तकनीकी

(23/May/2018)

पृथ्वी के संकटों पर आशंका करने वाला वैज्ञानिक 

डॉ.मनीष मोहन गोरे
 
स्टीफन हॉकिंग जैसे वैज्ञानिक सदियों बाद जन्म लेते हैं। वे न सिर्फ अपने शोध कार्य और विशेषज्ञता वाले क्षेत्र में माहिर होते हैं बल्कि विज्ञान की अबूझ व गूढ़ बातें भी आम आदमी को समझाते हैं। इस अर्थ में स्टीफन हॉकिंग का नाम शिद्दत से लिया जाएगा। अक्सर यह देखा जाता है कि वैज्ञानिक अपने अनुसंधान में लगा होता है और शोध परिणामों को शोध पत्रों के जरिए दुनिया के सामने लाता है। इन शोध पत्रों को पढ़ने, समझने और विश्लेषण करने वाला समधर्मी वैज्ञानिक समुदाय का सदस्य होता है। दूसरी तरफ विज्ञान व प्रौद्योगिकी का उपयोग विकास और उन्नति में किया जाता है। मौजूदा समय में कृषि, शहरी विकास, उद्योग, औषधि जैसे मानव जीवन के समग्र क्षेत्रों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के समावेश के फलस्वरूप हुई क्रांति के हम सभी साक्षी हैं। अब सवाल यह उठता है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी की जानकारी आम जन तक पहुंचनी चाहिए या नहीं। भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में उनके नागरिकों को इससे संबंधित संवैधानिक कर्तव्य और अधिकार दी गए हैं। भारत में विज्ञान लोकप्रियकरण और संचार को लेकर भारत सरकार का एक पूरा महकमा (राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद) विगत ३६ वर्षों से क्रियाशील है। 
अंग्रेज वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग (८ जनवरी १९४२-१४ मार्च २०१८) एक जीनियस खगोल वैज्ञानिक रहे और जिनके निधन ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। वे वैज्ञानिक के साथ-साथ एक कुशल विज्ञान संचारक भी थे। खगोल विज्ञान और ब्रह्मांड विज्ञान में गवेषणा के अतिरिक्त स्टीफन इनसे संबंधित ताजा जानकारी सरल भाषा में आम जन तक पहुंचाते रहे। इससे जुड़े तमाम प्रसंग हैं। वे भारत में भी दो बार आए और कई स्थानों पर पापुलर साइंस लेक्चर दिए। 
विश्व फलक पर फ्रेड हायल (१९१५.२००१), रिचर्ड फाइनमैन (१९१८.१९८८) और कार्ल सागन (१९३४.१९९६) जैसे कुछ चुनिंदा वैज्ञानिकों के उदाहरण हैं जिन्होंने विज्ञान संबंधी शोध के साथ उसकी जानकारी आम जन से साझा करने के अनोखे प्रयास किए। फ्रेड हायल खगोल वैज्ञानिक रहे जो प्रख्यात भारतीय वैज्ञानिक जयंत विष्णु नारलीकर के शिक्षक (शोध मार्गदर्शक) रहे हैं। वे पत्र पत्रिकाओं में लोक विज्ञान लेखन करते थे जिससे प्रेरित होकर उनके शोध छात्र नार्लीकर का झुकाव विज्ञान लेखन की ओर हो गया। आज भारत में विज्ञान संचार और विज्ञान कथा लेखन में नार्लीकर एक महत्वपूर्ण नाम है। फाइनमैन ने भौतिकी के सिद्धांतों को हंसते खेलते आसान तरीकों से पापुलर लेक्चर के जरिए लोगों को समझाया। कार्ल सागन खगोलविद थे और उन्होंने कास्मास, पेल ब्ल्यू डाट, कान्टेक्ट, दी वेराइटीज ऑफ साइंटिफिक एक्सपिरिएंस, दी कास्मिक कनेक्शन, कामेट, इंटेलिजेंट लाइफ इन दी यूनिवर्स और दी कोल्ड एंड दी डार्क जैसी अनेक पापुलर साइंस किताबें लिखकर आम जन से जुड़ गए थे। 
अगर हम अपने देश भारत की बात करें तो रूचि राम साहनी (१८६३.१९४८), प्रोफेसर यश पाल (१९२६.२०१७) और ए.पी.जे। अब्दुल कलाम (१९३१.२०१५) जैसे चंद भारतीय वैज्ञानिकों ने भी अपने विज्ञान लोकप्रियकरण प्रयासों के जरिए आम जन में वैज्ञानिक जागरूकता पैदा किए और बाकी हार्डकोर वैज्ञानिकों को यह कार्य करने के लिए प्रेरित किया। 

