ऐतिहासिक पृष्ठ

(26/Nov/2018)

जन्मदिवस 20 अक्टूबर पर विशेष

दूरदर्शी एवं स्वप्नदृष्टा होमी जहाँगीर भाभा

डॉ. कपूरमल जैन

 

होमी जहाँगीर भाभा ने देश को विकास और शक्ति-सम्पन्न बनाने का न सिर्फ सपना देखा, वरन् इसके लिए रोडमेप तैयार कर रास्ता भी बनाया तथा उस पर चलते हुए अपनी प्रतिभा, संकल्पशक्ति व कठोर परिश्रम से अपने लक्ष्योें को हांसिल कर ‘रोल-मॉडल’ बन के भी दिखाया। इसी का परिणाम रहा कि आज हम उस जगह खड़े हो सके हैं, जहाँ विश्व में कोई हमें नजरअंदाज नहीं कर सकता है। 

सामान्य बच्चों से अलग

होमी भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को हुआ। उस समय उनके पिता मैसूर में प्रतिष्ठित वकील और टाटा समूह के सलाहकार के रूप में कार्य कर रहे थे। उनका बेटा सामान्य बच्चों की तुलना में अत्यंत कम सोता था। स्वाभाविक ही सबको चिंता हुई। जब उन्हें डाक्टर को दिखाया गया तो पता चला कि इसका कारण उनके दिमाग का बहुत तेज होना है। उसमें दिमाग में लगातार उठने वाली विचारों की तरंगें उन्हें सोने नहीं देतीं। लेकिन, डाक्टर के अनुसार यह घबराने की बात नहीं थी क्योंकि यह बालक की स्वाभाविक प्रकृति थी। बालक होमी बहुत चंचल थे। वे अपनी बाल-सुलभ क्रीड़ाओं से सबका मन मोह लेते थे। उन्हें अपनी माँ से बेहद लगाव था। एक बार होमी भाभा के मन में अपनी माँ को जन्मदिन पर उपहार देने का विचार उठा। लेकिन, इसके लिए वे पिता से पैसा ले कर खरीदा हुआ उपहार नहीं देना चाहते थे। वे कुछ अनूठा उपहार देना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपनी ‘पॉकेट-मनी’ में से पैसे बचाना आरंभ कर ब्रश, पेंट आदि खरीदे तथा चुपके-चुपके ‘अपने हाथों से’ माँ की पेंटिंग बनाई और उसे अपनी माँ को उपहार में दी। माँ की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रही। किसी भी माँ के लिए इससे बड़ा कोई अन्य उपहार नहीं हो सकता था। 

शानदार अकादमिक पृष्ठभूमि में होमी का बचपन 

होमी भाभा अपने प्रत्येक कार्यों को पूरे मनोयोग से समझते हुए करते थे। उन्हें रचनात्मक खेल बहुत पसंद थे, क्योंकि इससे उन्हें सीखने को बहुत मिलता था। उन्हें प्रकृति, कला, पेंटिंग, संगीत, स्केचिंग आदि से भी लगाव था, जो जीवन पर्यंत बना रहा। होमी भाभा के पिता उनकी बहुमुखी प्रतिभा से परिचित थे। इसलिए वे उन पुस्तकों को उपलब्ध कराने लगे, जो उनके व्यक्तित्व को निखारने में सहायक हो सकें तथा उन खिलौनों को भी, जो होमी की रचनात्मकता को सही दिशा दे सकें। होमी की विज्ञान में रूचियों को देखते हुए उनके पिता ने उनके लिये घर पर ही एक ‘लायब्रेरी’ तथा ‘प्रयोगशाला’ भी बनवा दी थी। उनके दादा अपने पोते की गतिविधियों को देखते रहते थे। वे मैसूर स्टेट में ‘इंस्पेक्टर जनरल ऑफ एजुकेशन’ थे और एक जानी-मानी हस्ती थे। जब उन्होंने देखा कि उनके पोते होमी को पढ़ने का अत्यधिक शौक है, तब उन्होंने विभिन्न विषयों पर लिखी अनेकों पुस्तकों से सुसज्जित अपनी ‘निजी लायब्रेरी’ में होमी को प्रवेश करने की अनुमति दे दी। इससे होमी के ज्ञान के क्ष्तििज का विस्तार तेजी से होने लगा। इसतरह शानदार ‘अकादमिक पृष्ठभूमि’ में होमी का बचपना सँवर रहा था। लेकिन, उनके पिता ने इस बात का भी ख्याल रखा कि लाड़-प्यार की वजह उसके आगे बढ़ने के मार्ग में बाधा न बने। 

