विज्ञान

(22/May/2018)

दिमाग को बनाया ‘आइडिया लेब’

डॉ। कपूरमल जैन
 
कुछ करके दिखाने की तीव्र इच्छा, संकल्प और जुनून हो तो मोटर न्यूरॉन्स पर दिमाग का नियंत्रण धीरे-धीरे कम होते जाने और सारे शरीर के निष्क्रिय हो जाने के बावजूद शरीर के बचे एक मात्र स्वस्थ हिस्से दिमाग को ‘आइडिया लेब’ बनाया जा सकता है तथा इन्हें तार्किक आधार पर विकसित कर वर्तमान तथा पिछली सदी को समान रूप से प्रभावित करने वाले महानायक पूर्ण रूप से स्वस्थ और शारीरिक रूप से सक्रिय अलबर्ट आईंस्टीन के स्तर को छुआ जा सकता है। यह सुनने में अकल्पनीय, असंभव औरअसाध्य लगता है। लेकिन, स्टीफन विलियम हाकिंग ने अपने जीवन में इसे कल्पनीय, संभव और साध्य बना कर दिखा दिया। अपने कार्यों के बल पर उन्होंने जिस ऊँचाई को छुआ है, उसने उन्हें वैज्ञानिक इतिहास में एक ऐसा वैज्ञानिक बना दिया है, जिन पर आने वाली भावी पीढि़याँ शायद ही विश्वास कर पाये। हो सकता है कि आने वाली पीढि़याँ उन्हें ‘भगवान’ का दर्जा भी दे दे। हालांकि हाकिंग अपने को अनीश्वरवादी मानते थे। वैसे वे यह भी कहते थे कि हम जैसा चाहते हैं, वैसा मानने और विश्वास करने के लिए स्वतंत्र हैं। और, जब तक हम विज्ञान नहीं समझते हैं तब तक ब्रह्मांड की रचना के लिए भगवान पर विश्वास करना स्वाभाविक है। लेकिन, अब जब विज्ञान के पास निश्चित ही गले उतरने वाला उत्तर मौजूद हैं, ऐसे में ईश्वर की कल्पना की जरूरत नहीं है। 
उनकेे मत में किसी ने ‘ब्रह्मांड’ की रचना नहीं की और न ही कोई हमारे भाग्य को दिशा देता है। हमारे पास यह ही एक जीवन है कुछ करने तथा ‘ब्रह्मांड’ की इस वैभवशाली भव्य रचना की प्रशंसा करने के लिए एवं अनुभव लेने के लिए। अपनी इस अनुभूति को उन्होंने अपनी पुस्तक ‘दी ग्रेंड डिजाइन’ में अभिव्यक्त किया है। इस पुस्तक में वे लिखते हैं कि ‘हमारे इस ब्रह्मांड का अस्तित्व में आना तथा इसमें नाना प्रकार की घटनाओं का घटना अनंत संभावनाओं में से एक दुर्लभ संभावना के प्रकट होना है, लेकिन यह भौतिकी के मान्य नियमों के अनुसार ही संभव हुआ है’। इस पुस्तक में उन्होंने कहा है कि ‘ब्रह्मांड की अचानक उत्पत्ति ही कारण है कि यहाँ ‘कुछ नहीं’ के स्थान पर ‘कुछ’ है। इसी कारण ‘ब्रह्मांड’ अस्तित्व में है और यह ही कारण है कि हम अस्तित्व में हैं’। अतः ‘ब्रह्मांड’ के आरंभ करने के लिए तथा इसे चलाने के लिए भगवान को बीच में लाने की जरूरत नहीं। वे मानते थे कि ‘थ्योरी ऑफ एवरी थिंग’, जिसे खोजने में वे अपने सारे जीवन लगे रहे,से हम निश्चित ही भगवान के मस्तिष्क को जान सकेंगे। भले ही हाकिंग ऐसा मानते हों, लेकिन हाकिंग अपने जीवन में एक किंवदंती बने रहे। इतिहास गवाह है कि जैसे जैसे मोटर न्यूरॉन्स पर उनके दिमाग का नियंत्रण घटता गया, वैसे-वैसे उनके काम करने की गति तथा नये सिद्धांतों को गढ़ने के लिए उनमें नये-नये क्रांतिकारी आइडिया के आने की गति बढ़ने लगी, जिन्होंने उन्हें दुनियाभर में प्रसिद्ध और सेलिब्रिटी व्यक्ति बना दिया। 
१२ मानद उपाधियाँ, कम उम्र में फैलो ऑफ रॉयल सोसाइटी,  लुकासियन प्रोफेसर,एडमस प्राइज, एडिग्टन मेडल, मैक्सवेल एण्ड प्राइज, आईंस्टीन अवार्ड, डिराक मेडल, कोपले मेडल, ब्रेकथ्रू प्राइज इन फंडामेंटल फिजिक्स, अमरीका का सर्वोच्च सम्मान प्रसिडेंशिल मेडल ऑफ फ्रीडम, रशियन स्पेशियल फंडामेंटल फिजिक्स प्राइज आदि जैसे सम्मान उनसे जुड़ कर सम्मानित होने लगे। सम्मानों से उनका सृजनशील काम थमा नहीं, बल्कि वे उनके कामों की रफ्तार बढ़ाते रहे। अपने जीवन के अंतिम समय तक हाकिंग ‘ब्लेकहोल विस्फोट’, ‘स्ट्रिंग थ्योरी’, अपनी ‘आकाशगंगा में ब्लेकहोल के जन्म’, ‘मल्टीवर्स’ आदि को ले कर अपने विचार प्रकट करते रहे तथा शोध करते रहे। अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले उन्होंने थॉमस हेरटॉग के साथ मिल कर एक ऐसी फ्रेमवर्क प्रस्तुत की है, जिसके आधार पर ‘मल्टीवर्स’ की खोज की जा सकती है।

