विज्ञान कथा

(26/May/2018)

हिमीभूत

शुकदेव प्रसाद

 

ऐसा नहीं है कि इधर, जब से मैं बाहर से लौटा हूँ तब से मेरी जान-पहचान और पास-पड़ौस वाले मेरे बारे में जो कुछ कहने लगे हैं, उससे मैं अनभिज्ञ हूँ। मेरे कानों में भी फुसफुसाहटें सुनायी पड़ जाती हैं कि मेरे जीवन में पहले वाली स्वाभाविकता नहीं रही। वह बेफिक्री, अलमस्ती गायब हो गयी है, जैसे कुछ खो गया हो... या कि आजकल मैं किसी अनूठी दुनिया में खोया रहने लगा हूँ। लोग मेरे घरेलू नौकर नंदू से भी पूछते रहते हैं कि तुम्हारे साहब के साथ ऐसा क्या हुआ जो वे बड़े चुप-चुप रहते हैं।
अपने स्वभाव में इस बदलाव से मैं भली-भांति परिचित हूँंं। मैं भी महसूस करता हूँ कि मेरे जीवन की लय अब वैसी नहीं रही। लेकिन लोगों को क्या बताऊँ, समझ नहीं पाता और फिर बताने जैसी कोई बात भी नहीं है।
पिछले महीने की बात है। रोज की तरह दोपहर के भोजन के बाद थोड़ा-सा आराम किया और चार-साढ़े चार के करीब जब नींद टूटी तो सुस्ती दूर करने के लिए बाहर लॉन में बैठ गया। चाय पी ही रहा था कि हाथ में चिट्ठियों का पुलिंदा लिये नंदू आ गया और चिट्ठियां देखने लग गया। एक लिफाफे पर नज़र पड़ते ही हाथ रुक गये। कोने में प्रेषक की जगह अपने मित्र म्हात्रे का नाम देखकर ठहर गया। उत्सुकता से चिट्ठी खोली और पढ़ने लगा।
‘‘मित्र, उम्मीद है, मजे में होंगे! एक ख़ास वजह से यह खत तुम्हें लिख रहा हूँ। बात यह है कि मेरा तबादला हो गया है। अब पहली तारीख को बिल्कुल तुम्हारे करीब आ रहा हूँ। तुम्हारे शहर से कोई पचास-साठ किलोमीटर दूर नये जिले का मुख्यालय बन रहा है, उसी का जिलाधीश मुझे बनाया जा रहा है। सो गाहे-बगाहे मुलाकातें होती रहेंगी। लेकिन असल बात यह है कि पिछले पाँच सालों से मैं तुम्हें यहाँ बुला रहा हूँ। तुम टालते जा रहे हो। अब चूंकि मेरा यहाँ से जाना तय है सो आने का कार्यक्रम बना लो और हफ्ते-दस दिन घूम फिर जाओ। साथ ही वापस हो लेंगे। यकीन मानों मित्र, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति की न जाने कैसी-कैसी चीजें यहां है, जो तुमने देखी नहीं होंगी। बस आ जाओं... और हाँ, आने की खबर तार से दे दो। मैं स्टेशन पर प्रतीक्षा करूँगा। बाकी खैरियत, तुम्हारा-म्हात्रे।’’
चिट्ठी खत्म होते-होते मैं प्रोग्राम बना चुका था। छोटा-सा तार संदेश लिखा और नंदू को दौड़ा दिया कि जाओ तार कर आओ। गाड़ी भोर में कोई पाँच बजे पहुँची। छोटा-सा स्टेशन, इक्के-दुक्के यात्री। डिब्बे से उतर कर सामने देखा तो म्हात्रे बाहें फैलाये खड़ा था। बातों-बातों में स्टेशन से बाहर आ गये। सामान गाड़ी में म्हात्रे ने ही रखा और ‘‘आओ बैठ जाओ’’ कहकर खुद स्टेयरिंग पर जा बैठा। कुछ ही देर में म्हात्रे का आवास आ गया था।
‘‘थोड़ा आराम कर लो, फिर और बातें होंगी!’’ कहता हुआ म्हात्रे मुझे उस कमरे में ले गया जहाँ मुझे ठहराने का उसने इंतजाम किया था। यात्रा की थकान और पहाड़ी रास्ते के हिचकोलों से मैं वाकई बुरी तरह टूट चुका था और बिस्तर पर पड़ते ही सो गया।