किशोरवय में ही मिल गया योजनाओं को बनाने तथा संचालित करने का अनुभव

होमी भाभा की बुआ जमशेदजी टाटा के घर ब्याही गयी थी। इस कारण उनके परिवार के टाटा घराने से अंतरंग संबंध थे। ख्यातनाम टाटा घराना उन दिनों स्टील, हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर, हेवीइलेक्ट्रिकल्स आदि से संबद्ध था। उनकी आरंभिक पढ़ाई मुम्बई के केथेड्रल एण्ड जॉन केनन हाई स्कूल (ब्ंजीमकतंस ंदक श्रवीद ब्वददवद भ्पही ैबीववस) में हुई। उनके स्कूल के सामने ही टाटा का खानदानी घर होने के कारण वे लंच वहीं खाते थे। यह वह समय भी होता था, जब घर के सभी सदस्य बैठते तथा विविध योजनाओंं तथा समस्याओं पर चर्चा करते, जिन्हें भाभा बड़े ध्यान से सुनते तथा बारीकी से समझते। यह उनके लिये अत्यंत मूल्यवान समय साबित हुआ, क्योंकि यहाँ उन्हें बड़ी-बड़ी योजनाओं को बनाने, मूर्त-रूप देने तथा संचालित करने का व्यवहार-योग्य अनुभव मिलने लगा। इस तरह अपनी किशोरवय में मिला उनका यह अनुभव ही आगे चल कर तब उनके बहुत काम आया, जब भारत में उन्हें संस्थाओं के निर्माण की जिम्मेदारी मिली। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिये उन्होंने ‘एल्फिन्स्टन कालेज’(म्सचीपदेजवदम ब्वससमहम) और ‘रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस’(त्वलंस प्देजपजनजम वि ैबपमदबम) में प्रवेश लिया। यहाँ उन्होंने ‘भौतिकी’ और ‘गणित’ विषयों को चुना और सफलतापूर्वक परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय जाने का निर्णय लिया। 

पिता की इच्छा का सम्मान

होमी भाभा के पिता उन्हें एक ‘इंजीनियर’ के रूप में देखना चाहते थे। वैसे होमी भाभा को क्या बनना है, इसका उन पर कोई दबाव नहीं था। इसे सोचने में उनके पिता ने उन्हें पूरी स्वतंत्रता दी। लेकिन, होमी ने सुसंस्कारित बेटे की तरह अपने पिता की इच्छा का आदर करते हुए ‘मेकेनिकल इंजीनियरिंग’ की पढ़ाई करने का निश्चय किया। हालांकि उनको ‘गणित’ से कुछ ज्यादा ही लगाव था। यह लगाव तब सबके सामने आया था जब मात्र पंद्रह वर्ष की उम्र में ही उन्होंने आईंस्टीन के ‘सापेक्षतावाद के सिद्धांत’ को पढ़ और समझ कर सबको आश्चर्य में डाल दिया था। होमी के निर्णय से उनके पिता बहुत खुश तो हुए लेकिन, अपने बेटे की इच्छा का ध्यान रखते हुए उन्होंने भी वादा किया कि अगर वे वहाँ प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण कर लेंगे तो उनके ‘गणित’ पढ़ने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगीे।

गणित की पढ़ाई के लिये मिली स्कॉलरशिप 

होमी भाभा ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त कर ली। इससे पिता की शर्त पूरी हो गयी। अब उन्होंने अपना ध्यान गणित की ओर केंद्रित किया। अच्छे अंकों के कारण उन्हें दो वर्ष के लिये गणित की पढ़ाई के लिये एक स्कॉलरशिप भी मिल गयी। 
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में भाभा को महान सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री तथा क्वांटम यांत्रिकी के पुरौधा पी.ए.एम। डिराक के निर्देशन में ‘गणित’ पढ़ने का अवसर मिला। गणित का भौतिकी से गहरा नाता होता है। सच में देखा जाए तो गणित, भौतिकीय समस्याओं को हल करने के ‘टूल्स’ उपलब्ध कराती है। गणित के अनुप्रयोग से भौतिकीय समस्याओं के हल खोजे जाते हैं। अब गणित के साथ भौतिकी भी उनके विचार-क्षेत्र में आने लगा।

गणित के रास्ते पहुँचे भाभा भौतिकी के करीब 

सन् 1932 में होमी भाभा को ‘राउज बॉल ट्रेवलिंग स्कॉलरशिप’ (त्वनेम ठंसस ज्तंअमससपदह ैजनकमदजेीपच) मिली। इसके माध्यम से उन्हें विश्व के चोंटी के भौतिकशास्त्रियों पॉली, क्रेमर्स और फर्मी के साथ काम करने का मौका मिला। इसके बाद सन् 1934 में उन्हें ‘सर आइजक न्यूटन स्टुडेंटशिप’ (ैपत प्ेंंब छमूजवद ैजनकमदजेीपच) मिली, जिससे उन्हेंे यूरोप के भौतिकी के कई सुप्रसिद्ध अनुसंधान केंद्रों पर जाने का मौका मिला। इन केंद्रों में ‘नील बोहर्स इंस्टीट्यूट ऑफ थ्योरिटिकल फिजिक्स’ (छमपसे ठवीत प्देजपजनजम वि ज्ीमवतमजपबंस च्ीलेपबे) भी शामिल रहा। इसतरह वे ‘गणित’ के रास्ते ‘भौतिकी’ के अत्यंत करीब पहँुच गये। 