हाकिंग को ‘नोबेल’ नहीं 

अदम्य इच्छाशक्ति ओर जीवन में कुछ नया करना तथा ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करने के मकसद ने उन्हें जबर्दस्त साहसी और जिज्ञासु बना दिया। कॉस्मॉस में जिस ‘टाईम-स्केल’ पर घटनाएं घटती हैं, उनकी तुलना में मनुष्य का जीवन-काल कुछ भी नहीं। यही कारण रहा कि उन्होंने अपने सैद्धांतिक विवेचन के माध्यम से ब्रह्मांड में जिन घटनाओं के घटित होने की संभावनाएं व्यक्त की  वे अब तक वे प्रमाणित भी नहीं हो सकी। और,इसने उन्हें ‘नोबेल पुरस्कार’ से अवश्य दूर रखा लेकिन, मौलिक कार्य के लिए ‘नोबेल’ से तीन गुना अधिक पुरस्कार राशि वाला ‘ब्रेकथ्रू प्राइज इन फंडामेंटल फिजिक्स’ दिला दिया। अगर हम वैज्ञानिक इतिहास पर नजर डालें तो पाते हैं कि स्वयं आईंस्टीन ने जिन ‘गुरूत्वीय तरंगों’ के अस्तित्व में होने की भविष्यवाणी की थी, उन्हें सत्यापित होने में १०० से अधिक वर्ष लग गये। लेकिन, इनके प्रमाणित होते ही इसे नोबेल पुरस्कार के योग्य मानने में देर नहीं लगी क्योंकि, इन तरंगों के मिलने से वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड को जानने और समझने के लिए ‘फोटॉन’ (प्रकाश का कण) और ‘न्यूट्रिनो’ के बाद ‘तीसरी खिड़की’ मिल गई। इसी तरह ‘हाकिंग विकिरण’, ‘बेबी ब्रह्मांड’, आदि के अस्तित्व में होने की जो भविष्यवाणियाँ हाकिंग द्वारा की गई, वे प्रायोगिक स्तर पर सत्यापित होने के इंतजार में हैं।

हाकिंग केे जीवन का लक्ष्य 

हाकिंग ने अपने जीवन के लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए कहा था कि ‘मेरा उद्देश्य बड़ा सामान्य है। और, यह ब्रह्मांड की पूरी समझ से है; यह ऐसा क्यों है, जैसा है; एवं आखिर यह अस्तित्व में क्यों है?’ अपने उद्देश्य-पूर्ति के सूत्र उन्हें ‘ब्लेक होल’ में नज़र आये और इसीलिए उनकी रूचि ‘ब्लेकहोल’ के रहस्यों को जानने में जागी। ‘ब्लेकहोल’ ब्रह्मांड में उपलब्ध अत्यंत रहस्यमय पिण्डों में से एक है। तत्कालीन मान्यताओं और धारणाओं के अनुसार ‘ब्लेकहोल’ अपने किसी रहस्य को उजागर नहीं करने देता तथा अपने अंदर से यह किसी भी सूचना को लीक नहीं होने देता। अतः हाकिंग ंने अपना सारा ध्यान ‘कॉस्मोलॉजी’, ‘आईंस्टीन की जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी’, और ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ के क्षेत्रों में शोध हेतु लगाया ताकि ‘ब्लेकहोल’ के विचित्र व्यवहार केे माध्यम से ‘ब्रह्मांड’ के रहस्यों को समझा जा सके। अंततः वे यह प्रमाणित करने में सफल हुए कि अब तक की मान्य धारणाएं गलत है। ब्लेकहोल भी उत्सर्जित करते हैं।

उम्र के साथ बीमारी और शोध की रफ्तार बढ़ती गयी

मात्र २१ वर्ष की उम्र में हाकिंग में एक विशेष बीमारी ‘एम्योट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस’ के लक्षण दिखलाई देने लगे। यह ‘मोटर-न्यूरॉन’ से जुड़ी बीमारी थी। इसमें व्यक्ति का ‘न्यूरो-मस्क्यूलर नियंत्रण’ धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। आम धारणा के विपरीत जैसे-जैसे हाकिंग की बीमारी बढ़ती गई, वैसे वैसे उनके शोध की रफ्तार घटने की बजाय बढ़ने लगी। धीमी रफ्तार से हाकिंग ने वरदान माना। इससे उनमें हर काम को जल्दी पूरा करने की तीव्र इच्छा पैदा हुई तथा उन्होंने तेजी से कुछ अलग और अनूठा करने एवं परिवार बसाने का निर्णय लिया।