जब उठा तो चाय की मेज पर म्हात्रे के अलावा एक वृद्ध महाशय भी मेरा इंतजार कर रहे थे। वे थे डॉ। अरुण धीमान, पुरातत्व और विज्ञान के कुशल अध्येता। जैसा कि म्हात्रे ने बताया- ‘‘लो भाई, अब डॉ। साहब ही तुम्हारे गाइड होंगे...और यहाँ जो कुछ भी तुम्हारी दिलचस्पी की चीजें हैं, वे तुम्हें बताएंगे, दिखाएंगे’’, और मुझे डॉ.धीमान के हवाले करके म्हात्रे दफ्तर चला गया।
उस पहाड़ की कंदराओं, गुफाओं में नाना मूर्ति-शिल्प अपनी सूनी, अविनाशी आँखों से संसार को न जाने कब से निहार रहे थे, जिन्हें देखकर मैं विस्मित हो उठा। आचार्य धीमान ने उनका इतिहास-भूगोल बताया और यह भी कि, पुरातत्व विभाग वालों की नज़र से ये शिल्प अछूते है, अन्यथा किसी संग्रहालय में होते या चोरों के हाथों किसी और दुनिया में, जा विराजमान होते, लेकिन यह कस्बा अब उपेक्षित हो चला है, न कोई विकास परियोजना है और न कोई आकर्षण का केन्द्र ही।
मेरे लिए एक अजीब-सा रहस्य उपस्थित कर दिया था धीमान ने। उनके घर भी मेरा जाना हुआ, जाने किस युग की मूर्तियाँ, ऐतिहासिक सामग्रियाँ उनके घर में मौजूद थीं। मेरे लिए एक अद्भुत आश्चर्य लोक सामने उपस्थित था।
किसी विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त पुरातत्वतेत्ता आचार्य धीमान कब से इस कस्बे में हैं, कोई नहीं जानता। शायद वह पीढ़ी ही अब नहीं रही, जिसकी वह संतति थे। निपट अकेले वे रहते। कभी-कभार वे बाहर भी जाते। जब पुरातत्व की कोई समस्या उठ खड़ी होती तो देश की ही नहीं विदेशी संस्थाएं भी उनके परामर्श लेतीं।
इतने में एक दिन म्हात्रे ने बताया कि कल मुझे जाना है, तो मैं चौंक पड़ा। समय कैसे गुजर गया, मुझे इसका अहसास भी नहीं हुआ। मैंने म्हात्रे से कहा कि मुझे यहाँ आनंद आ रहा है। थोड़ा और ठहरूँगा। अतः तुम चलो, मैं कुछ दिनों बाद आ जाऊँगा... और म्हात्रे चला गया।
फिर मैं आचार्य धीमान के साथ ही रहने लगा। इसमें मुझे ही सुविधा थी। सुबह से शाम तक जंगल-जंगल हम घूमते। थर्मस की चाय पीते और दुनिया जहान की इतिहास, पुरात्व की बातें वे करते। इतने अरसे में मैं उनका आत्मीय हो चला था। उनकी आँखों में मेरे प्रति जो स्नेह इधर उपज आया था, वह मैंने भाप लिया था।
एक दिन शाम को धीमान मुझसे बोले-‘‘कल सुबह जरा जल्दी निकलना है, तुम्हें एक अद्भुत चीज दिखाऊँगा, एक ऐसा प्रसंग बताऊँगा, जो तुम्हारे लिए अनमोल निधि होगी।’’
अजीब-सी उत्सुकता, रहस्य-रोमांच की पुलक मन में थी कि मैं ठीक से सो भी नहीं पाया। बस भोर होने की प्रतीक्षा करता रहा। भोर में हम तैयार ही हो रहे थे कि डॉक्टर धीमान के आवास पर धड़धड़ाती हुई एक टैक्सी आकार रुकी। ड्राइवर ने आवाज दी - ‘आचार्य जी, साहब ने गाड़ी भिजवायी है। जहाँ चलना हो, बंदा हाजिर है।’ आचार्य जी के पास नये जिलाधीश ने गाड़ी भिजवायी थी। शायद म्हात्रे ने यहाँ से रवाना होने से पहले आचार्य धीमान की सेवा-टहल के लिए नव नियुक्त जिलाधीश को सहेज दिया था।
आचार्य के मुख पर रहस्यमय मुस्कान उभरी, ‘‘सफर लंबा है, झील तक चलना है।’’ और हम गाड़ी में बैठ गये।
मैंने सहजता से पूछा-‘‘क्या यहाँ झील भी है? आपने कभी जिक्र नहीं किया?’’
