तकनीकी

(20/Oct/2015)

कलाम से जुड़े कुछ अविस्मरणीय प्रसंग

सुभाष चंद्र लखेड़ा

यूँ तो डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम इस प्रसंग की चर्चा अपनी पुस्तकों, लेखों और सार्वजनिक मंचों पर कई बार कर चुके थे लेकिन इस घटना की चर्चा जब भी की जाए, मन हर्ष और उल्लास से ओत-प्रोत हो जाता है। स्वयं डॉ. कलाम का यह मानना था कि इस घटना ने उनके जीवन दर्शन को कहीं बहुत गहराई से प्रभावित किया था। सन 1973 में डॉ. कलाम को भारत के ‘प्रथम उपग्रह प्रमोचन या कार्यक्रम’ परियोजना का निदेशक नियुक्त किया गया था। इस परियोजना का उद्देश्य सन 1980 तक भारत के ‘रोहिणी’ नाम से तैयार किए जा रहे उपग्रह को उसकी कक्षा में पहुँचाना था।
इस उपग्रह को प्रमोचित करने के लिए तैयार किए गए रॉकेट एस.एल.वी 3 की प्रथम परीक्षण उड़ान 10 अगस्त 1979 को हुई। रॉकेट लक्ष्य की ओर बढ़ा तो जरूर किंतु निर्धारित कक्षा में पहुँचने के बजाय बंगाल की खाड़ी में गिरकर नष्ट हो गया।
इस अवसर पर जो प्रेस कॉन्फ़्रेन्स आयोजित की गई थी, उसमें दुनिया भर से पत्रकार आये हुए थे। कार्यक्रम की विफलता की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए प्रो. सतीश धवन ने परियोजना से जुड़े सभी वैज्ञानिकों और दूसरे कार्मिकों द्वारा किए परिश्रम की सराहना की। उन्होंने उपस्थित पत्रकारों को यह जानकारी भी दी कि खामियों को दूर कर अगले वर्ष तक इस रॉकेट का प्रमोचन सफलतापूर्वक किया जा सकेगा। डॉ. कलाम प्रो. धवन के इस गुण का उल्लेख इसलिए बार-बार करते थे क्योंकि परियोजना निदेशक के नाते कार्यक्रम के असफल होने की जो जिम्मेदारी उनके ऊपर आती थी, उसे प्रो धवन ने अपने ऊपर ले लिया था। बहरहाल, एस.एल.वी.3 की दूसरी प्रायोगिक उड़ान 18 जुलाई 1980 को हुई। इस बार उड़ान सफल रही और भारत अंतरिक्ष क्लब का छठा सदस्य बन गया।  इस बार प्रो. धवन ने प्रेस कॉन्फ़्रेन्स को संबोधित करने का कार्य डॉ. कलाम को सौंपा। उनका कहना था कि यह तुम्हारी टीम की सफलता है। तुम लोग इस सफलता के हकदार हो। कहने की जरूरत नहीं, ‘असफलता मेरी, सफलता तुम्हारी’ वाली प्रो. सतीश धवन की इस सोच को डॉ. कलाम ने अपने जीवन में उतार लिया था। वे जब तक जीवित रहे, इस सोच का इस्तेमाल कर अपने से कनिष्ठ लोगों को प्रोत्साहित करते रहे। अपने कनिष्ठ साथियों के साथ डॉ. कलाम ने तत्पश्चात जीवन पर्यन्त कैसा व्यवहार किया, इस तथ्य को यहाँ दी जा रही एक घटना से आसानी से समझा जा सकता है। उन दिनों उस महत्वपूर्ण परियोजना पर सत्तर वैज्ञानिक कार्य कर रहे थे। वे सभी कार्य के दबाव और परियोजना प्रमुख यानी अपने बॉस के कार्य प्रति अत्यधिक समर्पण की भावना से यूं तो यदाकदा खिन्न हो उठते थे किन्तु वे सभी अपने इस बॉस के प्रति निष्ठा रखते थे और उस परियोजना का हिस्सा बना रहना चाहते थे। बहरहाल, एक दिन एक वैज्ञानिक अपने इस बॉस के पास जाकर बोला, ‘सर, मैंने अपने बच्चों से वादा किया है कि आज मैं उन्हें यहां कुछ दूर पर लगी प्रदर्शनी दिखाने ले जाऊंगा। मुझे आज शाम साढ़े पांच बजे जाने की अनुमति देकर अनुगृहीत करें।’ बॉस ने जवाब दिया, ‘ठीक है। आज तुम जल्दी जा सकते हो।’ वह वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में वापस आकर किसी कार्य में जुट गया। उस कार्य को संपन्न करने के बाद उसे याद आया कि आज तो उसे जल्दी जाना था। हाथ पर बंधी घड़ी में समय देखा तो शाम के साढ़े आठ बज चुके थे। बुझे मन से जब वह बॉस के कमरे की तरफ गया तो वे वहां नहीं थे। उसने अपना  कमरा बंद किया और अपने घर के लिए रवाना हो गया।
