तकनीकी

(22/May/2015)

नवाचार के बढ़ते क़दम

प्रेमचंद्र श्रीवास्तव

वर्तमान में समाज में लड़कियों को लड़को द्वारा बुरी नज़र देखने अथवा उनसे छेड़-छाड़ अथवा उन्हें स्पर्श करने की घटनाएँ प्रतिदिन सुनने में आती रहती हैं। ऐसी घटनाओं से विक्षुब्ध होकर अंजली ने एक नवाचार कर डाला। चूॅँकि उपरोक्त घटनाएँ अचानक घटित होती हैं इसलिए प्रतिरोध करने का समय ही नहीं रहता है। अंजली इंजीनियरिंग द्वितीय वर्ष की बीस वर्षीय छात्रा हैं और उन्होंने एक ऐसा उपकरण तैयार किया है जिससे आक्रमणकारी झटका खा जायेगा और दोबारा कुछ करने का साहस नहीं कर पायेगा। अंजली का यह हथियार एक जोड़ी दास्ताना है। देखने में तो ये दास्ताने साधारण से ही दिखते हैं,किन्तु इसमें अंगूठे के पास एक स्विच लगा रहता है। यह स्विच एक 3ण्7 बोल्ट की बैटरी से जुड़ा रहता है। जब सक्रिय किया जाता है तब विद्युत धारा एक सर्किट (परिपथ) से होकर प्रवाहित होकर धातु की प्लेट तक पहुँच जाती है। धातु की प्लेटें प्रत्येक अंगुली की छोर पर लगी होती है, इससे छूने वाले को झटका/धक्का (शाक) लगता है। इस कारण छूने वाला कुछ कदम दूर धकेल दिया जाता है। प्रायः लड़के भीड़-भाड़ की जगहों में लड़कियों का हाथ पकड़ लेते हैं। इसलिए अंजली कहती हैं-मैं लड़कों को उपयुक्त उत्तर देना चाहती हॅूँ।  इस इलेक्ट्रॉनिक दास्ताने को बनाने में 800 रूपयों का खर्च बैठता है और इस दास्ताने की बाहरी सतह पर ही सब कुछ लगा रहता है इसलिए पहनने वाले को कोई असुविधा नहीं होती है । बैटरी को 4 घंटों तक चार्ज करने के बाद बैटरी को 4 महीनों तक चार्ज नहीं करना पड़ता है। अंजली के संस्थान के अध्यक्ष श्याम चौरसिया का कहना है कि इस दास्ताने में अभी और सुधार की गुंजाइश है। अभी यह नवाचार प्राथमिक अवस्था में हेै। विद्युत्धारा एक व्यक्ति को धक्का देने में सक्षम तो है किन्तु व्यक्ति के ऊपर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है। अंजली आशावान हैं कि यदि सरकारी सहायता प्राप्त हो जाये तो इस दास्ताने को लड़कियों के लिए उनके स्कूल और कालेजों में बेंचा जा सकता है। आवश्यकता है ऐसे नवाचार को प्रोत्साहन देने की ।

अंजली और उनकी मित्र और सहपाठी दीक्षा ने एक और आश्चर्यचकित करने वाली एक युक्ति बनाई है जो आवश्यकता पड़ने पर लड़कियों की सलवार या डेनिम को बलात्काररोधी पहनावे में बदल देती है। पहनावें के अंदर एक मोबाइल फोन जैसी युक्ति लगी होती है और जैसे ही ख़तरनाक स्थिति उत्पन्न होती है, जिपर के निकट एक बटन को दबाया जा सकता है जिससे स्वतः पूर्व निर्धारित फोन नम्बरों से संकेत निकलने लगते हैं कि उपरोक्त विशेष पहनावे को पहनने वाली लड़की ख़तरे में है । इस लड़की के नज़दीक/आसपास जो लोग भी होंगे उन्हें फोन काल सुनाई देने लगेगा। इस युक्ति में एक मोबाइल फोनचिप, एक बैटरी और एक माइक्रोफोन होता है। इसके अतिरिक्त एक लाल रंग का स्विच भी होता है। यह एक सेलफोन की भाँति कार्य करता है और एक सिमकार्ड ;ेपउ बंतकद्ध की आवश्यकता होती है । बटन के साथ यह सुविधा होती है कि एक या एक से अधिक नम्बरों पर काल किया जा सकता है। हाँ यदि नेटवर्क न हो तो जुड़ाव ;बवददमबजपअपजलद्ध का अभाव हो तो ऐसी स्थिति में 100 नम्बर पर कई बार प्रयास करके पुलिस सहायता की अपेक्षा की जा सकती है । दीक्षा और अंजली इसे ‘बाकी-टाकी जीन्स’ कहती हैं इस संस्थान के उपाध्यक्ष (वाइस चेयरमैन) अमित मौर्य कहते हैं- हमारे शोध और विकास विभाग में हम इस प्रकार के नवाचारों (इन्नोवेशन) के लिए विद्यार्थियों को सभी आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराते हैं। अनेक विदेशी कम्पनियों ने इस वाकी टाकी जीन्स के विषय में पूछताछ की है। फिर भी संबंधित अधिकारियों को लिख कर बताने के बावज़ू़द उत्तर नहीं मिला है । 