आरंभिक शोध के दिनों में नहीं जागा विशेष उत्साह  

हाकिंग ने मात्र आठ या नौ वर्ष की कच्ची उम्र में ही ‘वैज्ञानिक’ बनने का निश्चय कर लिया था। लेकिन, इसके लिए आवश्यक ‘जुनून’ नहीं जाग पाया था। अगर हम उनके जीवन के बीमारी के पहले के आरंभिक दिनों पर नजर डालें तो वे हमें कोई ‘असाधारण’ विद्यार्थी के रूप में नहीं मिलते हैं। गणित और भौतिकी में रूचि रखने वाले सामान्य प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की तरह उनकी रूचि भी ‘थर्मोडायनामिक्स’, ‘रिलेटिविटि’ तथा ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ के अध्ययन में रही। सन् १९६२ में उन्हें ऑक्सफोर्ड से ‘नेचरल साइंस’ में डिग्री मिली। इन दिनों में उनका रूझान ‘एस्ट्रोनॉमी’ में हुआ लेकिन, उन्हें यह ‘चुनौतीपूर्ण’ नहीं लगा क्योंकि ऑक्सफोर्ड में बनी ‘आब्जर्वेटरी’ में सिर्फ ‘सौर-धब्बों’ पर अध्ययन होता था। इस तरह उनके आरंभिक शोध के दिन उनमें विशेष उत्साह जगाने में सफल नहीं हो सके। कुछ नया करने के उद्देश्य से वे कैम्ब्रिज गये, जहाँ कॉस्मोलाजी के सिरमोर फ्रेड हायल थे। उस समय ब्रह्मांड की बिगबैंग थ्योरी से अलग हायल और जयंत विष्णु नार्लीकर की ‘स्टेडी-स्टेट थ्योरी’ बहुत चर्चा में थी। उनके साथ काम करने की आशा में कैम्ब्रिज में आ कर हाकिंग ने ‘थ्योरेटिकल एस्ट्रोनॉमी एवं कॉस्मोलॉजी’ में अध्ययन करना आरंभ किया। लेकिन, शोध निदेशक के रूप में उन्हें हायल नहीं बल्कि डेनिस विलियम शायमा मिले। 

रोजर पेनरोज का एक व्याख्यान से जागा जुनून

उनकी कॉस्मॉस में पहली रूचि तब जागी जब उन्होंने १९६५ में रोजर पेनरोज (त्वहमत च्मदतवेम) का एक व्याख्यान सुना। इसमें उन्होंने ‘दिक्काल’ सिंग्युलरिटिज पर अपने क्रांतिकारी शोध की चर्चा की थी। ये ‘दिक्काल’ में वे स्थान हैं, जहाँ भौतिक राशियाँ अचानक अनंत हो जाती हैं तथा भौतिकी के नियम टूटते प्रतीत होते हैं। इस व्याख्यान ने उनके जीवन में शोध की दृष्टि से पहला क्रांतिकारी मोड़ ला दिया। इसके पहले उन्हें शोध में कोई खास मजा नहीं आ रहा था। लेकिन, अब वे ‘ब्लेकहोल’ में अत्यधिक रूचिशील हो गये, क्योंकि यह भी ‘सिंग्युलरिटिज’ का ही परिणाम होता है।अब नये उत्साह और ऊर्जा से भरे हाकिंग सैद्धांतिक एस्ट्रोनॉमी तथा कॉस्मोलॉजी के क्षेत्र में आगे बढ़ने लगे। इस तरह एक व्याख्यान ने हाकिंग की सोच बदल दी तथा उन्हें जीवन जीने का मकसद दे दिया। आगे चल कर उन्होंने स्वयं पेनरोज के साथ कई अनुसंधान किये और शोधपत्र लिखे।  

दिक्काल में सिंग्यूलरिटि के लिए आवश्यक शर्तों की खोज 

‘कॉस्मोलॉजी’ के क्षेत्र में खोज के लिए हाकिंग की रूचि लगातार बढ़ती गई। १९६८ से १९७३ के बीच उन्होंने थर्मोडायनामिक्स के नियमों को ब्लेकहोल को समझने में लगाया। इसी दौरान उन्नीस सौ साठ की दशक में उन्होंने पेनरोज तथा केंब्रिज में अपने दोस्त के साथ मिल कर ‘जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटि’ से एक नया ‘काम्प्लेक्स मेथेमेटिकल मॉडल’ विकसित किया। और, फिर इसका अनुप्रयोग कर १९७० में हाकिंग ने कई ‘सिग्युलरिटि थ्योरम्स’ में से एक को प्रतिपादित किया। इसने दिक्काल में सिंग्यूलरिटि के अस्तित्व में आने के लिए आवश्यक शर्तों के समुच्चय (सेट) से परिचित कराया। इसका यह अर्थ भी निकला कि सच में ‘दिक्’ तथा ‘काल’ की शुरूआत ‘बिगबैंग’ से हुई और इनका अंत भी ब्लेकहोल में ही होगा। उनके इस शोध ने पेनरोज की खोज के निष्कर्षों को बदल दिया और इसने वैज्ञानिकों का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया।

‘नो-हेअर थ्योरम’ का प्रमाण

इसके बाद हाकिंग ने ब्रेन्डॅन कार्टर (ठतंदकवद ब्ंतजमत), वर्नर इसराइल तथा डेविड राबिन्सन के साथ काम करते हुए जॉन व्हीलर की ‘नो-हेअर थ्योरम’ का गणितीय प्रमाण प्रस्तुत किया। इसके अनुसार ‘ब्लेकहोल’ को उसके ‘द्रव्यमान’, ‘कोणीय संवेग’ तथा ‘आवेश’ को जान कर पूरी तरह से व्याख्यित किया जा सकता है। इसके लिए यह जानना जरूरी नहीं कि वे किस तरह बने हैं।

‘मिनी ब्लेकहोल’ यानि ‘प्रिमार्डियल ब्लेकहोल’ 

‘सिंग्युलरिटिज’ के अध्ययन में रूचिशील हाकिंग कॉस्मोलॉजी के क्षेत्र में ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ की अहम भूमिका को स्पष्ट देख रहे थे। १९७१ में हाकिंग ने गामा विकिरणों के उत्सर्जन का विश्लेषण कर हैजनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धांत के आधार पर सुझाव दिया कि बिगबैंग के तत्काल बाद ‘मिनी ब्लेकहोल’ यानि ‘प्रिमार्डियल ब्लेकहोल’ बनना तथा इनमें से कुछ को आज तक भी अस्तित्व में होना चाहिए। ऐसा इसलिए कि, बिगबैंग के समयदिक्काल में पदार्थ के वितरण में जबर्दस्त ‘असमांगता’ का रहना है। इसके कारण, उस समय पर्याप्त संख्या में ऐसे अत्यंत घने क्षेत्रों का उपस्थित रहना संभव है जो गुरूत्वीय प्रभाव से परमाणु के नाभिक के आकार के अत्यंत छोटे-छोटे ब्लेकहोल को जन्म देने में समर्थ हो सकते हैं। 