कोई छह-सात घंटे के बाद हमारी गाड़ी जहाँ रुकी, वहाँ कंटीले तारों की बाड़ लगी थी और एक टिन की जंग खाई हुई तख्ती थी-‘‘वर्जित क्षेत्र, आगे खतरा है।’’
तो क्या यही हमारा गंतव्य स्थल है? मगर झील कहाँ है? मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया-‘‘आप किसी झील पर चलने के लिए कह रहे थे? हम रेगिस्तान में क्या करने आ गये? झील किधर है?’’
‘‘झील है नहीं, थी कभी।’’
‘‘क्या मतलब, मैं समझा नहीं।’’
‘‘आज से पचास साल पहले की बात है’’, आचार्य ने किस्सागोई के अंदाज में बात शुरू की- ‘उस समय कानकोर्डिया यूनिवर्सिटी में अभी-अभी पुरातत्व विभाग में मेरा एपाइंटमेंट हुआ था। जिस प्रोजेक्ट को मैंने हाथ में लिया था, उसमें मेरी सहायक थी- नैन्सी। प्राचीन विज्ञानों में उसकी गहरी दिलचस्पी थी। हमारी उसकी मैत्री इतनी बढ़ी की हम जीवन साथी बन गये। वहीं मैंने नैनसी से शादी कर ली...’ बीच में मैंने टोक दिया- ‘‘मगर इस झील से आपकी शादी का क्या वास्ता?’’
‘‘वास्ता है... और बहुत गहरा।’’ आचार्य उत्तेजित हो उठे और क्षण भर को शांत हो गये। उनकी आँखें द्रवित हो उठी। अस्पष्ट स्वर में वे बोले- ‘‘तुम्हें क्या मालूम मित्र कि इस झील ने मेरी नैनसी मुझसे छीन ली?’’
‘‘मगर आप और नैनसी, सॉरी मैडम नैनसी, तो कनाडा में थे।’’ मैंने उन्हें फिर टोका।
‘‘वही तो मैं बता रहा हूँ, तुम सुनो तो पूरी बात! मैं पूरी बात तुम्हें सिलसिले से बताता हूँ।’’ आचार्य ने मुझे दिलासा दिया और कथा की कड़ी आगे बढ़ी- आचार्य ने मुझे दिलासा दिया और कथा की कड़ी आगे बढ़ी- ‘‘हाँ तो हमारी शादी नैनसी से हो गयी और हमने छुट्टियाँ मनाने का निश्चय किया। उसने भारत कभी देखा नहीं था। सो उसकी दिली ख्वाहिश थी कि भारत-भ्रमण किया जए। मैंने फैकल्टी के डीन प्रोफेसर जैक्सन को जब अपनी छुट्टी की अर्जी दी तो उन्होंने खुशी-खुशी मुझे लंबी छुट्टी सैंशन कर दी और इस तरह हम भारत आ गये।’’
‘‘देश के विभिन्न स्थलों को दिखाने के बाद मैं नैनसी को अपना घर दिखाने ले आया। तभी वह हादसा हुआ था।’’
‘‘कौन सा हादसा?’’