‘कॅपिट्जा क्लब’ से जुड़े

होमी भाभा हमेशा कुछ न कुछ नया करने और सीखने के अवसर तलाशते रहते थे। इसी तलाश के चलते वे यूरोप की ‘वैज्ञानिक दुनिया’ के प्रसिद्ध ‘कॅपिट्जा क्लब’ से जुड़ गये। यह क्लब 1922 में स्थापित हुआ था। इसके सदस्य भौतिकशास्त्री होते थे, जो सप्ताह में एक दिन सप्ताह भर में हुई खोजों पर चर्चा करते थे। 

लोकप्रिय शिक्षक और शोधकर्ता के रूप मेंं हुए विख्यात

सन् 1935 में होमी भाभा को कैंम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएच.डी। की उपाधि मिली और वहीं उन्हें प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति भी मिल गई। उन्हें कठिन से कठिन विषय को अत्यंत सरल, लयबद्ध और रोचक तरीकों से प्रस्तुत करने में महारत प्राप्त थी। यही कारण रहा कि वे शीघ्र ही विद्यार्थियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हो गये। होमी भाभा को अपनी गणितीय प्रतिभा पर बहुत भरोसा था। अतः इसके बल पर भौतिकीय समस्याओं के सैद्धांतिक हल खोजना उन्हें रोमांचित करने लगा। यहाँ उन्हें उस समय भौतिकी के क्षितिज पर उभर रहेनये क्षेत्र ‘नाभिकीय भौतिकी’ (न्यूक्लियर फिजिक्स) में नयी-नयी खोजें हो रही थी। इन सबमें ‘कॉस्मिक किरणों’की महत्त्वपूर्ण भूमिका सामने आ रही थी। 

‘कास्केड थ्योरी ऑफ इलेक्ट्रॉन शावर’ 

होमी भाभा को ‘कॉस्मिक किरणों’का क्षेत्र काफी आकृष्ट कर रहा था। इसका कारण उनका रदरफोर्ड, डिरॉक, बोहर और हिटलर जैसे भौतिकविदों के सम्पर्क में आना था। ‘कॉस्मिक किरणें’लगभग प्रकाश के वेग से गति कर रहे प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन जैसे आवेशित कणों से बनी होती हैं। गति की इस सीमा में कणों पर ‘आईंस्टीन का सापेक्षता सिद्धांत’ बहुत प्रभावी  होता है। 
वैज्ञानिकों ने कॉस्मिक किरणों के अध्ययन के दौरान पृथ्वी के वायुमंडल में इलेक्ट्रॉनों का ‘फुहारा (शावर)’ देखा था। इसे समझना उन दिनों वैज्ञानिकों के समक्ष चुनौती प्रस्तुत कर रहा था। भाभा ने इस अवलोकन को समझने का निश्चय किया। अब उनकी तार्किक यात्रा आरंभ हुई। उन्होंने सोचा कि जब ये किरणें पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती हैं तो इसके आवेशित कण पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में स्थित वायु के अणुओंं के पास से गुजरते हुए टकराने लगते हैं। इससे उनका वेग कम होने लगता है। वेग में कमी होते समय ये ‘अवमंदन’ (कमबमसमतंजपवद) महसूस करते हैं, जिससे वे ‘फोटॉन’के रूप में ‘विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा’उत्सर्जित करने लगते हैं। जब कोई‘फोटॉन’ हवा के अणु से टकराता है, तो आईंस्टीन के ‘ऊर्जा-द्रव्यमान समीकरण’ के अनुसार वह ‘इलेक्ट्रॉन-पॉजीट्रॉन के जोड़े’ में बदल जाता है। इससे कॉस्मिक किरणों में उपस्थित मूल ‘प्राथमिक इलेक्ट्रॉनों’ के साथ ही ‘फोटॉन’से पैदा होने वाले ‘द्वितीयक इलेक्ट्रॉनों’ की संख्या बढ़ने लगती है, जिससे पृथ्वी के वायुमंडल में इलेक्ट्रॉनों का ‘फुहारा’ (शावर) बनने लगता है। शीघ्र ही उन्होंने भौतिकविद् वाल्टर हिटलर (ॅंसजमत भ्मपजसमत) के साथ काम करते हुए इसके लिए ‘कास्केड थ्योरी ऑफ इलेक्ट्रॉन शावर’ प्रतिपादित की, जिसने उन्हें विश्वभर में चर्चित कर दिया। 