जब वह घर पहुंचा तो उसने देखा कि उसकी पत्नी बैठक में सोफे पर किसी पुस्तक को पढ़ने में तल्लीन थी। उसकी पत्नी ने पूछा, ‘क्या आप काफ़ी पीना चाहेंगे या मैं सीधे खाना लगा दूं?’
उसने थोड़े दबे और बुझे हुए स्वर में कहा, ‘अगर तुम चाहो तो हम दोनों फ़िलहाल काफ़ी पी लेंगे किन्तु बच्चे कहां हैं?’ उसकी पत्नी बोली, ‘तुम्हारे बॉस यहां सवा पांच बजे आये थे और वे बच्चों को प्रदर्शनी दिखाने के लिए अपने साथ ले गए हैं।’ दरअसल, हुआ यूं कि जब बॉस ने इस वैज्ञानिक को पांच बजे के आसपास तल्लीनता से कार्य करते देखा तो उन्हें लगा कि अब वह इस कार्य को पूरा किए बिना नहीं छोड़ेगा। उन्हें याद था कि इस वैज्ञानिक के बच्चों को तो आज प्रदर्शनी देखनी है। वे तुरंत उस वैज्ञानिक के घर गए और बच्चों को प्रदर्शनी दिखाने ले गए। बहरहाल, ऐसा हमेशा तो संभव नहीं हो सकता है किन्तु कभी यदि ऐसा हो जाए तो ऐसे बॉस के प्रति हमेशा के लिए कृतज्ञता का भाव बना रहता है। यही कारण था जिसकी वजह से ‘थुम्बा इक्वाटोरिअल रॉकेट लाँचिंग स्टेशन’ में कार्यरत सभी वैज्ञानिक अपने इस बॉस का अत्यधिक सम्मान करते थे। उन दिनों इन वैज्ञानिकों के बॉस कोई और नहीं, डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम थे।
डॉ. अब्दुल कलाम बड़ी सी बड़ी बात को भी सामने मौजूद इंसान को आसानी से समझा देते थे। यह घटना सन 1992 की है। इस वर्ष डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुए थे। दरअसल, इस पद पर रहते हुए वे डीआरडीओ की सभी प्रयोगशालाओं के प्रमुख थे। एक दिन हमें सूचना मिली कि कल हमारे संस्थान ‘डिफेन्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ फिजिओलोजी एंड अलाइड साइंसेज ( डिपास )’ में डॉ. कलाम का दौरा है। तब हमारी यह प्रयोगशाला दिल्ली कैंट में थी। फलस्वरूप, हम सब लोग उनकी विजिट की तैयारियों में जुट गए। चूंकि यह उनका पहला दौरा था, सभी अधिकारी और कर्मचारी सुबह से ही सफाई में जुट गए। सफाई कर्मी भी फुर्ती से  इधर-उधर से कूड़ा-कचरा साफ़ कर उसके ढ़ेर बनाने लग गए। दोपहर तक कूड़े के ढेर जगह-जगह बनाए जा चुके थे और अब दोपहर बाद उन्हें वहां से हटाकर ऐसी जगह इक्ट्ठा करना था जहाँ से उन्हें फिर एक ट्रक में भरवा कर बाहर भेजा जा सके। कल कलाम साहब के आने तक सभी कुछ साफ़-सुथरा होना चाहिए-ऐसा हम सभी का उद्देश्य था। अभी लंच होने में कुछ वक्त शेष था कि प्रयोगशाला में हड़कंप मच गया।
दरअसल, कलाम साहब कल के बजाय आज ही अपने दौरे पर आ गए थे। खैर, अब क्या हो सकता था? उनके इस अचानक आगमन से सब सहमे हुए थे। उनकी अगवानी करने वाले एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने जब उनसे कहा, ‘सर, हमें तो यह बताया गया था कि आप कल आने वाले हैं’ तो वे मुस्कराते हुए बोले, ‘मैं सोचता हूँ कि यह मेरी प्रयोगशाला है और मैं यहाँ कभी भी आ सकता हूँ।’