ब्लेकहोल और एंट्रॉपी

जेकब बेकेंस्टिन ने पहली बार सुझाव दिया कि ‘ब्लेकहोल’ की ‘एंट्रॉपी’ होती है और इसका मान उसके ‘इवेंटहोराइजन’ (ब्लेकहोल के परितः एक काल्पनिक सीमा, जिसके अंदर से कुछ भी बाहर नहीं आता, प्रकाश भी नहीं) के क्षेत्रफल के बराबर होता है। इसका मतलब इनमें ताप का होना है। ताप के कारण ये गरम होते हैं, अतः इन्हें विकिरणों का उत्सर्जन भी करना चाहिए। हाकिंग बेकेंस्टिन से सहमत नहीं थे। क्योंकि, वे इस मत के थे कि ‘ब्लेकहोल’ ऊर्जा का उत्सर्जन नहीं करते। अतः, इनमें एंट्रॉपी नहीं होना चाहिए। लेकिन,उन्होंने १९७४ में फिर गंभीरता से विचार किया तथा पूरे प्रकरण को क्वांटम मैकेनिक्स के उजाले में देखा। अपनी गणना से उन्होंने दिखाया कि ‘ब्लेकहोल’सचमुच ही पूरी तरह ‘ब्लेक’ नहीं होते तथा उनकी धारणा के विपरीत, वे उत्सर्जन भी कर सकते हैं।इसतरह पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद वे बेकेंस्टिन से सहमत हुए।

ब्लेकहोल से उत्सर्जन : हाकिंग रेडिएशन्स

हाकिंग ने बताया कि ‘ब्लेकहोल’ के ‘इवेंट होराइजन’ पर ‘क्वांटम यांत्रिकी’ के अनुसार जब कण और प्रतिकण पैदा होते हैं तो इनमें से एक ‘ब्लेकहोल’ में पुनः गिर सकता है लेकिन, दूसरा उससे बाहर निकल कर आने में समर्थ भी हो सकता है। इसकी संभावना ‘हैजनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धांत’ के अनुसार बनती है। इस सिद्धांत के कारण बहुत कम दूरी और समय के लिए प्रकाश के वेग का मान बढ़ सकता है, जो ‘ब्लेकहोल’ से कणों के उत्सर्जन का कारण बन जाता है। उन्होंने गणना करके बताया कि जितना छोटा ‘ब्लेकहोल’ उतना ही अधिक उससे उत्सर्जन होता है। अपने सूर्य के बराबर द्रव्यमान वाले ‘ब्लेकहोल’ से होने वाला उत्सर्जन नगण्य होता है जबकि चीन की दीवार के बराबर द्रव्यमान वाले ‘ब्लेकहोल’ से उल्लेखनीय उत्सर्जन होता है। अगर पहले वाला उत्सर्जन ६० वाट के बल्ब से उत्सर्जन की तरह मानें तो दूसरे वाले को ३०० मेगावाट के बराबर माना जा सकता है। उत्सर्जन के कारण छोटे होते जा रहे ‘ब्लेकहोल’ की उत्सर्जन क्षमता लगातार बढ़ती जाती है।इससे हाकिंग की नजर में ‘ब्लेकहोल’ विकिरित करने वाले पिण्ड बन गये, न कि ‘वेक्यूम क्लिनर’ की तरह सब कुछ अपने अंदर समाहित कर लेने वाले। इस तरह  कणों के उत्सर्जन के माध्यम से वाष्पीकृत होते हुए ‘ब्लेकहोल’ लगातार छोटे होते-होते अंततः अपने अस्तित्व को ही मिटा लेते हैं। ‘ब्लेकहोल’ से विकिरित होने वाले इन विकिरणों को ‘हाकिंग विकिरण’ के नाम से जाना जाता है। इससे बेकेंस्टिन द्वारा प्रतिपादित ‘ब्लेकहोल’ के संबंध में द्वितीय नियम की सर्वमान्यता पर प्रश्नचिह्न भी खड़ा हो गया। हाकिंग के कार्य से यह बात सामने आई कि ‘इवेंट होराइजन’ का क्षेत्रफल सदैव बढ़ेगा ही नहीं, यह घट भी सकता है, और इसतरह ‘हाकिंग विकिरणों’ के उत्सर्जन से ‘ब्लेकहोल’ वाष्पीकृत हो कर गायब भी हो सकता है। ‘ब्लेकहोल’ के संबंध में यह एक सर्वथा क्रांतिकारी रहस्योद्घाटन था।

