यावरणीय चेतना की अभिवृद्धि होने लगी है। लोग भी आसन्न संकंट को महसूस करने लगे हैं और इसी कारण वे ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ की तरफ आकृष्ट होने लगे हैं। इससे ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ के ‘स्टार रेटेड उत्पादों’ की मांग बढ़ने लगी है। बढ़ती मांग की पूर्ति के लिये ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ के विस्तार की आवश्यकता है। इसके विस्तार के लिये इन धातुओं की मांग बढ़ने लगी है। लेकिन इसके विस्तार में बड़ी बाधा दुर्लभ धातुओं के रूप में आवश्यक कच्चे माल की निर्बाध आपूर्ति की है।
इनकी आपूर्ति के लिये या तो पुरानी खदानों की क्षमता को बढ़ाना या फिर नई खदानों की तलाश करना आवश्यक है। एक विकल्प और है। वर्तमान प्रौद्योगिकी और प्रचलित प्रक्रियाओं से इन धातुओं का मात्र 65 प्रतिशत ही प्राप्त किया जा सकता है। अगर वर्तमान प्रौद्योगिकियों और प्रचलित प्रक्रियाओं में नवाचार अपनाते हुए इसे 75 प्रतिशत तक पहुँचा दिया जाये तो आपूर्ति में एकदम सुधार आ सकता है। इसके लिये वैज्ञानिक प्रयास आरंभ हो चुके हैं। वैज्ञानिक कम्प्यूटर की सहायता से ऐसे अणुओं को तलाश रहे हैं जो इन धातुओं के साथ बंध बना सकें। इन दुर्लभ धातुओं की ‘रिसाइकलिंग’ पर भी जोर दिया जा रहा है। विश्व में ‘सेल फोन’ से लगा कर ‘रेफ्रिजरेटर’ से करीब 490 लाख टन का ‘ई-वेस्ट’ प्रति वर्ष पैदा होता है। ‘ई-वेस्ट’ शहरों को इन दुर्लभ धातुओं की खदानों में बदल रहा है। अतः ‘अर्बन माइनिंग’ के रूप में एक नया स्रोत हाथ लगा है। सन् 2009 तक मात्र एक प्रतिशत ही ये धातुएं रिसाइकल (पुनः चक्रित) हो पा रही थीं। अब करीब 10 प्रतिशत हो रही है लेकिन यह भी अत्यंत कम है। आज सेलफोन के रूप में मिलने वाले ई-वेस्ट में ही करीब 32 टन सोना है। इस तरह हमारे ई-वेस्ट के ये ढ़ेर वास्तव में सोने की खदानें हैं। लेकिन प्राकृतिक खदानों से इन्हें निकालना आसान है बनिस्बत ई-वेस्ट के रूप में उपलब्ध इन खदानों से। पर्यावरण की दृष्टि से यह कार्य बहुत जोखिम भरा भी है। भूतल में स्थित जल के प्रदूषित होने की संभावना भी हमेशा बनी रहती है। चीन और नाइजेरिया जैसे देशों में श्रमिक सस्ते में मिल जाते हैं और बगैर अतिरिक्त सावधानी के अनियंत्रित तरीके से ई-वेस्ट से धातुओं को प्राप्त करने के लिये इन्हें जलाते हैं जिससे आसपास की वायु अत्यधिक प्रदूषित और जहरीली हो जाती है और इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिये स्वास्थ्य संबंधी खतरे उत्पन्न हो जाते हैं। एक सर्वे में चीन में बच्चों में लेड की मात्रा का अधिक पाया जाना इसका चिंतित कर देने वाला उदाहरण है। हालांकि जापान ने इस मामले में नियंत्रित तरीके से स्वचालित व्यवस्था करने में महारत हांसिल की है और आसन्न पर्यावरणीय खतरों से निजात पाने में सफलता पाई है।
वैज्ञानिकों को एक और नवाचारी रास्ता नजर आ रहा है। वे चाहते हैं कि ऐसा कुछ किया जाये जिससे कि ‘ग्रीन टेक्नॉलॉजी’ का विकास इन दुर्लभ धातुओं की सहायता के बिना ही होने लग जाये। वैज्ञानिक दुर्लभ धातुओं के विकल्प को खोजने की दिशा में सक्रिय हैं। वैसे यह असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। लेकिन वैज्ञानिक आशांवित हैं। आखिर ‘पाषाण युग’ के बाद जब ‘ताम्र युग’ आया था तब ताम्बे की खपत बढ़ने लगी थी और खदानों से इसकी आपूर्ति में कठिनाई आने लगी तब ताम्बे के रिसाइकलिंग के विचार ने मूर्त रूप लिया। इस बीच शोध चलते रहे और फिर करीब 200 साल में बहुतायात में उपलब्ध लोहा विकल्प बन कर सामने आया। यही स्थिति इन दुर्लभ धातुओं के विकल्प को लेकर वर्तमान में है। आज वैश्विक स्तर पर ‘मिनरालॉजी’ (खनिज विज्ञान) और ‘मटेरियल साईंस’ (पदार्थ विज्ञान) के क्षेत्र में विशेष अनुसंधान कार्य चल रहे हैं।
इन दुर्लभ धातुओं के गुणों और शक्तियों का पता लगाने तथा इनकी निर्बाध पूर्ति के साथ ही इनके विकल्प खोजने के लिये आयोवा स्टेट यूनिवर्सीटी में डिपार्टमेंट ऑफ इनर्जी के अंतर्गत ‘दी एम्स लेबोरेट्रीरीज’ में ‘क्रिटिकल मटेरियल इंस्टीट्यूट’ को जून 2013 में स्थापित किया गया है। लेकिन, जब तक हमें और बेहतर विकल्प न मिले तब तक हमें विकास की दर को बनाये रखते हुए धारणीय विश्व के लिये इन दुर्लभ धातुओं पर आधारित ग्रीन टेक्नॉलॉजी के उपयोग को लगातार बढ़ाते ही रहना होगा।

kapurmaljain2@gmail.com