‘म्यू मिसॉन’ से जुड़ी समस्या का खोजा समाधान

अब होमी भाभा का ध्यान ‘म्यू मिसॉन’ (जो इलेक्ट्रॉन के समान ही लेकिन इससे करीब 207 गुना भारी कण होता है) से जुड़ी एक और समस्या पर गया। यह कण कॉस्मिक किरणों के पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश होने के बाद जन्म लेता है तथा लगभग प्रकाश के वेग से चलते हुए मात्र दो माइक्रोसेकण्ड (सेकण्ड के दस लाखवें भाग) में ही क्षय होते हुए ‘इलेक्ट्रॉन’ के रूप में प्रकट हो जाता है। इतने कम समय में यह मात्र 600 मीटर ही की दूरी तय कर सकता है, जबकि प्रयोगों के दौरान इसे करीब 9500 मीटर की दूरी तय करते हुए देखा गया। वैज्ञानिकों को ‘म्यू मिसॉन’ का यह व्यवहार बहुत ही रहस्यमय प्रतीत हो रहा था। होमी भाभा ने इस समस्या को भी ‘आईंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत’ के उजाले में देखा तथा इसका अनुप्रयोग करते हुए बताया कि जो दूरी हमारे लिए 9500 मीटर है, वह ‘म्यू मिसॉन’ के लिए संकुचित हो कर मात्र 600 मीटर ही रहती है। और, इसी तरह जो समय ‘म्यू मिसॉन’ के लिए दो माइक्रोसेकण्ड है, वह हमारे लिए 31ण्7 माइक्रोसेकण्ड होता है। इसतरह उन्होंने इसे सापेक्षता से जनित समस्या बताते हुए समझा दिया। 

‘भाभा स्केटरिंग’ की खोज

होमी भाभा अपनी इन विश्व भर में ख्याति दिलाने वाली सफलताओं के बाद रूके नहीं। अब उनका उर्वरक दिमाग कॉस्मिक किरणों के वायुमंडल में प्रवेश के बाद बनने वाले ‘इलेक्ट्रॉन’ और ‘पॉजीट्रॉन’से जुड़ी विभिन्न प्रक्रियाओं को समझने की दिशा में सक्रिय हुआ। उन्होंने विचार किया कि जब ये दोनों कण किसी परमाणु के नाभिक के पास आते हैं तो दो तरह की घटनाओं के घटित होने की संभावनाएँ बनती हैं। पहली संभावना में वे ‘अपना अस्तित्व मिटाते हुए’आईंस्टीन के ‘ऊर्जा-द्रव्यमान समीकरण’ के हिसाब से ‘फोटॉन’ बन सकते हैं। और, फिर यह ‘फोटॉन’ वायुमंडल में किसी अन्य परमाणु के ‘नाभिक’ से टकराने पर पुनः ‘इलेक्ट्रॉन और पॉजीट्रॉन’ के रूप में प्रकट हो सकते हैं। इसतरह इस प्रक्रिया में ‘मूल कणों’ के स्थान पर ‘नये कण’ मिलते हैं। लेकिन, दूसरी तरह की संभावित घटना में ‘नाभिक’ के पास आने पर येकण ‘प्रकीर्णित’ हो सकते हैं। प्रकीर्णन की इस घटना में कण अपनी दिशा बदलते हुए अपने ‘मूल स्वरूप’ में ही बने रहते हैं। ऐसे में भाभा ने महसूस किया कि इन दोनों प्रकार की घटनाओं के घटित होने की संभावनाएँ अलग-अलग होना चाहिए। नील्स बोहर के साथ मिल कर उन्होंने इसकी गणना की। भाभा के विचार की पुष्टि हुई और इस तरह एक विशेष प्रकार के प्रकीर्णन (ेबंजजमपदह) की खोज हुई जिसे ‘भाभा स्केटरिंग’ (ठींइीं ेबंजजमपदह) के नाम से जाना जाता है। 

न्यूक्लियर फिजिक्स’ नाम से नये विभाग का आरंभ

होमी भाभा केे द्वारा किये जा रहे शोध-कार्य सबका ध्यान आकृष्ट कर रहे थे। राल्फ हॉवर्ड फॉउलर (त्ंसची भ्वूंतक थ्वूसमत) जैसे भौतिकविद् के निर्देशन में उन्होंने अपनी पी-एच.डी। की थी। उनके शोध-कार्यों की छाप इतनी गहरी थी कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने ‘न्यूक्लियर फिजिक्स’ नाम से नया विभाग आरंभ कर उन्हें ‘नाभिकीय ऊर्जा’ से जुड़ी परियोजना पर कार्य आरंभ करने की जिम्मेदारी दे दी।