विज्ञान और संचार दोनों के प्रेरक 

स्टीफन हॉकिंग विश्व के अत्यंत प्रतिभाशाली सैद्धांतिक भौतिक वैज्ञानिक और ब्रह्मांड विज्ञानी रहे हैं। वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सेंटर फार थियोरेटिकल कास्मोलाजी के बतौर शोध निदेशक कार्यरत थे। सामान्य आपेक्षिकता के क्षेत्र में गुरुत्वीय सिंगुलेरिटी प्रमेय और ब्लैक होल विकिरण उनके प्रमुख वैज्ञानिक अवदान हैं। उनके सम्मान में इस विकिरण को हॉकिंग रेडिएशन के नाम से पुकारा जाता है। स्टीफन दुनिया के पहले ऐसे वैज्ञानिक रहे हैं जिन्होंने ब्रह्मांड विज्ञान का सिद्धांत प्रस्तुत किया और सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत तथा क्वांटम मेकेनिक्स के द्वारा उसकी व्याख्या की। 
स्टीफन अपने विद्यार्थी जीवन से हटकर सोचने वाले और मेधावी थे। उनके शिक्षकों ने भी इस बात का उल्ल्लेख किया था कि वे विज्ञान के क्षेत्र में लीक से हटकर सोच रखते थे। ब्लैक होल को लेकर अपने क्रांतिकारी विचारों से स्टीफन ने खगोल भौतिकी जगत को अचंभित किया। ‘इंफार्मेशन प्रिजर्वेशन एंड वेदर फोरकास्टिंग फार ब्लैक होल्स’ स्टीफन हॉकिंग के उस शोध पत्र का शीर्षक है जो साल २०१४ में प्रकाशित हुआ था और इसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिक समुदाय को उद्वेलित कर दिया था। इस शोध पत्र के जरिए उन्होंने ब्लैक होल को लेकर १९७४ से चली आ रही स्थापनाओं को चुनौती दी थी। 
ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या के संबंध में विश्व की सर्वस्वीकार्य वैज्ञानिक व्याख्या बिग बैंग सिद्धांत में प्रस्तुत की गई है। यद्यपि इस सिद्धांत पर वैज्ञानिक जगत में कुछ समय तक असमंजस की स्थिति बन गई थी। १९४९ में इस सिद्धांत को यह नाम देने वाले ब्रिटिश खगोल वैज्ञानिक फ्रेड हायल भी इस सिद्धांत को लेकर अविश्वास में पड़ गए थे। १९७० में स्टीफन हॉकिंग ने अपने साथी भौतिकशास्त्री रोजर पेनरोज के साथ मिलकर सिंगुलेरिटी का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने बताया कि ब्रह्मांड का आरंभ एक ऐसे बिंदु से हुआ है जहां दिक् (स्पेस) और काल (टाइम) पृथक नहीं थे। यह उसी प्रकार है जैसे कि कोई ब्लैक होल अधोगामी हो जाए। उनके इस शोध कार्य ने प्रकारांतर से बिग बैंग सिद्धांत का समर्थन किया। यद्यपि स्टीफन के सिद्धांतों ने ब्रह्मांड को लेकर वैज्ञानिकों के सोचने-समझने के तरीके में क्रांति ला दिया मगर उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिला। कारण कि उनके सिद्धांत सिद्ध नहीं हुए हैं। 
एक समय स्टीफन ने इस उम्मीद से एक सिद्धांत तक पहुंचने की कोशिश की जिसमें ब्रह्मांड के समस्त भौतिक पहलुओं की व्याख्या हो सके। मगर २०१० में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि हर कुछ के सिद्धांत (थियोरी आफ एवरीथिंग) को ढूंढने में विज्ञान समर्थ नहीं हो सकता। 