आज डॉ. कलाम सशरीर हमारे बीच मौजूद नहीं हैं किन्तु उनसे जुड़े निजी प्रसंगों को मेरा जैसा साधारण इंसान भला कैसे भूल सकता है? यह मेरा सौभाग्य रहा कि एक रक्षा वैज्ञानिक होने की वजह से मुझे उनसे मिलने के मौके मिलते रहे। मुझे एक विशेष मौका तब मिला जब  सन 1997 में दिल्ली विष्वविद्यालय में आयोजित 84वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दौरान मैंने उन्हें अपनी पुस्तक ‘खेल, खिलाड़ी और विज्ञान’ भेंट की। पुस्तक पर चर्चा करने से पहले उन्होंने डीआरडीओ के फोटोग्राफर को उस क्षण को कैमरे में कैद करने के लिए कहा। वे जानते थे कि मेरे लिए उनके साथ लिया जाने वाला वह फोटोग्राफ संग्रहणीय होगा। वे उस समय रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार थे। तत्पश्चात, उन्होंने मुझसे अंग्रेजी में पूछा, ‘मुझे एक वाक्य में बताओ कि हम खेलों में सफल कैसे हो सकते हैं? ‘मुझे समझ नहीं आया कि मैं एक वाक्य में क्या कहूँ ? मुझे खामोश देख वे हँसते हुए बोले, ‘हमारे खिलाडियों को आक्रामक होना होगा।’
दरअसल, वे स्वभाव से सदैव एक शिक्षक की भूमिका निभाते रहे। उनके साथ विगत कुछ वर्षों से जुड़े उनके एक करीबी सहयोगी सृजन पाल सिंह के अनुसार कलाम साहब की दिली इच्छा थी कि लोग उन्हें एक शिक्षक के रूप में याद करें। श्री सृजन पाल सिंह के अनुसार अपनी शिलांग यात्रा के दौरान कलाम साहब पंजाब में हुए आतंकी हमलों से काफी परेशान थे। जान-माल के नुकसान से वो काफी व्यथित थे। चूंकि शिलांग में उनका लेक्चर का टॉपिक ‘धरती को रहने लायक कैसे बनाया जाये’ था तो उन्होंने पंजाब के हमलों को इससे जोड़ते हुए कहा की ‘ऐसा लगता है की मानव के दुष्कृत्य, प्रदूषण की तरह धरती को खत्म करने में सहायक होंगे।’ यह पूछने पर अगर ऐसी हरकतें होती रहीं तो मानव को धरती से खत्म होने में कितना समय लग जायेगा, इस पर उन्होंने कहा की ‘ज्यादा से ज्यादा 30 साल, और आप युवा लोगों कुछ करना चाहिए इस संबंध में। ये आपका भविष्य है।’
शिलांग की उनकी इस अंतिम यात्रा में एक ऐसी घटना भी घटी जिससे कलाम साहब के मानवतावादी पक्ष को गहराई से समझा जा सकता है। गुवाहाटी से शिलांग जाते समय रास्ते में कलाम साहब के काफिले में 6-7 गाडिय़ां थीं। सृजन पाल सिंह कलाम साहब के साथ थे। उनकी गाड़ी के ठीक आगे वाली खुली जिप्सी पर तीन जवान थे। जिप्सी पर दो जवान बैठे हुए थे और उनका तीसरा साथी जवान खड़ा था। कलाम साहब ने सिंह से पूछा कि ‘वह जवान खड़ा क्यों है? ऐसे तो वह थक जाएगा। यह सजा की तरह है। उसे बैठने के लिए कह दो।’
कलाम साहब के कहने पर सृजन पाल सिंह ने ‘वॉकी-टॉकी’ से उस जवान को संदेश देने की कोशिश की लेकिन वह उपकरण ढंग से काम नहीं कर रहा था। अगले डेढ़ घंटे के सफर में कलाम साहब ने सिंह को दो-तीन बार याद दिलाया कि जवान से बैठने के लिए कहो। शिलांग पहुँचने पर डॉ. कलाम ने उनसे कहा कि वे जवान से मिलकर उसका शुक्रिया अदा करना चाहते हैं।
आईआईएम शिलांग पहुंचने के बाद डॉक्टर कलाम ने जवान से हाथ मिलाया और उससे पूछा कि क्या तुम थक गए हो, कुछ खाना चाहोगे? कलाम साहब ने कहा कि मेरे कारण तुम्हें खड़ा रहना पड़ा मैं इसके लिए माफी चाहता हूं। कलाम साहब की बात सुनकर वह युवा जवान आश्चर्यचकित हो गया। उस जवान ने जवाब में विनम्रतापूर्वक जो बात कही, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि डॉ. कलाम देश के सभी लोगों के दिलों में रच-बस चुके थे। उस जवान ने कहा था, ‘सर, आपके लिए मैं तीन घंटे क्या, छह घंटे भी खड़ा रह सकता हूं।’


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