दिल और दिमाग के बीच संघर्ष 

इस बीच होमी भाभा कैम्ब्रिज से कुछ दिनों का अवकाश ले कर भारत आये। लेकिन, ‘द्वितीय विश्वयुद्ध’ (1939.1945)के अचानक छिड़ जाने के कारण वे वापस नहीं जा पा रहे थेे। उन दिनों अमरीका सहित अनेक देश अपनी परमाणु बम परियोजनाओं पर कार्य कर रहे थे।  परमाणु बम की अभिधारणा नाभिकीय विखंडन अथवा संलयन पर आधारित है। विखंडन की प्रक्रिया में यूरेनियम का नाभिक टूटता है, जबकि संलयन में छोटे नाभिक जुड़ कर बड़े नाभिक का निर्माण करते हैं। मजेदार बात यह है कि दोनों की प्रक्रियाओं के दौरान ‘आईंस्टीन के ऊर्जा-द्रव्यमान समीकरण’ के अनुसार नाभिकों के द्रव्यमान का कुछ भाग ऊर्जा में बदल जाता है। अमरीका सहित कई देश होमी भाभा को अपनी परियोजनाओं में शामिल करने के लिये आमंत्रण दे रहे थे। लेकिन, उनका दिल भारत में ही रहने को चाह रहा था। हालांकि उनका दिमाग पुनः कैम्ब्रिज जाना चाहता था, क्योंकि यूरोप में अनुसंधान के लिये अच्छा वातावरण और सुविधाएँ थी। कुछ दिनों तक होमी भाभा के दिल और दिमाग के बीच संघर्ष चला, लेकिन अंततः जीत ‘दिल’ की हुई और उन्होंने देश में ही रहने तथा काम करने का निर्णय ले कर बैंगलोर स्थित ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साईंस’ में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सी.वी। रमन के सहयोगी के रूप में कार्य करना आरंभ कर दिया। 

एक विस्तृत बीज-योजना  

अब होमी भाभा का ध्यान देश में अनुसंधान की स्थिति और अधो-संरचना पर गया। उन्होंने महसूस किया कि जो स्थिति यहाँ विद्यमान है, उसमें अच्छे से अच्छे दिमाग वाला व्यक्ति भी  अनुसंधान करने में अपने को असहाय पायेगा। अतः उन्होंने प्रयोगशालाओं को उपकरणों से सुसज्जित करने और उन्हें व्यवस्थित रूप देने का निश्चय किया। दूरदर्शी और राष्ट्रप्रेमी भाभा ने वर्तमान जरूरतों को पूरा करने के लिये और भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक विस्तृत बीज-योजना तैयार कर ‘टाटा ट्रस्ट’ को प्रस्तुत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि योजना के मंज़ूर हो जाने से दो दशक के बाद जब नाभिकीय ऊर्जा से विद्युत उत्पादन होने लगेगा, तब आवश्यक विशेषज्ञ देश में ही मिल सकेगें। टाटा को भाभा के विचार अत्यंत तर्कसंगत लगे, जिससे सन् 1945 में ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ (ज्ंजं प्देजपजनजम वि थ्नदकंउमदजंस त्मेमंतबीय ज्प्थ्त्) की स्थापना हो गई। भाभा इसके प्रथम निदेशक नियुक्त किये गये। पहले-पहल यह संस्थान किराये के भवन में लगा। फिर यह संस्थान ‘यॉट क्लब’ में और अब अरब सागर के पास करीब दो लाख पचास हजार वर्गफुट में फैले परिसर में स्थित है। इस संस्थान में सैद्धांतिक और अप्लाइड भौतिकी, ज्यो-भौतिकी तथा अन्य विषयों के अध्ययन के साथ ही विद्युत उत्पादन से जुड़े ‘नाभिकीय विखंडन’ (छनबसमंत थ्पेेपवद), ‘यूरेनियम शुद्धिकरण’ (च्नतपपिबंजपवद वि न्तंदपनउ) और कृषि, उद्योग, दवा, चिकित्सा, जीव-विज्ञान आदि के लिए उपयोगी ‘समस्थानिकों’ (प्ेवजवचमे) के उत्पादन आदि पर भी शोध-कार्य चल रहा है। ज्ञातव्य हो कि ‘नाभिकीय विखंडन और यूरेनियम शुद्धिकरण’ का संबंध ‘विद्युत उत्पादन’ से है, जबकि ‘समस्थानिकों’ का संबंध ‘कृषि’, ‘उद्योग’, ‘दवा’, ‘चिकित्सा’, ‘जैव विज्ञान’ आदि से है।