स्टीफन परग्रही जीवन और परग्रही जीवों (एलियन) की संभावनाओं को लेकर बेहद आशावादी थे इसलिए विज्ञान कथा लेखकों और पाठकों के बीच वे हमेशा लोकप्रिय रहे। उनकी यह धारणा थी कि विषाणुओं के रूप में ही सही एलियन हमारी पृथ्वी पर आते रहे हैं। हम इस संभावना से इनकार नहीं कर सकते कि ब्रह्मांड में हमसे दूर किसी अन्य पिंड पर हमसे अधिक विकसित जीव भी मौजूद हो सकते हैं। इन जैसे तमाम विचार सूत्रों पर विज्ञान कथाकारों ने असंख्य विज्ञान कथाओं का सृजन किया है। स्टीफन ने कहा था कि ब्रह्मांड की अन्य आकाशगंगाओं में पृथ्वी के समान जीवों के अस्तित्व की संभावना शून्य से भी कम है और ह्यूमनाएड जैसे जीवों की संभावना अधिक। 
स्टीफन हॉकिंग विज्ञान और खास तौर पर खगोल विज्ञान की जानकारी के लोकप्रियकरण के लिए बेहद सक्रिय रहते थे। वे अपने पापुलर साइंस लेक्चर और पापुलर साइंस किताबों में बेहद सरलता से विज्ञान की गूढ़ बातों को समझाया है। इस मायने में वे एक शानदार और प्रतिभाशाली विज्ञान संचारक साबित होते हैं। उन्होंने खगोल विज्ञान और ब्रह्मांड विज्ञान पर केंद्रित अनेक पापुलर साइंस किताबें लिखीं जिन्हें उन लोगों ने भी सराहा जिनका वास्ता भौतिकी, गणित और ब्रह्मांड विज्ञान से दूर दूर तक नहीं था। उनके लेखन की विशेषता है कि प्रस्तुत सामग्री में सरलता के अलावा स्पष्टता, सटीकता और परिहास जैसे अहम तत्वों का संतुलित समावेश मौजूद रहता है। ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम (१९८८), ब्लैक होल्स एंड बेबी यूनिवर्सेस एंड अदर एसेज (१९९४), दी नेचर आफ स्पेश एंड टाइम (१९९६), दी फ्यूचर आफ स्पेसटाइम (२००२), आन दी शोल्डर्स आफ जिआन्ट्स (२००२), दी ग्रैंड डिजाइन (२०१०), दी ड्रीम्स दैट स्टफ इज मेड आफ (२०११) और ओरिजिन आफ (ऑलमोस्ट) एवरीथिंग (२०१६) स्टीफन हॉकिंग की कुछ प्रमुख पापुलर साइंस किताबें हैं। ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम ब्रह्मांड विज्ञान पर लिखी उनकी बेस्टसेलर किताब है। इसमें स्टीफन ने रोचक भाषा में ब्रह्मांड के अनेक रहस्यों का वर्णन किया है। स्टीफन ने अपनी बेटी के सहयोग से बच्चों के लिए भी अनेक किताबें लिखीं।
विज्ञान संचार में स्टीफन हॉकिंग के महत्वपूर्ण योगदान को दृष्टिगत रखते हुए स्टारमस फेस्टिवल नामक संस्था ने विज्ञान लोकप्रियकरण करने वाले व्यक्तियों के लिए स्टीफन हॉकिंग विज्ञान संचार पदक को प्रदान करने की शुरुआत की है। इस पदक की औपचारिक घोषणा १६ दिसंबर २०१५ को रायल सोसाइटी, लंदन में की गई थी। यह पदक प्रत्येक वर्ष विज्ञान, कला और फिल्म के माध्यम से विज्ञान संचार करने वाले उत्कृष्ट संचारक को प्रदान किया जाएगा। ६ जून २०१६ को पहला स्टीफन हॉकिंग विज्ञान संचार पदक अमेरिकी खगोल भौतिकशास्त्री नील डेग्रासे टाइसन को स्वयं स्टीफन हॉकिंग के हाथों प्रदान किया गया था। 