‘‘वास्तव में, यह जो कंटीली बाड़ तुम देख रहे हो, उसके उस पार हजारों कि.मी। की दूरी पर, उस समय एक बर्फ ढंकी पहाड़ी थी और यहाँ हरा-भरा जंगल था। कभी इसी जंगल के निकट सरकार ने एक परमाणु संयंत्र लगाने का निश्चय किया। तब परमाणु खतरों की बात को लेकर लोगों में इतनी चेतना नहीं थी, सो बिना किसी ना-नुकुर के परमाणु संयंत्र लग गया।’’
‘‘जब हम यहाँ आये थे तो यहाँ संयंत्र लग चुका था और आस-पास के कस्बे परमाणु बिजली की बदौलत गुलजार हो चुके थे। लेकिन साल-डेढ़ साल बाद देखा गया कि बर्फ कुछ ज्यादा ही पिघलने लगी है और देखते ही देखते पहाड़ी के नीचे एक झील बन गयी। यह एक अद्भुत घटना थी!’’
‘‘झील बन गयी?’’
‘‘हाँ, झील बन गयी और पहाड़ी गायब हो गयी।’’ इतना कहकर आचार्य कहीं अतीत में खो गये।
‘‘फिर क्या हुआ?’’ मैंने शंृखला टूटने नहीं दी।
‘‘फिर तो लोगोंे लिए इसे पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने में कोई कसर न छोड़ी गयी। यहाँ रेस्त्रां, होटल, बस अड्डा सभी कुछ बन गया और लोगों को रोजी-रोटी का नया जरिया मिल गया। यह इलाका गुलज़ार हो उठा। जगह-जगह से लोग अपनी थकान मिटाने आते, तफरी करते, झील में तैराकी करते, मछलियाँ पकड़ते, मौज-मस्ती करते।’’
‘‘फिर तो बड़ा रमणीक स्थान रहा होगा? लेकिन सब कुछ नष्ट कैसे हो गया?’’ मेरी जिज्ञासा बढ़ती रही थी।
‘‘हुआ यह कि पर्यटन-स्थल पर चहल-पहल बढ़ने लगी।’’ लेकिन इसी बीच कुछेक ऐसी घटनाएँ होने लगीं कि लोग सावधान होने लगे। देखा यह गया कि होटलों में ठहरने वाले लोग बीमार पड़ने और झील में पानी पीने वाले ढोर-डंगर भी प्रभावित होने लगे। वास्तव में जो परमाणु संयंत्र लगा था, उससे निकलने वाले विकिरण का यह करिश्मा था। विकिरणशीलता का जहर पानी में घुल गया था। रेडियोधर्मी विकिरणों के कारण ही तो पहाड़ी पिघली थी और यहाँ झील बन गयी थी। धीरे-धीरे विकिरणों का शिकार यहाँ की आबोहवा भी हो गयी। विकिरण इतना बढ़ा कि जलचर भी प्रभावित हो गये।
थोड़ा रुककर आचार्य ने बताया- ‘‘नैनसी ने परीक्षण करके ज्ञात किया कि झील की मछलियाँ विषाक्त हो चुकी हैं। विकिरण विषाक्तता (रेडियेशन पॉइजनिंग) के कारण होटलों में मछलियाँ खाने वाले बीमार पड़ने लगे, यह भावी खतरे की घंटी थी।’’
‘‘किस भावी खतरे की?’’
‘‘उसी खतरे की, जिसने सभी कुछ लील लिया, यहाँ तक कि मेरी नैनसी को भी!’’
‘‘मैडम नैनसी, क्या झील में डूब गयी थीं?’’
‘‘नहीं, बल्कि झील के पानी का परीक्षण करते-करते वह ल्यूकेमिया की शिकार हो गयी। लेकिन यह सब बाद में हुआ, उस महाविनाश के बाद!’’
‘‘कौन से महाविनाश के बाद?’’ देखिए, मुझे रहस्यों के जाल में उलझाइये मत, साफ-साफ बताइये?