देश के नव-निर्माण के लिए आवश्यक तैयारी 

इस समय तक देश स्वतंत्र नहीं हुआ था, लेकिन गांधीजी के नेतृत्व में ‘स्वतंत्रता-आंदोलन’ अपने अंतिम चरण में था। होमी भाभा को देश के शीघ्र ही स्वतंत्र होने का विश्वास था और वे ‘स्वतंत्र भारत’ के नव-निर्माण के लिए आवश्यक तैयारी में बिना समय गँवाए जुटना चाहते थे। वे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सम्पर्क में पहले से ही थे। उनकी प्रतिभा के नेहरूजी कायल थे। स्वतंत्र होते हीदेश के कर्णधारों को यह समझ में आने लगा कि हमारी समस्याओं का हल ‘विज्ञान’ के पास ही है, अतः ‘विज्ञान’ देश की ‘प्राथमिकता’ में आ गया। शीघ्र ही सरकार ने सन् 1948 में भाभा की अध्यक्षता में ‘परमाणु ऊर्जा आयोग’ तथा ‘नाभिकीय रिएक्टर’ के विकास एवं शोध के लिए ट्रांबे में ‘एटॉमिक एनर्जी इस्टेबलिशमेंट’ की स्थापना की। यही ‘इस्टेबलिशमेंट’आगे चल कर ‘भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर’ कहलाया। 

परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग हेतु उठे क़दम 

होमी भाभा के मन में पल रहे सपने को हकीकत में बदलने का समय आ गया। सन् 1955 में देश के प्रथम रिएक्टर ‘अप्सरा’ स्थापित हो गया। यह देश में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग की दिशा में उठाया गया सफलता का पहला कदम था। अब इससे आगे बढ़ने की आवश्यकता थी। इसके लिए उन्होंने बड़े रिएक्टर को स्थापित करने की योजना बनाई। लेकिन, इसके लिए विदेशी सहयोग की आवश्यकता थी। ऐसे में होमी भाभा का ध्यान कनाडा की ओर गया, जहाँ उनके मित्र लुईस डब्ल्यू.बी। लुईस नाभिकीय कार्यक्रमों के मुखिया थे। उनकी मध्यस्थता से भारत और कनाडा की सरकारों के बीच समझौता हुआ। और, इस तरह सन् 1960 में 40 मेगावॉट क्षमता वाला साइरस (ब्ंदंकपंद.प्दकपंद त्मंबजवत न्तंदपनउ ैलेजमउ) रिएक्टर अस्तित्व में आया। इसके बाद उनके मार्गदर्शन में सन् 1961 में एक और शोध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ‘जरलीना’ (र्मतव म्दमतहल त्मंबजवत वित स्ंजजपबम प्दअमेजपहंजपवदे ंदक छमू ।ेेमउइसपमे) नामक रिएक्टर स्थापित किया गया। इन सबकी सफलता के पश्चात विद्युत उत्पादन के लिये व्यावसायिक संयंत्र लगाने का विचार बना तथा तारापुर, राणाप्रताप सागर और कलपक्कम में केंद्र आरंभ किये गये। भाभा के माध्यम से सफलता का स्वाद चखने के बाद आज हमारे देश की 7 विभिन्न साइट्स पर 22  रिएक्टर्स स्थापित किये गये हैं। इनकी क्षमता 6780 डॅ (मेगावाट) है तथा इनसे होने वाला विद्युत उत्पादन 30292ण्91 ळॅी (गीगावाट-घंटा) है। इस तरह देश ने ‘ऊर्जा’ के मामले में ‘आत्मनिर्भर’ बनने की दिशा में लगातार अपने मजबूत कदम उठाये।

परमाणु ऊर्जा के लिए ‘त्रि-चरणीय योजना’

अपने आरंभिक दौर में स्थापित रिएक्टरों में नाभिकीय ईंधन के रूप में ‘यूरेनियम-235’ का इस्तेमाल होता था। लेकिन, होमी भाभा को मालूम था कि देश में ‘यूरेनियम’के भंडार सीमित हैं। अतः आगे चल कर समस्या खड़ी हो सकती है। इससे निपटने के लिए उनके दिमाग में एक विचार कौंधने लगा। यह ‘थोरियम’ को ले कर था। उन्हें इस बात का संज्ञान था कि अपने देश में ‘थोरियम-232’ का विपुल भंडार है। भाभा ने सोचा कि वैसे तो यह विखण्डन-योग्य नहीं होता है, लेकिन न्यूट्रॉनों की बमबारी कर इसे ‘थोरियम-233’ के रूप में प्राप्त किया जा सकता है, जो विखण्डन-योग्य होता है। इस तर्कपूर्ण विचार के बाद उनके दिमाग में एक ‘त्रि-चरणीय योजना’ आकार लेने लगी। इसमें ‘प्रथम चरण’ में तो ‘यूरेनियम-235’ पर आधारित रिएक्टर स्थापित करना जिससे ऊर्जा के साथ ही ‘यूरेनियम-238’ से विखंडन-योग्य ‘प्लूटोनियम-239’ उत्पन्न करना  और फिर दूसरे चरण में ‘प्लूटोनियम पर आधारित रिएक्टर’ की स्थापना कर इससे विखंडन-योग्य ‘थोरियम-233’ को प्राप्त करना। और, इसके बाद तीसरे चरण में ‘थोरियम-233 आधारित रिएक्टर’ को स्थापित करना। 