अपनी कमजोरी को बनाई ताकत 

स्टीफन हॉकिंग को सबने हमेशा एक स्पेशल व्हील चेयर पर एक तरफ सिर टिकाए बैठे देखा। सभी अचरज में रहते कि शारीरिक तौर पर असमर्थ वैज्ञानिक इतने जबर्दस्त शोध को अंजाम कैसे देता है। दरअसल स्टीफन ने अपनी इस शारीरिक कमजोरी को शोध और सोचने-समझने की प्रक्रिया के दौरान कभी बाधक बनने नहीं दिया। वे एक दुर्लभ मोटर न्यूरान रोग (एमाइलोट्रापिक लैटरल स्क्लेरोसिस) से पीडि़त थे जिसमें क्रमशः पूरा शरीर विकलांग हो जाता है और अंत में प्रभावित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। स्टीफन जब आक्सफोर्ड में अपनी पढ़ाई कर रहे थे तो उसी दौरान वे सीढि़यों से फिसलकर गिर गए जिसके बाद वे इस बीमारी की चपेट में आए। इस बिमारी के अगले चरण में उनके बोलने की क्षमता समाप्त हो गई। १९६३ में स्टीफन जब इक्कीस साल के थे तब उनके जीवन में यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई थी। उस समय चिकित्सकों ने कहा था कि स्टीफन मात्र दो  साल और जीवित रहेंगे। मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। वे दो की बजाय पचपन साल और जीवित रहे। हालांकि धीरे-धीरे करके स्टीफन की लिखने की क्षमता खत्म हुई और आगे चलकर उनके मस्तिष्क को छोड़कर बाकी पूरा शरीर निष्क्रिय और अशक्त होता गया। कम्प्यूटर चालित स्पीच सिंथेसाइजर की सहायता से उनके मन में उठे विचारों को ध्वनि या स्क्रीन पर शब्द के रूप में प्रकट किया जाता था। इस उपकरण का विकास वाल्टर वाल्टोज (वर्ड्स प्लस के सीईओ) ने किया था। स्टीफन के गालों की मांसपेशियों में होने वाली गति से यह उपकरण नियंत्रित होता था। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि स्टीफन हॉकिंग ने अपनी शारीरिक अक्षमता को अपने मन-मस्तिष्क पर हावी नहीं होने दिया और विज्ञान की साधना में और जी जान से जुट गए। युवाओं के लिए स्टीफन हॉकिंग एक अद्भुत मिसाल हैं कि समस्त शारीरिक सक्षमता के बावजूद इतना वैज्ञानिक शोध और विज्ञान संचार कर पाना असंभव है जितना स्टीफन ने ९९ प्रतिशत शारीरिक असमर्थता में किया।

स्टीफन हॉकिंग की चेतावनियां 

स्टीफन हॉकिंग ने अपनी अद्भुत वैज्ञानिक मेधा और समझ के बल पर पृथ्वी के मनुष्यों को अनेक चेतावनी देकर सजग किया। २००६ में उन्होंने पूरी दुनिया के सामने एक खुला प्रश्न किया था कि हमारी वर्तमान दुनिया राजनैतिक, सामाजिक और पर्यावरण की दृष्टियों से उथल-पुथल के दौर में है। ऐसी परिस्थिति में क्या मानव जाति अपना अस्तित्व अगले सौ साल बनाए रख सकती है? हालांकि उन्होंने बाद में यह भी कहा कि इसका जवाब उनके पास भी नहीं है। वे अक्सर कहते रहे कि अकस्मात नाभिकीय युद्ध, जेनेटिक इंजीनियर्ड विषाणु, ग्लोबल वार्मिंग और ऐसी तमाम खतरनाक आशंकाओं के बीच हमारी पृथ्वी घिरी हुई है। साथ ही वे इसका एक समाधान भी देते कि इन अनचाही आपदाओं से मानव जाति के विलोपन से बेहतर है कि ऐसा होने से पहले हम किसी दूसरे ग्रह को विस्थापित हो जाएं। अंतरिक्ष में मानव बस्तियों को स्टीफन मानवता के भविष्य के लिए आवश्यक मानते थे। 
स्टीफन हॉकिंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की प्रगति को अनेक संभावनाओं से जोड़कर देखते थे मगर साथ ही इसके खतरों से उन्होंने समय-समय पर आगाह भी किया। साल २०१४ में बीबीसी पर उन्होंने कहा था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समग्र विकास की स्थिति में मानव जाति के अंत की भी संभावना हो सकती है।
स्टीफन हॉकिंग के निधन से दुनिया ने न केवल एक महान वैज्ञानिक और विज्ञान संचारक खोया है बल्कि एक अद्भुत इंसान को हमसे जुदा कर दिया है। वे भले ही भौतिक रूप से आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी चेतावनी और उनके विचार हमें हमेशा सजग बनाए रखेंगे। इस महाविभूति को शत्-शत् नमन। 
 
mmgore@vigyanprasar.gov.in