‘‘इन खतरों से लोग अभी बहुत सतर्क नहीं हुए थे, तभी वह घटना घटी। एक दिन झील के पानी में कुछ अजीब-से जीव देखे गये। पानी पर तैरते हुए अजीब जीव, जो अभी तक किसी ने देखे नहीं थे। देखे मैंने भी नहीं थे। सिर्फ विज्ञान के इतिहासों में पढ़े थे, देखे मैंने भी नहीं थे। सिर्फ विज्ञान के इतिहासों में पढ़े थे, देख तो अब रहा था, जब वे अपनी दस फुट लंबी गर्दन पानी से निकालते, तो लोगों की चीख निकल पड़ती, वे घास-फूस खाते और पानी में डुबकी लगा जाते...’’
बीच में रुक कर आचार्य ने पूछा- ‘‘जानते हो, वे कौन से जीव थे?’’
‘‘क्या डायनासॉर?’’
‘‘बिल्कुल ठीक’’
‘‘लेकिन डायनासॉर तो कब के समाप्त हो चले? करोड़ों साल पहले जल, थल और नभ पर राज करने वाले ये प्राणी अब अतीत गाथा बन चुके हैं।’’ मैंने अपनी मंशा जाहिर की।
‘‘हां यह ठीक है लेकिन ज्ञानचक्षुओं के परे भी बहुत कुछ घटित होता है, जिस पर विज्ञान टिप्पणी नहीं कर सकता है।’’
‘‘सो तो है।’’ मैं विस्मित-विमुग्ध उनकी ओर निहारता रहा गया।
‘‘वास्तव में, अतिशय ठंड के कारण यह जीव हिमीभूत हो गये थे और विकिरणशीलता की गर्मी से बर्फ पिघली और गर्मी के बढ़ते जाने से इन हिमीभूत प्राणियों में जीवन का संचार हुआ।’’
‘‘क्या आपने डायनासॉर देखे थे?’’ 
‘‘अद्भुत दृश्य! अपनी इन्हीं आँखों से वे लुभावने दृश्य देखे थे, जो अब बूढ़ी हो चली हैं। तुम सौभाग्यशाली हो मित्र, क्योंकि तुम्हें यह किस्सा बताने वाला मैं जिन्दा हूँ, अब उस हादसे का कोई प्रत्यक्षदर्शी यहाँ नहीं है।’’
आचार्य ने बात आगे बढ़ायी- ‘‘इन्हीं आँखों से पानी में विचरण करते डिप्लोडोकस और स्टिगोसार मैंने देखे।’’ बच्चों की-सी प्रसन्नता में वे पुलकित हो उठे- ‘‘उनमें सबसे आकर्षक था- ब्रैक्योसार, जो पानी से ऊपर बीस फुट ऊँची अपनी गर्दन उठाये घूमता रहता। झील से घास-पात मुँह में भर लेता और इधर-उधर चक्कर काटता चुभलाता रहता।’’
‘‘एक बात और बताऊँ तुम्हें, जब ये पानी में पहली बार दिखाई पड़े तो अजीब सी सुस्ती इनमें थी, धीरे-धीरे वे चुस्त चौकन्ने होते गये। लेकिन मारे दहशत के लोग भागने लगे। होटल, रेस्त्रां खाली होने लगे। बसें कम होती गयीं और मित्र, एक दिन सभी कुछ खत्म हो गया!’’
‘‘क्यों, ऐसा भी क्या हुआ?’’