‘इन्फार्मेशन पेराडाक्स’ और हाकिंग

लेकिन, हाकिंग के इस आइडिया ने एक ‘इन्फार्मेशन पेराडाक्स’ को भी जन्म दिया, जिसके अनुसार भौतिक सूचना (जिससे पदार्थ के मूल कणों की पहचान होती है), जो ब्लेक होल में थी, वह हमारे लिए पूरी तरह से गुम जाती है, जो क्वांटम भौतिकी के मान्य नियमों का खंडन करती है। हैजनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धांत के अनुसार ‘सूचना’ सहित कुछ भी पूरी तरह गुम नहीं सकता। जैसा कि हाकिंग ने बताया कि ब्लेकहोल में सूचना सदैव बनी रहती है और उसके साथ ही चली जाती है, तो यह ‘क्वांटम भौतिकी’के अनुसार ठीक नहीं बैठता। यह ‘इन्फार्मेशन पेराडाक्स’ १९९७ में तब चर्चा में आयी, जब हाकिंग और कीप हार्न (ज्ञपच ज्ीवतदम) ने जॉन प्रेस्किल (श्रवीद च्तमेापसस) के साथ एक शर्त लगाई। उस समय हाकिंग और थार्न दोनों को विश्वास था कि सूचना ‘ब्लेकहोल’ में हमेशा के लिए गुम जाती है जबकि प्रेस्किल ऐसा नहीं मानते थे। हालांकि बाद में हाकिंग ने शर्त छोड़ दी यह कहते हुए कि अब वे विश्वास करते हैं कि ‘सूचना’ लौटती है, हालांकि ‘छद्म’ रूप में। उन्होंने ‘ब्लेकहोल’ की नई परिभाषा देते हुए कहा कि इवेंट होराइजन इतना स्पष्ट नहीं है और इस तरह यह अपनी सारी जानकारियों को बाहरी जगत से पूरी तरह रोक पाने में समर्थ नहीं रह पाता है।इसतरह से अगर देखें तो वे सच्चे अर्थों में वैज्ञानिक थे। सच्चा वैज्ञानिक खुले विचारों का स्वागत करता है। वह अपनी गलतियों को स्वीकार करने में हिचकता नहीं है। अपनी ही मान्यता को बेहतर प्रमाण मिलने पर अस्वीकार करना अपना धर्म समझता है। वह सत्य की खोज में उठे हर कदम का स्वागत करता है। ऐसे में जब स्वयं हाकिंग को नये प्रमाण और तर्क मिले, तो उन्हें स्वयं अपनी कही गई बातों से पीछे हटने में कोई हिचक नहीं हुई। उन्होंने बड़ी बेबाकी से अपने ही पूर्व विचारों का खंडन किया।

‘मल्टीवर्स’ में विश्वास

हाकिंग ंने ‘मल्टीवर्स’ (समानांतर ब्रह्मांड) के विचार को स्वीकारा ताकि वे ‘ब्लेकहोल’ में सूचना के संरक्षण को समझा सकें। ‘मल्टीवर्स’ वास्तव में हमारे ब्रह्मांड सहित अनंत ब्रह्मांडों के अस्तित्व में होने की परिकल्पना है। अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले उन्होंने थॉमस हेरटॉग के साथ अपना एक शोध ‘ए स्मूथ एक्जिट फ्राम इटरनल इन्फ्लेशन’ प्रस्तुत किया,जिसमें एक ऐसी फ्रेमवर्क को प्रस्तुत किया गया है, जिसके आधार पर ‘समांतर ब्रह्मांडों’ की खोज की जा सकती है। उनका मानना है कि ब्रह्मांड के जन्म के समय के पृष्ठभूमि विकिरणों के द्वारा ‘मल्टीवर्स’को मापा जा सकता है।यह शोधपत्र शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहा है।
हिग्स बोसॉन के संबंध में हाकिंग ने विचार बदले
हाकिंग मानते थे कि ‘हिग्स बोसॉन’ को कभी खोजा नहीं जा सकेगा। इसे लेकर इसकी भविष्यवाणी करने वाले वैज्ञानिक पीटर हिग्स के साथ २००२ तथा २००८ में उनकी बहुत ही गर्मागर्म बहस भी हुई। पदार्थ के ‘मानक मॉडल’ में इस कण की अहम भूमिका है। इसके बिना पदार्थ के मूल कणों में द्रव्यमान नहीं आ सकता। लेकिन,हाकिंग उनसे सहमत नहीं हुए। आखिरकार जब २०१२ में इस कण की खोज हो गई, तब हाकिंग ने अपनी भूल स्वीकार की तथा कहा कि हिग्स को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए। खोज के एक ही वर्ष के भीतर पीटर हिग्स को अपने इस सैद्धांतिक शोध के लिए भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया।

ग्रेविटी और क्वांटम यांत्रिकी के एकीकरण की दिशा में हाकिंग

हाकिंग की यह निश्चित धारणा थी कि बिगबैंग के बाद बन रहे अत्यंत सूक्ष्म ब्रह्मांड की स्थिति को समझने के लिए ‘गे्रविटि’ के साथ ही ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ तथा ‘अनिश्चितता के सिद्धांत’ की आवश्यकता होती है। अतः इन दोनों के एकीकरण के बिना बात बन नहीं सकती।
‘क्वांटम यांत्रिकी’ बहुत ही शानदार तरीके से सूक्ष्म स्तर पर काम करती है। लेकिन, आईंस्टीन की ‘जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटि’ की मूलभूत अवधारणा ‘ग्रेविटी’ (गुरूत्व)  को क्वांटम यांत्रिकी के आधार पर समझना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। ‘गुरूत्व’ का संबंध ‘दिक्काल की वक्रता’ से होता है। जितनी बड़ी वस्तु उतनी ही अधिक ‘वक्रता’। आज के ग्रहों, तारों और निहारिकाओं के आसपास के स्थानों को छोड़ कर  ब्रह्मांड में दिक्काल समतल होती है। लेकिन, बिगबैंग के तत्काल बाद के अत्यंत सूक्ष्म और छोटे दिक्काल में अनिश्चितता के सिद्धांत के कारण ‘समांगतता’ नहीं हो सकती। इससे यह अस्पष्ट और कोहरे (क्वांटम फाग) जैसी दिक्काल समतल रहने की बजाय उबड़-खाबड़ यानि विभिन्न वक्र-सतहों से भरी प्रतीत होती होती है। इस तरह इस दिक्काल में अत्यंत सूक्ष्म वक्रता का पाया जाना ‘गुरूत्वीय प्रभाव’ को जन्म देता है। और, इसतरह क्वांटम मैकेनिक्स के दिक्काल पर अनुप्रयोग में ‘गे्रविटि’ की उत्पत्ति का राज छिपा हो सकता है। हाकिंग ने अपने विभिन्न अध्ययनों के माध्यम से ‘जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटि’ तथा ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ के एकीकरण की आवश्यकता को बड़े जबर्दस्त तरीके से रेखांकित किया।संभवतः ‘ब्लेकहोल’ से ‘हाकिंग विकिरणों’ के उत्सर्जन के रूप में पहला उदाहरण भी बना जिसने कुछ हद तक एकीकरण की दिशा में आगे कदम बढ़ाया। इससे ‘क्वांटम ग्रेविटि’का सिद्धांत बिकसित होने लगा। 