सेठना को आमंत्रण और  जिम्मेदारी

अब होमी भाभा के मन में यह प्रश्न उठा कि इस परियोजना  पर काम करने की जिम्मेदारी किसे सौंपी लाए? तभी उन्हें अपने पूर्व परिचित डॉ। एच.एन। सेठना की याद आयी। वे उनकी योग्यता और रूचि से परिचित थे। सेठना उस समय अमरीका के मिशिगन विश्वविद्यालय से एम.एस.ई. की उपाधि प्राप्त कर इंग्लैण्ड की ‘इंपीरियल इंस्टीट्यूट’ से जुड़ कर काम कर रहे थे। होमी भाभा ने उनसे अपनी योजना की चर्चा की तथा भारत आने का निमंत्रण दिया। उनसे प्रेरित हो कर उन्होंने अपनी लगी लगाई नौकरी को छोड़ दी तथा भाभा के मार्गदर्शन में काम करने के लिए सन् 1949 में भारत लौट आये। भाभा ने उन्हें केरल स्थित ‘इंडियन रेअर अर्थ्स लिमिटेड’ का प्रभार सौंपा। यहाँ नाभिकीय खनिजों के दोहन का अध्याय आरभ हो रहा था। सेठना को ‘मोनाजाइट बालू’ से ‘थोरियम’ को अलग करने का दायित्व सौंपा गया था। यूरेनियम पर निर्भरता कम करने के लिए यह भाभा की दूर-दृष्टि थी। आगे चल कर सेठना ने देश में तीसरी पीढ़ी के रिएक्टरों के लिये महत्त्वपूर्ण प्लूटोनियम सेपरेशन प्लांट के अभिकल्पन और उसकी स्थापना में अहम योगदान दिया। वर्तमान झाड़खण्ड के जदुगुड़ा में यूरेनियम मिल की स्थापना में भी उनका हाथ रहा। सेठना ने सवंर्धित यूरेनियम के विकल्प के रूप में ‘मिश्रित ऑक्साइड फ्युल’ (यह युरेनियम-235 तथा प्लूटोनियम-239 का मिश्रण) विकसित कर अमरीका को मुँहतोड़ जवाब दिया जिसने 1974 में परमाणु परीक्षण से कुपित हो कर यूरेनियम की आपूर्ति रोक दी थी और तारापुर रिएक्टर को बंद करने की नौबत आ गई थी। ‘ट्रांजिस्टर’ और ‘इलेक्ट्रॉनिक चिप’ के आने के बाद ‘इलेक्ट्रॉनिकी’ के क्षेत्र में 1960 की दशक में विश्व में जबर्दस्त क्रांति आई। इसे ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने भाभा की अध्यक्षता में एक ‘इलेक्ट्रॉनिक्स कमेटी’ की स्थापना की। कमेटी ने कई बहुमूल्य सुझाव दिये। इन्हें मानते हुए भारत सरकार ने ‘इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन सेंटर’ खोला। 

अंतरिक्ष के क्षेत्र में अनुसंधान

होमी भाभा की रुचि देश को विश्व के वैज्ञानिक और तकनीकी मानचित्र पर स्थापित करने की थी। अतः वे परमाणु ऊर्जा के साथ ही अंतरिक्ष के क्षेत्र के विकास पर भी ध्यान देना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने विक्रम साराभाई की देखरेख में अंतरिक्ष कार्यक्रम को संचालित करने हेतु क़दम उठाया। और, आज हम जानते हैं कि हमारा देश विश्व के अंतरिक्ष क्लब का अत्यंत सम्माननीय सदस्य है। ‘चंद्रयान’ और ‘मॉम’ जैसी सफल परियोजनाओं को सफलतापूर्वक संचालित कर हमने विश्व को दाँतों तले ऊंगली दबाने को बाध्य किया है। हाल ही में 15 फरवरी 2017 को इसरो (प्दकपंद ैचंबम त्मेमंतबी व्तहंदप्रंजपवद) ने 103 उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में स्थापित कर विश्व को हैरान कर दिया है। 