एक घड़े में एक फ्रिज

एक साधारण किसान के 19 वर्षीय बेटे कमलेश ने जो कार्य किया है वह अनूठा तो है ही प्रशंसनीय भी है। रुस्तमपुर नामक गाँव के इस लड़के ने सूर्यताप की शक्ति से संचालित एक फ्रिज और एक मिट््टी के घड़े के अंदर एक शीतलक को जोड़कर बनाया है। मेकैनिकल इंजीनियरिंग के इस विद्यार्थी का उद्देश्य है कि उसके द्वारा बनाया गया सस्ता उपकरण गरीबों तक पहँुॅच सके। कमलेश देश में विद्युत् की अत्यधिक खपत से भी चिंतित हैं। कमलेश के अनुसार फ्रिज और कूलर दोनों साथ साथ (समकालिक) चल सकते हैं। इस युक्ति में एक 5-वाट का सोलर प्लेट है जो मशीन को ऊर्जा देता है। घड़े के भीतर छोटे-छोटे मिट्टी के प्याले हैं जो इसे ठंडा रखते हैं। घड़े के अंदर एक डी.सी. पम्प अति शीतल जल को चक्रित करता रहता है (घुमाता रहता है) और एक घूमता हुआ पंखा दीवारों को ठंडा रखता है। यही नहीं कमलेश ने घड़े में एक वाटर फिल्टर लगाने की भी जगह ढूँढ़ ली जिसके कारण यह पूरी तरह से वाटर कूलर हो गया है । यह मिट्टी के घड़े का रेफ्रीजेरेटर मात्र 100 रू. में तैयार हो गया है। इसका एक और लाभ यह है कि घड़ा बनाने वाले कुम्हारों को अधिक काम भी मिलेगा। कमलेश की दिली इच्छा है कि वे अपने नवाचार को विश्वस्तर तक ले जायें। इस संबंध में एक शुभ समाचार यह है कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी वाराणसी आये थे तो उन्होंने ट्वीट करके कमलेश को प्रोत्साहित किया था। कमलेश आशावान हैं कि सरकारी सहायता से वे अपने नवाचार को गरीबों के लिए उपयोगी बनाने में सफल होंगे। कमलेश को बहुत-बहुत-बहुत बधाई । 

पैर चालित कपड़ा धोने की मशीन

बचपन के 2 मित्र अरविंद और दीपक ने यह देखकर इंजीनियर बनने की ठानी कि उन्होंने अपनी माताओं को हाथ से कपडा धोते हुए देखा था और उनके कष्ट को भी महसूस किया था। एक तो उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि कपड़ा धोने की बिजली से चलने वाली मशीन खरीद सकें और यदि किसी तरह खरीद भी लें तो बिजली की आपूर्ति ऐसी नहीं थी कि कपड़ा धोने वाली मशीन खरीद कर पैसा फँसाया जा सके। जब वे मेकैनिकल इंजीनियरिंग के विद्यार्थी थे उस समय उन्होंने विदेशी आविष्कार की तरह कपड़ा धोने की वैकल्पिक मशीन बना सकें। चार वर्षों की कड़ी मेहनत और अपने इंजीनियर मित्रों-कृष्ण कुमार ओझा और कृष्णा गुप्ता की सहायता से अरविन्द और दीपक ने विचार किया कि क्यों न अपने देश में बनी सायकिल द्वारा चालित कपड़ा धोने की मशीन बनाएँ। देखने में यह मशीन व्यायामशाला में व्यायाम करने वाली जैसी है,बस अंतर इतना ही है कि इसके आगे एक बाल्टी जोड़ की गई है। जब सायकिल चालक इस मशीन की पैडल मारता है तब बाल्टी के अंदर लगी बियरिंग घूमती है । ऐसा करने से बाल्टी में रखे कपड़े तेज़ी से घूमते हैं। इस मशीन से 8 बोल्ट की विद्युत्धारा उत्पन्न होती है । इतनी विद्युत् ऊर्जा किसी फोन को चार्ज करने के लिए यथेष्ट होती है-किन्तु बिजली की आवश्यकता नहीं होती है। इस मशीन को बनाने में मात्र 1400 रू. का खर्च बैठता है। मात्र आधे घंटे में (20.30 मिनट में) लगभग एक दर्जन कपड़े धुले जा सकते हैं अर्थात् जितनी जगह बाल्टी में कपड़ों के लिए है। कपड़ा धोने के साथ ही साथ व्यायाम भी हो जाता है। ये सभी चारों नवाचारी प्रशंसा के पात्र हैं। मौर्य ;डंनतलंद्ध के अनुसार इन सभी नवाचारों का देश के विभिन्न विरूपन प्रदर्शनियों और शोध संस्थानों में प्रस्तुतिकरण हो चुका है और ‘इण्डियन इंस्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी (दिल्ली और रुड़की) द्वारा प्रशंसा भी प्राप्त कर चुके हैं। फिर भी वे संबंधित अधिकारियों के संकेतों और आर्थिक प्रोत्साहनों की प्रतीक्षा कर रहे हैं । उपरोक्त सभी नवाचार चूँकि मानवोपयोगों से जुड़े हुए है अतएव इन्हें सरकारी सहायता अवश्य मिलनी चाहिए। साथ ही कुछ निजी कम्पनियों को भी आगे आकर हर तरह से प्रोत्साहन देना चाहिए। 

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