बिगबैंग पर भी उठाये सवाल

जनरल थ्योरी द्वारा ‘ब्लेकहोल’ के अंदर जिस ‘सिंग्यूलरिटि’ के बारे में बताया गया है, वह एक ‘बिंदु’ की तरह है, जहाँ तारे का सम्पूर्ण द्रव्यमान स्थित होने से घनत्व अनंत है तथा दिक्काल की वक्रता भी अनंत है। लेकिन, अगर यह ‘बिंदु’ की तरह सूक्ष्म है तो इसे समझने के लिए ‘अनिश्चितता के सिद्धांत’ के अनुप्रयोग की जरूरत होगी। लेकिन, तब इस बिंदु को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया जा सकता। हाकिंग को संदेह हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय ‘ब्लेकहोल’ में सिंग्युलरिटि ही न हो। उन्हें लगा कि वहाँ का स्थान निश्चित ही संकुचित क्षेत्रफल वाला होगा लेकिन, वह ‘अनंत घनत्व वाला बिंदु’ नहीं हो सकता। उनके अध्ययन के क्षेत्र कई रहे। अपने विचार और धारणाएं भी वे बदलते रहे। अस्सी के दशक में उन्होंने बिगबैंग सिद्धांत पर भी प्रश्न उठाने आरंभ किये। उन्होंने सुझाव दिया कि हो सकता है कि ब्रह्मांड का न आदि है और न अंत। बस यह लगातार बदल रहा हो। एक नियत संक्रमण जो एक ब्रह्मांड से दूसरे के लिए स्पेस-टाईम के जरिये रास्ता देता हो।

ब्रह्मांड के लिए ‘नो-बाउंडरी प्रपोसल’ 

आईंस्टीन की जनरल रिलेटिविटि के अनुसार  अनंत तक फैला ब्रह्मांड या तो स्थायी अवस्था में है या फिर इसका जन्म एक सिंग्युलरिटि के माध्यम से हुआ है, जो लगातार फैल रहा है। परंतु, उन्होंने जीम हार्टले (श्रपउ भ्ंतजसम) के साथ मिल कर ‘नो-बाउंडरी प्रपोसल’ के रूप में एक तीसरी संभावना प्रकट की। ब्रह्मांड सीमित है और कोई ‘आरंभिक सिंगयूलरिटि’ नहीं है, जिसने ब्रह्मांड की सीमा को पैदा किया है। इस नो-बाउंडरी ब्रह्मांड का इतिहास ‘काल्पनिक काल’(प्उंहपदंतल जपउम)में है। हालांकि यह वह काल नहीं है जिससे हम परिचित हैं तथा जिससे हमारे दैनिक जीवन में वास्ता पड़ता है, जो वास्तविक काल होता है, जिसमें हम अपने को बूढ़ा होते हुए या चीजों को पुराना होते हुए देखते हैं। वास्तव में इस ‘काल्पनिक काल’ का संबंध काल की उस दिशा से है जो वास्तविक काल के लम्बवत होता है। ऐसे में यह ‘काल्पनिक काल’ कपोल-कल्पना की तरह लगता है। लेकिन, हाकिंग इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि बात ऐसी नहीं है। यह वह काल है जो गणितीय दृष्टि से सुपरिभाषित है। ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ और ‘अनिश्चितता के सिद्धांत’ के सूत्रीकरण में यह अनिवार्य रूप से प्रयुक्त हुआ है। 
बिगबैंग के बाद ‘प्लांक स्केल’(१०.३५ सें.मी.) तक आने के पहले ब्रह्मांड की दिक्काल में कोई सीमा नहीं थी। इसे ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ के आधार पर समझा जा सकता है। बिगबैंग के साथ ही दिक् और काल अस्तित्व में आये। चूँकि इसके पहले ‘काल’ अस्तित्व में ही नहीं था तो उस समय ब्रह्मांड के होने का विचार ही अर्थहीन हो जाता है। हाकिंग ने चिरसम्मत बिग बैंग मॉडल में उल्लेखित ‘आरंभिक सिंग्युलरिटि’ को पृथ्वी के ‘उत्तरी ध्रुव’ के समान एक अत्यल्प क्षेत्र के रूप में माना। अब चूँकि उत्तरी ध्रुव के ‘उत्तर’ में तो जाया नहीं जा सकता, क्योंकि वहाँ कोई सीमा ही नहीं है। यह तो ऐसा स्थान है जहाँ उत्तर की ओर आने वाली रेखाएं मिलती हैं तथा समाप्त होती हैं। अब जैसे-जैसे हम भूमध्य रेखा की ओर दक्षिण दिशा में बढ़ रहे होते हैं, ब्रह्मांड का आकार काल्पनिक समय (जो वास्तविक काल के लम्बवत दिशा में होता है) में बढ़ रहा होता है।