दक्ष विशेषज्ञों की जरूरतों को पूरा करने हेतु कदम 

होमी भाभा चाहते थे कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की अपनी अलग पहचान हो। इसी को ध्यान में रखते हुए वे भारतीय वैज्ञानिकों के मनोबल को बढ़ाने की जरूरत महसूस करते थे। वे भारतीय मेधा को अतुलनीय मानते थे और कहते थे कि अगर आत्मविश्वास दृढ़ है तो हम विश्व के वैज्ञानिक क्षितिज पर सबसे चमकदार नक्षत्र होंगे। उन्हीं का प्रोत्साहन पा कर पी.के। अयंगर, राजा रामन्ना जैसे वैज्ञानिक तैयार हुए जिन्होंने उनके मिशन को आगे बढ़ाया। दूरदृष्टि से सम्पन्न होमी भाभा देश की भावी वैज्ञानिक जरूरतों से भी परिचित थे। इसीलिए उन्होंने अपने बाद काम करने के लिए युवाओं को वैज्ञानिकों के रूप में इसतरह तैयार करने की योजना पर कार्य करने पर विचार किया, जिससे देश को विविध क्षेत्रों में आगे बढ़ने में किसी प्रकार की दिक्कतों का सामना न करना पड़े। वे युवाओं के लिये पढ़ाई को अत्यधिक जरूरी मानते थे। ऐसा होने पर ही जब हमारे देश के उत्थान के लिये दक्ष विशेषज्ञों की जरूरत होने पर हमें विदेशों की ओर ताकना नहीं पड़ेगा। इसके लिए उन्होंने युवाओं को प्रशिक्षित करने के विविध कार्यक्रम आरंभ किये। वे महिलाओं को भी देश के विकास में भागीदार बनाने के पक्ष में थे। वे चाहते थे कि महिलाएँ चौके-चूल्हे की दुनिया से बाहर निकलेंे। 

अनेक सम्मानों से विभूषित 

भाभा को अनेक सम्मानों से विभूषित किया गया। 1941 में उन्हें रॉयल सोसाइटी ने अपना फैलो बना कर भी सम्मानित किया। सन् 1942 में भाभा को ‘एडम्स प्राइज’ से सम्मानित किया गया। पटना, लखनऊ, बनारस, आगरा, पर्थ (आस्ट्रेलिया), कैंम्ब्रज, लंदन आदि विश्वविद्यालयों ने उनको ‘डाक्टरेट’ की मानद उपाधि से विभूषित किया। वे सन् 1951 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उन्हें सन् 1954 में ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया। सन् 1955 में जेनेवा में आयोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय परमाणु शक्ति सम्मेलन’ के वे अध्यक्ष बनाये गये। सन् 1963 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने वियेना में ‘एटामिक एनर्जी एजेंसी’ की स्थापना की। इसकी ‘सलाहकार समिति’ में उन्हें सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया। सन् 1963 में ही वे ‘न्यूयार्क एकेडमी ऑफ साइंस’ के आजीवन सदस्य मनोनीत किये गये। 

विमान दुर्घटना और अकाल मृत्यु 

24 जनवरी सन् 1966 को एअर इंडिया का बोइंग 707 विमान अल्प्स (।सचे) की पहाडि़यों से टकरा कर दुर्घटनाग्रस्त हुआ। इस विमान में भाभा यात्रा कर रहे थे। कोई भी यात्री बच नहीं सका। इसतरह अ-समय ही यह सपूत इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों लिखा कर हमसे सदा के लिये बिदा हो गया। लेकिन, जब भाभा हमसे बिदा हुए तब परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत हुंकार भरने की स्थिति में आ चुका था। और, जब पोखरन में 1974 को ‘बुद्ध मुस्काये’, तब सारी दुनिया को इसका पता चल गया। यह वह दिन था जिस दिन भारत ने अपना पहला ‘भूमिगत परमाणु परीक्षण’ कर विश्व को चौकाया था। इसके बाद 1998 में पोखरन में दूसरी बार परमाणु बम का परीक्षण कर भारत ने दिखा दिया कि वह किसी से डरने वाला नहीं है। वैसे होमी भाभा परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के ही पक्षधर रहे लेकिन, 1962 में हुए ‘भारत-चीन युद्ध’ ने उन्हें अपनी सोच को बदलने के लिए मजबूर कर दिया। अब वे परमाणु बम बनाने के लिए जमकर वक़ालात करने लगे। वे जानते थे कि ‘ताकत’ का मुकाबला करने के लिए ‘ताकत’ की ही जरूरत होती है। इसतरह ‘परमाणु बम’ बनाने का सपना भी भाभा का था, जो उनके जाने के बाद भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों स्व। इंदिरा गांधी और स्व। श्री अटल विहारी वाजपेयी की दृढ़ राजनैतिक इच्छा-शक्ति के कारण साकार हुआ। 

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