‘‘हुआ यह कि विकिरण का जहर यहाँ की आबोहवा में घुल रहा था और पानी में भी, जिससे कि सारे जलचर प्रभावित हो रहे थे। वे अद्भुत प्राणी भी उनके ग्रास बनने लगे। लेकिन असली कारण यह नहीं था।’’
‘‘फिर क्या था?’’ मैं बेचैन हो उठा।
‘‘एक दिन रात में परमाणु संयंत्र में किसी तकनीकी गड़बड़ी के कारण विस्फोट हो गया। धमाका हमने भी सुना और यहाँ से मीलों दूर उठती आग की लपटें हमने देखीं। सब कुछ जलकर खाक हो गया। परमाणु बिजली घर की इमारत देखते ही देखते उड़ गयी। उसकी ईंटें मीलों दूर जाकर गिरीं। काले-लाल धुएँ का आसमान तक उठता बादल हमने अपने जीवन में पहली बार देखा था...।’’ आचार्य की सांस जैसे रुकने लगी हो, मैंने साफ महसूस किया और उन्हें थोड़ी-सी चाय उड़ेलकर दी। जब वे सामान्य हुए तो कथा क्रम को आगे बढ़ाने के लिए मैंने ही पहल की- हाँ, अब बताइए, आगे क्या हुआ?
‘‘मत पूछो, क्या हुआ। किसी तरह हम जान बचाकर तुरत-फुरत भागे। चंद सौभाग्यशलियों में हम भी थे, जो उस महाविनाश का प्रत्यक्ष दर्शन करके भाग चले और बच गये।’’
‘‘विस्फोट तरंगों की गरमी की आग ने हजारों किलोमीटर की सघन वृक्षावली को लील लिया, पशु-पक्षी तड़प-तड़प कर मरने लगे। देखते ही देखते यह इलाका मरघट में बदल गया। उस गर्मी से वे प्राणी भी सदा के लिए चिर निद्रा में लीन हो गये। परमाणु विकिरणों ने ही उसकी नींद में खलल डालकर उनका कायाकल्प किया था। उनमें जीवन संचारित किया था और विकिरणों के विष ने उन्हें फिर से मौत की नींद सुला दिया। झील सूख-साख कर ऊबड़-खाबड़ धरती में तब्दील हो गयी और यहाँ हजारों किलोमीटर के इर्द-गिर्द सरकार ने बाड़ लगाकर सदा के लिए इसे निषिद्ध क्षेत्र घोषित कर दिया।’’
‘‘और मैडम नैनसी के साथ क्या हुआ?’’ बुझे मन से मैंने सवाल किया।
‘‘मैं पहले ही तुम्हें बता चुका हूँ कि पानी में घुले जहर ने उसके शरीर को छलनी कर दिया था। उसे सेनेटोरियम में भी भर्ती करवाया था कनाडा में। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। मेरी नैनसी मुझसे विमुख हो गयी थी... सदा के लिए...’’ आचार्य गहरे विषाद में डूब गये थे निःशब्द।
मैं स्तब्ध रह गया इस भयानक, रोमांचकारी, लोमहर्षक प्रकरण को सुनकर। आचार्य ने ही मौन तोड़ा- ‘‘फिर मैंने विश्वविद्यालय की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और सदा के लिए यहाँ चला आया...।’’ 
‘‘यह गाथा मेरा अतीत बन चुकी है, लेकिन ऐसा अतीत जो मेरे वर्तमान के साथ साये की तरह चिपकी रहती है।’’
भारी मन से हम कस्बे में लौटे, अब वहाँ रुकने की मेरी जरा भी इच्छा नहीं थी। मैडम नैनसी की करुण कथा मेरे मन पर बोझ-सी थी। करोड़ों साल पूर्व के धरती के स्वामियों के पुनरुद्भाव की रोमांचकारी दास्तान भी अब मेरे लिए बेमानी हो चुकी थी। सो, अगले ही दिन मैंने अपना सामान बांधा और आचार्य धीमान से अश्रुपूरित नेत्रों से विदा ली।
जब से लौटा हूँ, अजीब-सी अनुभूति में जी रहा हूँ। अपने जान-पहचान वाले लोगों या अपने मित्र म्हात्रे को क्या बताऊँ कि मेरे साथ क्या हुआ और मैं इतना गुमसुम क्यों हूँ?
नहीं जानता, यह अद्भुत आख्यान मेरी जिंदगी का अतीत बनकर कब मेरा पीछा छोड़ेगा और कब मैं अपनी उसी भावधारा में लौट पाऊँगाा जो मरे मित्रों, शुभैषियों के लिए सुपरिचित मेरी जीवन शैली थी।


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