बेबी यूनिवर्स के विचार का प्रतिपादन

‘बेबी यूनिवर्स’ के विचार को प्रतिपादित कर हाकिंग ने ‘कॉस्मोलॉजी’ के क्षेत्र में एक और क्रांति ला दी। उनके अनुसार ये ‘ब्लेकहोल’ के ‘बच्चे’ हैं। ये तब पैदा होते हैं जब ‘ब्लेकहोल’ के किसी स्थान पर अचानक उभार आता है और ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ के नियमों से फलस्वरूप उससे अलग हो कर ‘बेबी यूनिवर्स’ के रूप में जन्म लेता है। यह बाहर निकलता है तथा पुनः अपने मूल ब्लेकहोल में कहीं और आ कर मिल जाता है। ऐसे असंख्य बेबी युनिवर्स हो सकते हैं। लेकिन, ये कब  और कहाँ प्रकट होंगे, इसे नहीं जाना जा सकता। 
हाकिंग ने अपने ‘बेबी यूनिवर्स’ के आइडिया के माध्यम से अंतरिक्ष यात्रा की संभावना पर विचार किया। उन्होंने कहा कि कल्पना करो कि आप एक विशालकाय अंतरिक्ष यान में हैं तथा ‘ब्लेकहोल’ में प्रवेश कर रहे हैं। अब आप इसमें आप किसी दूसरे ‘ब्लेकहोल’ में पुनः प्रकट हो सकने की आशा कर सकते हैं। हालांकि इसमें आप कहाँ प्रकट होंगे इसका चयन आप नहीं कर सकेंगे। वैसे यह इतना आसान नहीं है। इसमें एक अड़चन है। बेबी यूनिवर्स ‘काल्पनिक काल’ में पैदा होते हैं। इसमें वे कण होगें जो ‘ब्लेकहोल’ में गिरे हैं। वास्तविक काल में तो विभिन्न हिस्सों पर गुरूत्वाकर्षण के अलग-अलग प्रभाव के कारण निश्चित ही अंतरिक्ष यात्री रेशे-रेशे हो कर बिखरते हुए ‘ब्लेकहोल’ में प्रवेश करेगा। इसतरह वास्तविक काल में उनके ‘इतिहास’(भ्पेजवतल) का अंत निश्चित है। लेकिन, काल्पनिक काल में उसका ‘इतिहास’ उसकी तरह से बना रहेगा। इस तरह, एकतरह से अंतरिक्ष यात्री ब्रह्मांड के किसी दूसरे भाग में पहुँच जाएगा। लेकिन, हाकिंग कहते हैं कि ‘बेबी यूनिवर्स’ का आइडिया अंतरिक्ष यात्रा के लिए तो उपयुक्त नहीं है, लेकिन इसकी सहायता से ब्रह्मांड को समझने के लिए ‘थ्योरी ऑफ एवरी थिंग’ को खोजने में मदद अवश्य मिल सकती है। अभी तक ‘स्टेण्डर्ड मॉडल’ के रूप में जिस सिद्धांत को विकसित किया गया है, उसमें कई नियतांक होते है, जिनके मानों को जाना नहीं जा सकता। इन नियतांकों के मानों को प्रेक्षणों के आधार पर सहमति हेतु चुना जाता है। इसीलिए बहुत वैज्ञानिक मानते हैं कि इसके नीचे एक और एकीकृत सिद्धांत होना चाहिए, जिससे ये नियतांक स्वयमेव प्रकट होंगे और उन्हें मानना नहीं पड़ेगा। हाकिंग का मानना है कि इसके लिए ‘सुपरस्ट्रिंग थ्योरी’ उपयुक्त हो सकती है। और, इसीलिए उनकी रूचि इसमें थी। हालांकि वे कहते हैं कि अगर ‘बेबी यूनिवर्स’ का उनका आइडिया सही है तो फिर ‘अनिश्चितता के सिद्धांत’ के कारण इन नियतांकों के मानों की सही-सही भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

‘वर्महोल’ और ‘क्वांटम इंटेंगलमेंट’ 

उनकी रूचियों में ‘क्वांटम इंटेंगलमेंट’ तथा ‘वर्महोल’ भी शामिल थे। ‘क्वांटम इंटेंगलमेंट’ में दो कण एक साथ मल्टीपल-अध्यारोपित अवस्थाओं में रह सकते हैं। उनके लिए उनके बीच की दूरी मायना नहीं रखती। वे अनंत दूरी पर भी मल्टीपल-अध्यारोपित अवस्थाओं में रह सकते हैं। यानि, ये एक साथ ‘दक्षिणावर्ती’ और ‘वामवर्ती’ स्पिन अवस्थाओं में एक साथ रह सकते हैं। मापन के पहले यह किसी तरह से नहीं जाना जा सकता कि वे किस निश्चित अवस्था में हैं। लेकिन, जैसे ही किसी एक की स्थिति को जाना जाता है, दूसरा स्वमेव उसी क्षण निश्चित अवस्था में आ जाता है। यानि, किसी एक को मापने पर अगर वह दक्षिणावर्त स्पिन अवस्था में मिलता है तो दूसरा स्वयमेव उसी क्षण वामावर्त अवस्था में आ जाता है और अगर पहला वामावर्त मिलता है तो दूसरा दक्षिणावर्त ही मिलता है। अगर ये ब्रह्मांड के दो विपरीत छोरों पर भी स्थित हों तब भी यह आपसी सहसंबंध बना रहता है। अब समस्या है कि तत्क्षण बिना किसी विलम्ब के पहले कण से दूसरे तक सूचना पहुँचती किस तरह होगी। क्या अनंत वेग पर यह संचार संभव है? भौतिकी के नियम प्रकाश के वेग से अधिक पर संचार को संभव नहीं मानते। इस तरह यह वैज्ञानिकों के सामने एक पहेली बन कर सामने आयी।इसके लिए भौतिकशास्त्रियों ने ‘वर्महोल’ की अवधारणा सामने रखी। वर्महोल एक अत्यंत सूक्ष्म ‘गुरूत्वीय सुरंग’ है। दो इन्टेंगल्ड कणों, ब्लेकहोल या ब्रह्मांडों को जोड़ती है। इस तरह ‘वर्महोल’ वास्तव में एक ‘शार्ट-कट’ बन जाता है।

शोधार्थियों को प्रेरित करने के लिये पुस्तक-लेखन

शोधार्थियों के लिये हाकिंग ने कई पुस्तकें लिखी। केनीस विलियम शायमा के साथ उन्होंने ‘सिंग्यूलरिटिज इन कोलेप्सिंग स्टार्स एण्ड एक्पेंडिंग यूनिवर्सेस’, जार्ज एलिस के साथ ‘दी लार्ज स्केल स्ट्रक्चर ऑफ स्पेस-टाईम’, रोजर पेनरोज के साथ ‘दी नेचर ऑफ स्पेस एण्ड टाईम’, एब्नर शिमोनी, नेन्सी कार्टराईट और रोजर पेनरोज के साथ ‘दी लार्ज, दी स्माल, एण्ड दी ह्यूमन माइण्ड’, ‘इन्फार्मेशन लॉस इन ब्लेकहोल्स’ तथा ‘गॉड क्रिएटेड दी इंटीजर्स: दी मेथेमेटिकल ब्रेकथ्रूज देट चेंज्ड हिस्ट्री’नामक पुस्तकें लिखी हैं। हाकिंग की समस्त पुस्तकें शोधकर्ताओं के लिये स्रोत सामग्री उपलब्ध कराती है। 

लोकरूचि विज्ञान लेखन में महारत

स्टीफन हाकिंग को लोकरूचि विज्ञान-लेखन की कला में भी महारत हांसिल थी। उनसे ब्रह्मांड की खोज के बारे सुनना ठीक वैसा ही है जैसे कि क्रिस्टोफर कोलम्बस से दुनिया की खोज के बारे में सुनना या नर्मदा के सौन्दर्य के बारे में अमृतलाल वेगड़ से। उनकी एक पुस्तक ‘ए ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ ने आमजन की जिज्ञासाओं को न सिर्फ शांत ही किया वरन् और जानने के लिये उत्सुक भी बनाया। इस क्षेत्र में आगे आने के लिये इस पुस्तक ने कई युवाओं को आकृष्ट किया। इसके बाद इसे अपडेट करते हुए उन्होंने लीनार्ड म्लोडिनोव के साथ ए ब्रीफर हिस्ट्री ऑफ टाइम लिखी। इस पुस्तक में पदार्थ की सूक्ष्म दुनिया को समझने के लिए आवश्यक ‘क्वांटम यांत्रिकी’, पदार्थ के मूलभूत कणों के व्यवहार को समझने के लिए गढ़ी गयी ‘स्ट्रिंग थ्योरी’, ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझने के लिए मान्य ‘बिग बैंग थ्योरी’ और कई अन्य क्लिष्ट विषय अत्यंत सरल भाषा में समाहित हैं। ‘ब्लेक होल्स एण्ड बेबी यूनिवर्सेस एण्ड अदर एसेज’ और ‘दी यूनिवर्स इन ए नटशैल’ ब्रह्मांड की परतों को उघाड़ती उनकी महत्त्वपूर्ण पुस्तक रही है। उनकी एक और पुस्तक ‘थ्योरी ऑफ एव्हरी थिंग’ है। इसमें उन्होंने सात व्याख्यानों की एक शृंखला प्रस्तुत की है जिसमें बिगबैंग से लगा कर ब्लेक होल तथा स्ट्रिंग सिद्धांत का सिलसिलेवार वर्णन है। इस पुस्तक से हमें ब्रह्मांड के इतिहास पर उनके दृष्टिकोण से परिचय मिलता है। कुछ वर्ष पूर्व उनकी पुस्तक ‘दी गे्रंड डिजाइन’ प्रकाशित हुई है। यह भी बेमिसाल है। इसमें कई ऐसे प्रश्नों को उठाया गया है जिनके, उत्तर की तलाश में कई-कई महापुरूषों ने अपना सारा जीवन लगाया है। इसमें उन्होंने ब्रह्मांड कब और कैसे अस्तित्व में आया, क्यों यहाँ कुछ है, आखिर वास्तविकता क्या है, प्रकृति के नियम ऐसे क्यों बने हैं जिसके कारण हम जैसे प्राणियों का उदय हो सका है, क्या ब्रह्मांड जैसी इस महारचना के निर्माण के पीछे कोई भगवान है या यह विज्ञान सम्मत है आदि जैसे झकझोरने वाले प्रश्नों को हाकिंग ने बड़ी खूबसूरती से अपनी इस पुस्तक में उठाया और उत्तर देने का प्रयास किया गया है। बच्चे भी हाकिंग की नजर से बचे नहीं हैं। ब्रह्मांड जैसे विषय में उनकी रूचि जगाने और उन्हें प्रेरित करने के लिये उन्होंने अपनी बेटी लूसी के साथ ‘जार्ज्स सिक्रेट की टू दी यूनिवर्स’ और ‘जार्ज्स कॉस्मिक ट्रेजर हंट’ लिखी है। 
 
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